Srishti Khanda Extracted Page 305

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-305

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Sanskrit Original

शि श्रीपद्ममहापुराण प्रबुद्धो घा प्रमत्तो वा प्रसंगादागतोपि वा। भक्त्या विरहितो वापि शृण्वन्यापाद्विमुच्यते ॥२८८॥ दानेन संयुता विप्राः सुखिनो धर्मभागिनः। यमो दमो वै नियमः प्रोक्तस्तत्वार्थदर्शिभिः ॥२८९॥ ब्राह्मणानां विशेषेण दमो धर्मः सनातनः । दमस्तेजोवर्द्यति पवित्रो दम उत्तमः ॥२९०॥ विपाप्मा चैव तेजस्वी पुरुषो दमतो भवेत् । ये केचिन्नियमा लोके ये च धर्माश्शुभान्वयाः॥२९९॥ सर्वयज्ञफलं चापि दमस्तेभ्योविशिष्यते । तपो यज्ञस्तथा दानं दमादेव प्रवर्तते ॥२९२॥ किमरण्ये त्वदांतस्य दांतस्यापि किमाश्रमे । यत्र यत्र वसेद्वांतस्तदरण्यं महाश्रम: ॥२९३॥ शीलवृत्तसमेतस्य निगृहीतेन्द्रिस्य च। आर्जवे वर्तमानस्य आश्रमैः किं प्रयोजनम् ॥२९४॥ वनेपि दोषाः प्रभवन्ति रागिणां गृहेपि पंचेद्रियनिग्रहस्तपः । अकुत्सिते कर्मणि यः प्रवर्तते निवृत्तरागस्य गृहं तपोवनम् ॥२९५॥ सुकर्म धर्मार्जित जीवितानां सदा च संतुष्य गृहे रतानाम् । जितेंद्रियाणामतिथिप्रियाणां गृहेपि धर्मो नियमस्थितानाम् ॥२९६। न शब्दशास्त्रे निरतस्य मोक्षो न वर्णसंगे निरतस्य चैव । न भोजनाच्छादनतत्परस्य न लोकवृत्तग्रहणे रतस्य ॥२९७॥ एकांतशीलस्य दृढव्रतस्य सर्वेन्द्रियप्रीतिनिवर्तकस्य । अध्यात्मयोगे गतमानसस्य मोक्षो ध्रुवं नित्यमहिंसकस्य ॥२९८॥ सुखं च दांतः स्वपिति सुखेन प्रतिबुध्यते । समः सर्वेषु भूतेषु मनो यस्य प्रबुध्यते ॥२९९॥ ब्राह्मण को अन्न दान करने वाला सभी पापों से मुक्त हो जाता है ॥२८७॥ ज्ञानी हो थी प्रमत्त अथवा किसी प्रसङ्गवशात् आया हुआ हो, अथवा भक्तिहीन भी हो ऐसा पुरुष इस अन्न की महिमा को सुनकर मुक्त हो जाता है।॥२८८॥ अन्नदान करने वाले ब्राह्मण सुखी, धर्मभागी, यम, दान तथा नियम से युक्त हो जाता है; ऐसा तत्त्वज्ञ पुरुषों ने कहा है ॥२८९॥ विशेष रूप से दम (इन्द्रियों का निग्रह) ब्राह्मणों का सनातन धर्म है, दम से ब्राह्मणों का तेज बढता है । दम को पवित्र कहा गया हैं ॥२९०॥ दम के द्वारा ब्राह्मण पाप से रहित तथा तेजस्वी हो जाता है । संसार में जितने भी नियम तथा शुभ धर्म बतलाये गये हैं ॥२९१॥ तथा सभी प्रकार के यज्ञों को करने का जो फल है, उन सबों सें बढकर दम का महत्व है । दम के ही पालन से तप, यज्ञ तथा दान होते हैं ॥२९२॥ दम का नहीं पालन करने वाले का वन में निवास व्यर्थ है तथा दम का पालन करने वाला यदि अपने घर में रहता है तो वह श्रेष्ठ है । दान्त पुरुष जहाँ रहता है । वहीं पर अरण्य नामक श्रेष्ठ आश्रम हो जाता है ॥२९३॥ शील, सदाचार का पालन करने वाले, अपनी इन्द्रियों को वश में रखने वाले तो ऋजुता को अपनाने वाले को आश्रमों से कौन सा प्रयोजन है?॥२९४॥ रागी पुरुषों के वन में भी रहने पर उनमें दोष अत्यन्त बढ जाते हैं तथा घर में भी रहकर अपनी पाचों इन्द्रियों को अप॑ने वश में रखना तपस्या ही है । जो व्यक्ति निन्दित कर्मों को नहीं करता है तथा जो राग (आसक्ति ममता आदि) से रहित है उसके लिए घर भी तपोवन के समान है ॥३९५॥ जो अपने जीवन में सत्कर्म के द्वारा धर्म का अर्जन करते हैं तथा जो घर में ही संतोष पूर्वक रहते हैं । जो जितेन्द्रिय अतिथि प्रिय है तथा नियम पूर्वक रहते हैं वे घर में धर्मार्जन करते हैं ॥२९६॥ मोक्ष न तो शब्द शास्र में लगे रहने वाले को मिलता है, और न तो वर्ण में आसक्त व्यक्ति को मोक्ष मिलता है, अच्छा भोजन तथा अच्छे वस्र पहनने वाले को भी मोक्ष नहीं मिलता है, लोक के वृतान्तों को सदा ग्रहण करने वाले को भी मोक्ष नहीं मिलता है ॥२९७॥ एकान्त में रहकर दृढतापूर्वक ब्रत का

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