Srishti Khanda Extracted Page 304

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-304

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Sanskrit Original

तमूचुः सहितास्ते तु परिब्राजं शुनःसखम्। ऋषय ऊचुः शक्तिखड्गगदाभिश्च चक्रतोमरसायकैः ॥२७४॥ वाधिते वेदना या तु क्षुधया सापि निर्जिता । श्वासकुष्ठक्षयाष्टीली ज्वरापस्मारशूलकैः ॥ २७५॥ व्याधिभि जनिता सापि क्षुधाया नाधिका भवेत् । हिरण्यांगदकेयूरमकुटोज्ज्वलकुंडलाः ॥२७६॥ क्षुधाया न विराजंते तत्र ये संस्थिता नराः । यथा भूमिगतं तोयं रविरश्मि र्विकर्षति ॥२७७॥ तद्दच्छरीरजा नाड्यः शोष्यंते जठराग्निना । न शृणोति न चाघ्राति चक्षुषा नैव पश्यति ॥२७८॥ दह्यते क्षीयते मूढः शुष्यते क्षुधयार्दितः । न पूर्वा दक्षिणां चापि पश्चिमां नोत्तरामपि॥२७९॥ नचाधो नैव चोर्ध्वं च क्षुधाविष्टो हि विंदति । मूकत्वं बधिरत्वं च जडत्वमथ पंगुता ॥२८०॥ भैरवत्वममर्यादं क्षुधायां संप्रवर्धते । जनकं जननीं पुत्रान् भार्या दुहितरं तथा ॥२८९॥ भ्रातरं स्वजनं वापि त्यजति क्षुधयार्दितः । न पितृन्पूजयेत्सम्यक् देवं चापि गुरुं तथा ॥२८२॥ ऋषीनुपगतांश्चापि क्षुधाविष्टो न विंदति । एवमन्नविहीनस्य भवंत्येतानि देहिनाम् ॥२८३॥ तदेवं संप्रयच्छेत अन्नं श्रद्धा समन्वितः । ब्रह्मभूतस्ततः सोऽथ ब्रह्मणा सह मोदते॥२८४॥ सुसंस्कृतं च योप्यन्नं दद्यादहरहरद्विजे। यः पठेदन्नदानं तु श्राद्धे चैव विशेषतः ॥२८५॥ एकाग्रमनसो भूत्वा अमावस्येंदुसंक्षये । भूतोपघातसूपूर्णे श्राद्धे श्रावयते सदा ॥२८६॥ पितरस्तस्य तुष्यंति यावज्जीवं न संशयः । देवद्विजसमीपस्थोन्नस्य दाता विमुच्यते॥२८७॥ व्यथा कैसी होती है ?।।२७३।। उन सभी ऋषियों ने शुनःसख से कहा ऋषयों ने कहा-- शक्ति, खड्ग, गदा, चक्र, तोमर तथा बाण आदि के लगने से जो व्यथा होती है ॥२७४॥ उससे भी अधिक भूख की व्यथा होती है । श्वास, कुष्ठ, क्षय, टिली (मिरगी), अपस्मार तथा शूल, ज्वर आदि रोगों के कारण जो पीड़ा होती है ॥२७५॥ उससे भी अधिक पीड़ा भूख के कारण होती है । सुवर्ण, अङ्गद, केयूर, मुकुट तथा कुण्डल ॥२७६॥ आदि आभूषण भूख से पीडित व्यक्ति को अच्छे नहीं प्रतीत होते है । जिस तरह भूमि के भीतर गये हुए सम्पूर्ण जल को सूर्य की किरणें सोख लेती हैं उसी तरह ॥२७७॥ जाठराग्नि शरीर की सभी नाड़ियों को सुखा देती है । भूखा व्यक्ति को न तो कुछ सुनायी पड़ता है, न तो वह किसी गन्ध को सूंघता हे और न तो उसको कुछ दिखायी पड़ता है॥२७८॥ भूख से व्याकुल वह जलता रहता है क्षीण होता है और वह सूखता जाता है । भूख से व्याकुल व्यक्ति को पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर ऊपर तथा नीचे कुछ भी नहीं मालुम पड़ता है । उसकी मूकता (गुंगापन) बधिरत्व (बहरापन) जड़त्व तथा पंगुत्व (लंगड़ापन) ॥२७९-२८०॥। भैरवत्व तथा मर्यादा राहित्य ये सबके सब बढ जाते हैं। भूख से पीडित व्यक्ति पिता, माता, पुत्र, पत्नी, पुत्री, भाई तथा स्वजन का भी परित्याग कर देता है ॥२८१॥ वह पिता, देवता तथा आचार्य की भी पूजा नहीं कर पाता है ॥२८२॥ आये हुए ऋषयों को भी भूखा व्यक्ति नहीं जान पाता है । चूकि अन्न रहित व्यक्ति की इस प्रकार से स्थिति होती है, अतएव जिसके पास अन्न हो उसे भूखे व्यक्ति को श्रद्धापूर्वक अन्न देना चाहिए । जो व्यक्ति उसे अन्न प्रदान करता है वह मृत्यु के पश्चात् ब्रह्म स्वरूप होकर ब्रह्माजी के साथ सुखानुभव करता है ॥२८३-२८४॥ जो व्यक्ति अच्छी तरह से सिद्ध अन्न ब्राह्मण को देता है तथा जो व्यक्ति श्राद्ध करते समय अन्न दान की महिमा का पाठ करता है ॥२८५॥ अमावस्या के दिन चन्द्रमा का क्षय हो जाने पर भूतोपघात से युक्त श्राद्ध में जो इसे सुनाता है ॥२८६॥ उसके पितृगण जीवन भर तृप्त रहते हैं देवता और

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