Srishti Khanda Extracted Page 295

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-295

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Sanskrit Original

त्रिदशानां वचः श्रुत्वा मैत्रावरुणिरब्रवीत्। किमर्थ॑ समुपायाता वरं मत्तः किमिच्छथ॥१५७॥ एवमुक्तास्तदा तेन देवास्तं मुनिमब्रुवननू। इच्छाम एकं वरमद्धुतं वयं पिबार्णवं देवमुने महात्मन् ॥१५८॥ एवं त्वयिच्छेमकृते महर्षेमहार्णवं पीयमानं समग्रम् । ततो विहन्याम च सानुबंधं कालेय संज्ञं सुरविद्विषां बलम् ॥१५९॥ त्रिदशानां वचः श्रुत्वा तथेति मुनिरब्रवीत् । करिष्ये भवतां कामं लोकानां सुखकारकम् ॥१६०॥ एवमुक्त्वा ततो गछत्समुद्रं निधिमंभसाम् । तपः सिद्धैश्च मुनिभिः सार्थ दैवैश्च सुव्रत ॥१६१॥ मनुष्यो रगगंधर्वा यक्षाः किंपुरुषास्तथा । अनुजम्मुर्महात्मानं द्रष्टुकामास्तदद्धतम् ॥९६२॥ ततोभ्यपश्यत्सहितः समुद्रं भीमनिःस्वनम्। नृत्यंतमिव चोर्मीभि र्वल्गंतमिव वायुना ॥१६३॥ हसंतमिव फेनौघैः स्खंलंतं कंदरेषु च । नानाग्रहसमाकीर्ण नानाद्विजगणैर्युतम् ॥१६४॥ अगस्त्यसहिता देवाः सगंधर्वमहोरगाः । ऋषयश्च महाभागाः समासेदु र्महोदधिम् ॥१६५॥ समुद्रं स समासाद्य वारुणि भगवानृषिः । उवाच सहितान्देवानृषींस्तांस्तु समागतान् ॥१६६॥ पातुकामः समुद्रं च अगस्त्यऋषिसत्तम: । एष लोकहितार्थाय पिबामि वरुणालयम् ॥१६७॥ भवतां यदनुष्ठेयं तच्छीघ्रं संविधीयताम् । एतावदुक्त्वा वचनं मैत्रावरुणिरग्रतः ॥९६८॥ समुद्रमपिबत्क्ुद्धस्सर्वलोकस्य पश्यतः। पीयमानं समुद्रं तु दृष्ट्वा देवाः सवासवा:॥१६९॥ विस्मयं परमं जग्मुस्स्तुतिभिश्चाप्यपूजयन् । त्वं नस्राता विधाता च लोकानां लोकभावनः ॥ कहा-- आपलोग किस लिए आये हैं ? मुझसे कौन सा वरदान प्राप्त करना चाहते हैं 2॥१५७॥ महर्षि के द्वारा इस तरह से पूछे जाने पर देवताओं ने महर्षि से कहा-- हे मुने हमलोग आपसे एक अद्भुत वरदान प्राप्त करना चाहते हैं । हे मुने ! हे महात्मन ! आप महासागर को पी जायँ ॥१५८॥ हे महर्षे ! हमलोग यही चाहते हैं कि आपके द्वारा सम्पूर्ण महासागर पी लिया जाय, जिससे कि हमलोग देवताओं के बैरी कालेय दानवों का वध कर सकें॥१५९॥ देवताओं की वाणी सुनकर महर्षि ने कहा ऐसा ही होगा, मैं संसार को सुख देने वाली आपलोगों की इच्छा को पूर्ण करूँगा ॥१६०॥ इसतरह से कहकर महर्षि जलसमुद्र के पास गये । उस समय उनके साथ तप: सिद्ध महर्षि गण तथा देवताओं का समूह था ॥१६१॥ मनुष्य, सर्प, गन्धर्व, यक्ष तथा किन्नर उस अद्भुत कर्म को देखने के लिए महर्षि के पीछे-पीछे गये ॥१६२॥ महर्षि ने देखा कि समुद्र घोर गर्जना कर रहा है; मानों वह अपनी लहरियों के द्वारा नृत्य कर रहा हो तथा वायु के झोंकों के साथ उच्छल रहा हो ॥१६३॥। मानो वह अपने फेनों के माध्यम से हँस रहा हो तथा कन्दराओं में जैसे गिर रहा हो । वह अनेक ग्राहों से समुद्र भरा हुआ था और उसमें अनेक प्रकार के पक्षी विद्यमान थे ॥१६४॥ महर्षि अगस्त्य के साथ सभी देवता, गन्धर्व तथा बड़े-बड़े सर्प तथा ऋषिगण महासमुद्र के तट पर आये ॥ १६५॥ समुद्र तट पर आकर महर्षि अगस्त्य ने वहाँ पर आये हुए देवताओं तथा ऋषियों से समुद्र को पी जाने की इच्छा से कहा-- मैं आज संसार का कल्याण करने के लिए समुद्र को पी रहा हूँ ॥१६६-१६७॥। आपलोगों को जो कुछ भी करना हो वह शीघ्र कीजिये; इसतरह से कहकर महर्षि अगस्त्य सबों के समक्ष ॥१६८॥ क्रोध करके समुद्र को पी गये । इन्द्र के साथ सभी देवताओं ने देखा कि महर्षि ने समुद्र को पी लिया ॥१६९॥ वे सब अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गये और स्तुतियों के द्वारा महर्षि की पूजा किये । देवताओं ने कहा-- आप ही हमलोगों के धाता और विधाता हैं । आपलोकों का कल्याण करने वाले हैं, आपकी कृपा से यह

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