Srishti Khanda Extracted Page 294
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-294
Sanskrit Original
प्रदक्षिणं च क्रियते मामेवं कुरु भास्कर । एवमुक्तस्ततः सूर्यः शैलेन्द्रं प्रत्यभाषत ॥१४५॥ नाहमात्मेच्छया शैलं करोम्येनं प्रदक्षिणम् । एष मार्गः प्रदिष्टो मे येनेदं निर्मितं जगत्॥१४६॥ एवमुक्तस्तदा क्रोधात्प्रवृद्धः सहसाचलः । सूयचिंद्रमसोर्मार्ग रोद्धमिच्छन्परंतप ॥१४७॥ ततो हि देवाः सहितास्तु सर्वे सेद्राः समागम्य महाद्रिराजम् । निवारयामासुरथोत्पतंतं न वै स तेषां वचनं चकार ॥१४८॥ ततोहि जम्मुर्मुनिमाश्रमस्थं तपस्विनां धर्मवतां वरिष्ठम् । अगस्त्यमत्यद्धुतदीप्तवीर्यं तं चार्यमूचुः सहिताः सुरास्ते ॥१४९॥ देवा ऊचुः सूर्याचंद्रमसोर्मार्ग नक्षत्राणां गतिं तथा। शैलराडावृणोत्येष विध्यः क्रोधवशानुगः ॥१५०॥ तं निवारयितुं शक्तो नान्यः कञ्चिन्मुनीश्वर । तच्छुत्वा वचनं विप्रः सुराणां शैलमभ्यगात् ॥१५१॥ सोभिगम्याब्रवीदविंध्यं सादरं समुपस्थितम् । मार्गमिच्छाम्यहं दत्तं भवता पर्वतोत्तम॥९५२॥ दक्षिणामभिगंतास्मि दिशं कार्येण केनचित् । यावदागमनं मे स्यात्तावत्तवंप्रतिपालय ॥१५३॥ निवृत्ते मयि शैलेंद्र ततो वर्धस्व कामतः । पुलस्त्य उवाच अद्यापि दक्षिणद्देशाद्ठारुणि ननिवर्तते ॥१५४॥ एतत्तेसर्वमाख्यतं यथा विन्ध्यो न वर्धते। अगस्त्यस्य प्रभावेण यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥९५५॥ कालेयास्तु यथा राजन् सुरैः सर्वैर्निषूदिताः । अगस्त्य द्वारमासाद्य तन्मे निगदतः शृणु ॥१५६॥ प्रतिदिन सुमेरु पर्वत की परिक्रमा करते हैं ॥१४४॥ हे सूर्य ! उसीतरह आप मेरी भी परिक्रमा कर लिया करें । विन्ध्यगिरि की बात को सुनकर सूर्य ने कहा ॥१४५॥ मैं अपनी इच्छा से इस पर्वत की परिक्रमा नहीं करता हूँ । जिसने इस जगत् का निर्माण किया है, उस परमात्मा ने मेरा यही मार्ग निर्धारित किया है ॥१४६॥ हे परन्तप भीष्म! उसके बाद विन्ध्यगिरि क्रुद्ध हो गया तथा सूर्य और चन्द्रमा के मार्ग को रोक देने की इच्छा से सहसा बढ गया॥ १४७॥ उसके बाद सभी देवता विन्ध्यगिरि के पास आये और उससे नहीं बढने के लिए अनुरोध भी किए; किन्तु विन्ध्यगिरि उन सबों की बातों को नहीं माना ॥१४८॥ उसके बाद सभी देवता तपस्वियों एवं धार्मिको में श्रेष्ठ महर्षि अगस्त्य के आश्रम में गये और वहाँ जाकर अद्भुत शक्ति सम्पन्न महर्षि से देवताओं ने कहा देवताओं ने कहा-- नक्षत्रों के आश्रय भूत सूर्य तथा चन्द्रमा के मार्ग को क्रुद्ध होकर यह पर्वों का राजा विन्ध्यगिरि रोक देना चाहता है ॥१५०॥ हे मुनीश्वर ! उसको दूसरा कोई नहीं रोक सकता है । देवताओं की वाणी को सुनकर महर्षि विन्ध्यगिरि के पास गये ॥१५१॥ उन्होंने आदर पूर्वक विन्ध्यगिरि से कहा-- हे पर्वतश्रेष्ठ ! मैं आप के द्वारा प्रदत्त मार्ग प्राप्त करना चाहता हुँ ॥१५२॥ कुछ कार्यवशात् मैं दक्षिणभारत में जाना चाहता हूँ जब तक में लौटकर नहीं आ जाता हूँ तब तक तुम मेरी प्रतीक्षा करो ॥१५३॥ हे शैलेन्द्र ! जब मैं लौट आऊं तो तुम अपनी इच्छा के अनुसार बढना । पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- वरुणपुत्र महर्षि आज तक दक्षिण देश से नहीं लौटे ॥१५४॥ अगस्त्य महर्षि के प्रभाव से सम्बद्ध जो आपने मुझसे पुछा था ॥१५४॥ मैने आपको उन सारी बातों को बतला दिया जिसके कारण विन्ध्यगिरि नहीं बढता है ।॥।१५५॥ हे राजन् ! महर्षि अगस्त्य के द्वारा मार्ग प्राप्त करके सभी देवताओं ने सभी कालेयों को जैसे मार डाला उसे मैं बतलाता हूँ ॥१५६॥ देवताओं की बातों को सुनकर महर्षि अगस्त्य ने
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