Srishti Khanda Extracted Page 301

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-301

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Sanskrit Original

श्रीपद्यमहापुराण वसिष्ठ उवाच तपसां संचयो यस्य द्रव्याणां यस्य संचय: । तपः संचय एवेह विशिष्टो धनसंचयात् ॥२४९॥ त्यजतः संचयान्सर्वान्यांति नाशमुपद्रवाः । नहि संचयवान्कश्चिदृश्यते निरुप्रदवः ॥२४२॥ यथा यथा नगृह्णाति ब्राह्मणो5 सत्प्रतिग्रहम् । तथा तस्य हि संतोषाइहा तेजो विवर्द्धी ॥२४३॥ अकिंचनत्वं राज्यं च तुलया समतोलयत् । अकिंचनत्वमधिकं राज्यादपि हितात्मनः ॥२४४॥ कश्यप उवाच अनर्थो ब्राह्मणस्यैष यस्त्वर्थनिचयो महान् ॥२४५॥ अर्थेश्चर्यविमूढो हे श्रेयसो भ्रश्यतो द्विजः । अर्थसंपद्विमोहाय विमोहो नरकाय च॥२४६॥ तस्मादर्थमनर्थाख्यं श्रेयोथीं दूरतस्त्यजेत् । यस्य धर्मार्थ मर्थेहा तस्यानीहा गरीयसी ॥२४७॥ प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य दूरादस्पर्शनं वरम् । योऽर्थेन साध्यते धर्मः क्षयिष्णुः स प्रकीर्तितः॥२४८॥ यः परार्थे परित्यागः सोऽक्षयो मुक्तिलक्षणः । भरद्वाज उवाच जीर्यति जीर्यतः केशा दंताजीर्य॑ति जीर्यतः ॥२४९॥ धनाशा जीविताशा च जीर्यतोऽपि नजीर्यति। चक्षुःश्रोत्रे च जीर्येते तृष्णैका निरुपद्रवा ॥२५०॥ सूच्या सूत्रं यथावस्रे समानयति सूचकः । तद्दत्संसारसूत्रं हि तृष्णा सूच्योपनीयते ॥२५९॥ वह सबसे अधिक पापियों की गति को प्राप्त करता है ॥२३९॥ पृथिवी पर विद्यमान सम्पूर्ण ब्रीहि, यव, सुवर्ण तथा ख्ियाँ किसी एक भी व्यक्ति को तृप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है, इस बात को जानकर शम नामक गुण को अपनाना चाहिए ॥२४०॥ वसिष्ठ महर्षि ने कहा-- जो व्यक्ति तपस्या के बल पर द्रव्यों का संचय करता है, वस्तुत: उसी का संचय है । इसलोक में धन के संचय से बढकर तपस्या का संचय करना है ।॥।२४१॥ जो व्यक्ति सभी प्रकार के संग्रहों का परित्याग कर देता है, उसको प्राप्त होने वाले सभी प्रकार क उपद्रव शान्त हो जाते हैं । कोई भी संग्रह करने वाला ऐसा नहीं है जो उपद्रवग्रस्त न हो ॥२४२॥ ब्राह्मण जैसे-जैसे असत् परिग्रह का परित्याग करता जाता हैं, उसी क्रम से उसका संतोष जन्य ब्राह्मतेज समृद्ध होता है ॥२४३॥ जब अकिञ्चनत्व तथा राज्य को तराजू पर रखकर तौला गया तो आत्मकल्याण चाहने वाले के लिए अकिञ्चनत्व का फल भारी हो गया ॥२४४॥ कश्यप महर्षि ने कहा-- अधिक धन सम्पत्ति का संचय ब्राह्मण के लिए अनर्थ स्वरूप है ॥२४५॥ धन के ऐश्वर्य से अज्ञानी बना हुआ ब्राह्मण आत्मकल्याण नहीं कर पाता है । धन सम्पत्ति अज्ञान के साधन हैं, और अज्ञान नरक प्राप्ति का साधन है ॥२४६॥ इसीलिए कल्याण चाहने वाले व्यक्ति को अनर्थ स्वरूप अर्थ का दूर से ही परित्याग कर देना चाहिए । जो धर्म रूपी सम्पत्ति को प्राप्त करना चाहता है, उसी की निष्कामना श्रेष्ठ है ॥२४७॥ कीचड़ लगाकर उसे धोने की अपेक्षा कीचड़ को दूर से ही त्याग देना श्रेष्ठ है । धन सम्पत्ति के द्वारा प्राप्त होने वाला धर्म क्षयिष्णु बतलाया गया है ॥२४८॥ जो त्याग दूसरे का कल्याण करने के लिए किया जाता है, वह त्याग मुक्तिप्रद होता है । भरद्वाज महर्षि ने कहा-- बूढे होने के साथ-साथ केश तथा दांत भी जीर्ण होते जाते हैं किन्तु बुढापे के आ जाने पर भी अधिक धन प्राप्त करने के तथा अधिक दिनों तक जीने की आशा नहीं समाप्त होती है ।बुढापे में नेत्र तथा कान भी जीर्ण हो जाते हैं, किन्तु विषयों को प्राप्त करने की इच्दा तो ज्यों के त्यों बनी रहती है ॥२५०॥ जिसतरह वस्न सीने वाला (दर्जी) सूई के माध्यम में सूत्र को वसर में प्रवेश करा देता है उसी तरह तृष्णा (लालच)

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