Srishti Khanda Extracted Page 302

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-302

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Sanskrit Original

यथा शृंगंरुरोः काये वर्द्धमाने च वर्द्धते । अनंतपारा दुष्पूरा तृष्णा दुःखशतावहा ॥२५२॥ अधर्मबहुला चैव तस्मात्तां परिवर्जयेत्। गौतम उवाच संतुष्टः को न शक्रोति फलैश्चाप्यतिवर्तितुम् ॥२५३॥ लुब्ध इंद्रियलौल्येन संकटान्यवगाहते। सर्वत्र संपदस्तस्य संतुष्टं यस्य मानसम् ॥२५४॥ उपानद्गुप्तपादस्य तस्य चर्मावृतेव भूः । संतोषामृततृप्तानां यत्सुखं शांतचेतसाम् ॥२५५॥ कुतस्तद्धनलुब्धानामितश्चेतश्च धावताम् । असंतोषः परं दुःखं संतोषः परमं सुखम् ॥२५६॥ सुखार्थी पुरुषस्तस्मात्संतुष्टः संततं भवेत्। विश्वामित्र उवाच कामंकामयमानस्य यदि कामः समृद्भ्यति ॥२५७॥ अथैनमपरः कामो भूयो विध्यति बाणवत् । न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ॥२५८॥ हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवरद्धते। कामानभिलषन्मोहान्ननरः सुखमेधते ॥२५९॥ श्येनालयतरूच्छायां ब्रजन्निवकपिंजलः। चतुस्सागरपर्यन्तां यो भुंक्ते प्रथिवीमिमाम्॥२६०॥ तुल्याश्मकाञ्चनो यश्च सकृतार्थो न पार्थिवः। जमदग्निरुवाच प्रतिग्रहसमर्थोपि नादत्ते यः प्रतिग्रहम् ॥२६९॥ रूपी सूई से संसार रूपी सूत्र का विस्तार होता हे ॥२५१॥ जिस तरह मृग के बढने के साथ-साथ उसका सींग भी बढता जाता है उसीतरह तृष्णा भी सदा बढती ही जाती है, उसका भी अन्त नहीं है । वह दुष्पूर हैऔर अत्यधिक दुःखों को स्वयं ढोती रहती हे ॥२५२॥ उससे बहुत अधिक पाप होते हैं, अतएव उसका परित्याग कर देना चाहिए। गौतम महर्षि ने कहा-- जो व्यक्ति सन्तुष्ट है वह फलों का अतिक्रमण कर जाता है ॥२५३॥ इन्द्रियों की चंबलता से लुब्ध बना हुआ मनुष्य विपत्तियों कोही प्राप्त करता है । जिसका मन सन्तुष्ट है, उसके लिए पृथिवी धन सम्पत्ति से भरी हुयी है ॥२५४॥ जिसका पैर जूते में पड़ा है, उसके लिए सारी पृथिवी चमड़े से ढँकी हुयी है । संतोष रूपी अमृत का पान करके जिसका मन सन्तुष्ट हो गया है उसको जिस सुख की प्राप्ति होती है, वह सुख धन के लोभ में इधर-उधर दौड़ने वालों को कहाँ से मिल सकता है ? सबसे बड़ा दुख असन्तोष है और सबसे बड़ा सुख सन्तोष है ॥२५५-२५६॥ अतएव सुख चाहने वाले व्यक्ति को सदा सन्तुष्ट रहना चाहिए । विश्वामित्र महर्षि ने कहा-- काम्य पदार्थो की कामना करने वाले की कामना यदि पूर्ण होती हैं तो पुन: उसको दूसरी कामना बाण के . समान बेध देती है; अतएव कामनाआं की पूर्ति करने से कामनाओं की कभी भी समाप्ति नहीं होती है ॥२५७-२५८॥ जिस तरह से हविष्य के द्वारा अग्नि और अधिक प्रदीप्त होती जाती है उसी तरह कामनाएँ भी बढ़ती ही जाती हैं । कामनाओं को चाहने वाला मनुष्य कभी भी सुख को नहीं प्राप्त कर पाता है ॥२५९॥ चारो समुद्र पर्यन्त पृथिवी का स्वामित्व प्राप्त पुरुष उसी तरह से दुःखानुभव करता रहता है, जिस तरह जिस वृक्ष पर बाज पक्षी का निवास है, उस पेड़े की छाया प्राप्त करने वाला कपिञ्जल पक्षी आपद्ग्रस्त रहता है ॥२६०॥ जो व्यक्ति सुवर्ण तथा मिट्टी के ढेले को एक समान समझता है, वही व्यक्ति सुखी है राजा नहीं । जमदग्नि महर्षि ने कहा-- प्रतिग्रह को लेने में समर्थ होकर भी जो प्रतिग्रह को नहीं लेता है ॥२६१॥ दानियों को जो लोक प्राप्त होते हैं उन्हीं लोकों को वह प्राप्त

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