Srishti Khanda Extracted Page 303
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-303
Sanskrit Original
ये लोका दानशीलानां स तानाप्रोति शाश्चतान्। योर्थानिच्छेन्नपाद्वप्र:. शोचितव्यो. महर्षिभि:॥२६ २॥ न स पश्यति मूढात्मा नरके यातनाभयम् । प्रतिग्रहसमर्थोपि न प्रसज्येत््रतिग्रहे ॥२६३॥ प्रतिग्रहेण विप्राणां ब्राह्म तेज: प्रशाम्यति । प्रतिग्रहसमर्थानां निवृत्तानां प्रतिग्रहात् ॥२६४॥ य एव ददतां लोकास्त एवाप्रतिगृह्णताम् । अरुन्धत्युवाच विसतंतुर्यथा नित्यमंभस्थस्सततं विशेत् ॥२६५॥ तृष्णा चैवमनाद्यंता तथा देहगता सदा । या दुस्त्यजा दुर्मतिभि र्या न जीर्यतिजीर्यतः ॥२६६॥ योऽ सौप्राणांतिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम्। चांडाल उवाच उग्रादितोभयाद्यास्माद्विभ्यती मे महेश्वराः ॥२६७॥ बलीयसो दुर्बलत्वात्तस्माच्चैव विभेम्यहम्। पशुसख उवाच यदाचरंति विद्वांसः सदा धर्मपरायणाः ॥२६८॥ तदेव विदुषा कार्यमात्मनां हितमिच्छता । इत्युक्त्वा हेमगर्भाणि त्यक्त्वा तानि फलानि वै॥२६९॥ ऋषयो जग्मुरन्यत्र सर्व एव दृढब्रताः। ततस्ते विचरंतो वै मध्यमं पुष्करं गता: ॥२७०॥ ददृशुः सहसा प्राप्तं परिव्राजं शुनः सखम्। तेनेह सहितास्तत्र गत्वा किंचिद्वनांतरम् ॥२७९॥ सरःपरमपश्यंत वृतं पदर्जलाशयम् । निविष्टाः सरसस्तीरे चिंतयंतो गतिं शुभाम् ॥२७२॥ शुनः सखो मुनीन्सर्वानुवाच क्षुधितां स्तदा । सर्वे वदंतु सहिताः कीदृशी क्षुत्प्रवेदना ॥२७३॥ करता है । जो ब्राह्मण राजा से धन प्राप्त करना चाहता है, वह महर्षियों के द्वारा सोचनीय है ॥२६२॥ क्योंकि वह मूर्ख नरकों में प्राप्त होने वाली यातना के भय को नहीं जानता है । इसलिए प्रतिग्रह लेने में समर्थ ब्राह्मण को प्रतिग्रह नहीं लेना चाहिये ॥२६३॥ प्रतिग्रह लेने से ब्राह्मणों का तेज समाप्त हो जाता है । प्रतिग्रह में समर्थ रहकर भी उसे नहीं लेने वाले ब्राह्मणों को भी दान करने वालों को जो लोक प्राप्त होते हैं, वे ही लोक प्राप्त होते हैं । अरुन्धती ने कहा-- जिस प्रकार विसतुंत (कमलनाल से निकलने वाला तंतु) जल में ही रहकर जल में नही प्रवेश करता है॥२६५॥ उसी तरह अनादि तथा अनंत तृष्णा सदा देह में ही विद्यमान रहती है । जिस दुर्मति को त्यागना कठिन है, जो बुढा होने पर भी जीर्ण नहीं होती है ॥२६६॥ वह ऐसा रोग है कि वह मरते दम तक भी नहीं समाप्त होती है, उस तृष्णा का परित्याग कर देने में ही सुख है । चाण्डाल ने कहा-- उग्र आकृति वाले को देखकर बड़े-बड़े महेश्वर भी भयभीत हो जाते हैं ॥२६७॥ उसी तरह अत्यन्त दुर्बल महर्षियों को देखकर मैं भी भयभीत हो जाता हूं पशुसख ने कहा- धार्मिक विद्वान पुरुष जैसा आचरण करते हैं आत्म कल्याण चाहने वाले को भी वैसा ही आचरण करना चाहिए | इसतरह से कहकर उस सुवर्ण भरे हुए गूलर के फलों को छोड़कर॥२६५९॥ सभी दृढव्रत वाले वे ऋषी अन्यत्र चले गये । उसके बाद विचरण करते हुए वे ऋषि मध्यपुषकर में गये ॥२७०॥ वहाँ पर उन लोगों की अचानक शुनःसख से भेंट हुयी उसके साथ वे सब ऋषि किसी दूसरे वन में चले गये।२७१॥उनलोगों ने एक ऐसे सरोवर को देखा जो कमलों से भरा हुआ था । वे सभी वहीं पर आत्मकल्याण का चिन्तन करते हुए बैठ गये ॥२७२॥ उन भूखे हुए मुनियों से शुनःसख ने पूछा आपलोग बतलाइये कि भूख की
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