Srishti Khanda Extracted Page 300
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-300
Sanskrit Original
राजोवाच प्रतिग्रहो ब्राह्मणानां दृष्टा वृत्तिरनिंदिता। तस्मात्प्रतिग्रहान्मत्तो गृह्णीध्वं मुनिसत्तमाः ॥२२८॥ वरान्यरामान् ब्रीहियवान् रसानरत्मानि कांचनम्। गाश्च धेनूश्च तत्सर्वं मा मांसं पचत द्विजाः ॥२२९॥ ऋषय ऊचुः राजमप्रतिम्रहोघोरो मध्वास्वादो विषोपमः । तज्जानतां नः कस्मात्त्वं कुरुषे सम्प्रलोभनम् ॥२३०॥ दशसूना समश्चक्री दशचक्रिसमो ध्वजी । दशध्वजि समा वेश्या दश वेश्या समो नृपः॥२३९॥ दशसूनासहस्राणि यो वाहयति शौंडिकः । तेन तुल्यस्ततो राजा घोरस्तस्य प्रतिग्रहः ॥२३२॥ यो राज्ञः प्रतिगृह्णाति ब्राह्मणो लोभमोहितः । तामिस्त्रादिषु घोरेषु नरकेषु स पच्यते ॥२३३॥ तहच्छ कुशलं तेस्तु सह दानेन पार्थिव । अन्येषां दीयतामेतदित्युक्त्वा ते वनं ययुः ॥२३४॥ अथ राज्ञः समादेशात्तत्र गत्वाऽ थमंत्रिणः । उदुंबराणि व्यकिरन् हेमगर्भाणि भूतले ॥२३५॥ ततो ह्यान्नं विचिवन्तो शृह्णंश्चोदुंबराण्यपि । गुरूणि हि विदित्वा तु न ग्राह्याण्यत्रिरब्रवीत्॥२ ३६॥ अत्रिरुवाच नास्महे मूढ विज्ञाना नास्महे मंदबुद्धयः। हैमानीमानि जानीमः प्रतिबुद्धाः स्म ज्ञानिनः ॥२३७॥ इहैवेदं वसुप्रीत्ये प्रेत्य वैकुंठितोदयम् । तस्मान्न ग्राह्यामेवैतत्सुखमानंत्यमिच्छता ॥२३८॥ शतेन गुणितं निष्कं सहस्रेण समन्वितम् । यश्चान्यतः प्रतीच्छेत्स पापिष्ठां लभते गतिम् ॥२३९॥ यत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः ।नूनं नैकस्य पर्याप्तमिति. मत्वा शमं व्रजेत् ॥२४०॥ लिए प्रतिग्रह (दान लेना) अनिन्दित वृत्ति है, अतएव हे श्रेष्ठ मुनियों ! आपलोग मुझसे दान स्वीकार करें ॥२२८॥ ् रष्ठ ग्राम, ब्रीहि, यव, रस, रत्न, सुवर्ण, गायें, धेनु इत्यादि जो कुछ भी चाहें मुझसे लें; किन्तु यह मांस पकाकर न खायें ॥२२९॥ ऋषियों ने कहा-- हे राजन् ! दान लेना घोर पाप है, उसका स्वाद तो मधुर होता है; किन्तु उसका परिणाम विष के तुल्य होता है । उसको हमलोग जानते हैं, अतएव हमलोगों को लोभ में क्यों डालते हो॥२३०॥ दश कसाई के समान चक्री (कुम्हार या तेली) होता है, दश चक्रियों के समान पापी शराब बेचने वाला होता है, दश शराब बेचने वालों के समान एक वेश्या होती है और दश वेश्याओं के समान एक राजा होता हे॥२३१॥ दश हजार कसाई खानों को चलाने वाला शौण्डिक कहलाता है, राजा भी उसी के समान होता है । अतएव राजा का दान अत्यन्त भयङ्कर होता है ॥२३२॥ लोभ से प्रेरित होकर जो ब्राह्मण राजा का दान स्वीकार करता है वह तामिस्र इत्यादि भयङ्कर नरकों में पकाया जाता है ॥२३३॥ अतएव हे राजन् ! तुम्हारा कल्याण हो; तुम अपना दान अपने साथ ले जाओ । उसे किसी दूसरे को दे देना, यह कहकर वे ऋषिगण वन में चले गये॥२३४॥ उसके बाद राजा के आदेशानुसार उसके मन्त्रीगण आकर गुलर के फल के भीतर सुवर्ण भर-भरकर परथिवी पर विखेर दिए ॥२३५॥ उसके बाद अन्न के दानों को बीनते हुए तथा गूलर के फलों को बिटोरते हुए वे ऋषिगण वहाँ आये । उन गूलर के फलों को भारी देखकर ऋषियों ने जान लिया कि इन गूलरों को नहीं लेना चाहिए २३६॥ अत्रि महर्षि ने कहा-- हमलोग न तो मूर्ख हैं और न तो मन्द बुद्धि वाले हैं । हम सभी प्रतिबुद्ध ज्ञानी हैं, इन गूलर के फलों को नहीं लेना चाहिए ॥२३७॥ ये गूलर के फल इस लोक में तो सुख देने वाले हैं किन्तु इनसे हमारा मोक्षमार्ग अवरुद्ध हो जायेगा । अतएव अनन्त सुख मुक्ति प्राप्त करना चाहने वाले को इनको नहीं लेना चाहिए ॥२३८॥ जो व्यक्ति दूसरों से सुवर्ण का दान स्वीकार करता है उसको उसके लाखो गुना पाप लगता है और
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