Srishti Khanda Extracted Page 297

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-297

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Sanskrit Original

प्रजाः सर्वा महाराजविप्रा जग्मुर्यथागतम् । त्रिदशा विष्णुना सार्ल्धमनुजग्मु पितामहम् ॥१८४॥ पूरणार्थं समुद्रस्य मंत्रयंतः परस्परम् । ऊचुः प्रांजलयः सर्वे सागरस्य हि पूरणम् ॥१८५॥ तानुवाच समेतांस्तु ब्रह्मालोकपितामहः । गच्छध्वं विबुधास्सर्वे यथाकामं यथेप्सितम् ॥१८६॥ महताकालयोगेन प्रकृतिंयास्यतेऽर्णवः। ज्ञातींस्तु कारणं कृत्वा महाराजो भगीरथः ॥१८७॥ गंगौधेन समुद्रं च पुनः संपूरयिष्यति। एवं ते ब्रह्मणा देवाः प्रेषिता ऋषि सत्तमाः ॥१८८॥ उवाच भगवांस्तुष्टस्त्वगस्त्यमृषिसत्तमम् । देवकार्यं तु भवता दानवानां विनाशनम् ॥१८९॥ यतस्संतारिता देवास्तेनतुष्टोस्मि वै मुने। अभिप्रेतो वरो यस्ते याचयस्व ददामि तम् ॥१९०॥ एवमुक्तस्तदागस्त्यः प्रणिपातपुरः सरम्। इहस्थेन मया देव देवकार्यमिदं कृतम् ॥१९१॥ सर्वाश्रमाणां प्रवरो भवत्वेष ममाश्रमः। त्वया चोक्तस्तु भगवन्भविता नात्र संशयः ॥१९२॥ ब्रह्मोवाच यात्रां तु पृष्करे कृत्वा इहागत्यनरास्तु ये। इहकुंडेषु ये स्नानं तर्पणं पितृदेवयोः ॥१९३॥ अर्चनं चैवं देवेषु सर्वमक्षयकारकम्। अर्ध्य चोच्चावचं गृह्य शष्कुलापूपकांस्ततः ॥९९४॥ दास्यंति द्विजमुख्येभ्यस्तेषां वासस्त्रिविष्टपे । शआद्धेन पितरस्तृप्ता यावदाभूतसंपल्वम्॥९९५॥ कंदमूलफलैर्वापि तर्पयिष्यति यो मुनिम् । सप्तर्षिस्थानमासाद्य मोदते शास्वतीः समाः ॥९९६॥ यज्ञपर्वतमरूढो दृष्ट्वा गंगाविनिर्गमम् । उदङ्मुखी देवनदी निर्गता पुष्करं प्रति॥१९७॥ अत्राभिषेकं यः कुर्यात्पितृदेवार्चने रतः । अश्वमेधफलं तस्य भवत्येव न संशयः॥९९८॥ अगस्त्य को प्रणाम किया ॥१८३॥ हे महाराज भीष्म ! सम्पूर्ण प्रजा तथा ब्राह्मण अपने-अपने स्थान पर चले गये । भगवान् विष्णु के साथ सभी देवता ब्रह्माजी के पीछे-पीछे चले ॥१८४॥ वे परस्पर समुद्र को पुन: भरने के विषय में विचार भी कर रहे थे । सभी देवताओं ने समुद्र को भरने के साधन कें विषय में हाथ जोड़कर कहा ।।१८५।। उन एकत्रित हुए देवताओं से ब्रह्माजी ने कहा-- हे देवताओं ! आपलोग अपने-अपने अभिप्रेत स्थान पर जायँ ॥१८६॥ बहुत दिनों के बीत जाने पर सागर पुन: भर जायेगा, अपने दायादों के कारण महाराज भगीरथ ॥१८७॥ गङ्गा के जल से समुद्र को पुनः भर देंगे । इसतरह से कहकर ब्रह्माजी ने सभी देवताओं और श्रेष्ठ ऋषियों को भेज दिया॥१८८॥ प्रसन्न हुए ब्रह्माजी ऋषियों में श्रेष्ठ अगस्त्य महर्षि से कहे आपने देवताओं के कार्य को तथा दानवों का विनाश तो कर दिया ॥१८९॥ चूँकि आपने देवताओं का उद्धार किया है, इसलिए में प्रसन्न हुँ । आप अपने अभिलषित वरदान को माँगिए, उसे मैं देना चाहता हूँ ।॥१९०॥ ब्रह्माजी के इसतरह से कहने पर अगस्त्य महर्षि ने उन्हें साष्टाङ्ग प्रणिपात किया और ब्रह्माजी से कहा-- हे देव ! यहाँ पर रहकर मैंने यह देवताओं का काम किया किया ॥१९१॥ अतएव यह मेरा आश्रम सभी आश्रमों से श्रेष्ठ हो जाय । हे भगवन् ! आपके कह देने पर मेरा यहआश्रम वैसा हो जायेगा ॥१९२॥ ब्रह्माजी ने कहा-- जो मनुष्य पुष्कर तीर्थ की यात्रा करके यहाँ आकर इस कुण्ड में देवताओं तथा पितरों का तर्पण करेंगे ॥१९३॥ तथा देवताओं का पूजन करेंगे उन मनुष्यों द्वारा किया गया सारा कर्म अक्षय फलप्रद होगा । जैसा तैसा अर्ध्य स्वीकार करके तथा पूड़ी एवं पूआ लेकर ॥१९४॥ जो ब्राह्मणों को दान करेंगे उन लोगों का स्वर्गलोक में निवास होगा और उनके पितृगण प्रलय काल तक तृप्त रहेंगे ॥१९५॥ जो व्यक्ति वहाँ पर जाकर कन्द, मूल और फल का दान करके ऋषि को प्रसन्न करेंगा सप्तर्षि लोक में उसका सदैव निवास होगा ॥१९६॥ जो इस पर्वत पर चढकर वहाँ से गङ्गा के उद्धव का दर्शन करेगा, जहाँ से उत्तरभिभिमुखी गङ्गा नदी

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