Srishti Khanda Extracted Page 293

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-293

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Sanskrit Original

ते वृत्रं निहतं दृष्ट्वा सहस्राक्षेण धीमता । जीवितं परिरक्षन्तः प्रविष्टा वरुणालयम् ॥१३२॥ ते प्रविश्योदधि धोरं नानाग्रहसमाकुलम् । उत्सादनार्थं लोकस्य रात्रौ घ्नंति मुनीनिह ॥१३३॥ न तु शक्याः क्षयं नेतुं समुद्रांतर्हिता हि ते । समुद्रस्य क्षये बुद्धिर्भवद्धिः परिचित्यताम् ॥१३४॥ एतच्छुत्वा वचो देवा विष्णुना समुदाहृतम् । परमेष्ठिनमासाद्य अगस्त्यस्याश्रमं ययुः ॥१३५॥ तत्रापश्यन्हात्मानं वारुणं दीप्ततेजसम् । उपास्यमानमृषिभि देवैरिव पितामहम् ॥१३६॥ तेभिगम्यमहात्मानं मैत्रावरुणिमुत्तमम् । अप्रमत्तं तपोराशिं कर्मभिः स्वैरनुष्ठितैः ॥१३७॥ देवा ऊचुः नहुषेणाभितप्तानां लोकानां त्वं गतिः पुरा । भ्रंशितश्च सुरैश्वर्याल्लोकार्थं लोककंटकः ॥१३८॥ क्रोधात्प्रवृद्धः स महान्भास्करस्य नगोत्तमः । वचस्तवानति क्रामन्विन्थ्यः शैलो न वर्धते ॥१३९॥ तमसाच्छादिते लोके मृत्युनाऽ भ्यर्दिताः प्रजाः । त्वामेव नाथमागम्य निर्वृतिं परमां गताः ॥१४०॥ अस्माकं भयभीतानां नित्यमेव भवानातिः । ततस्त्वद्यप्रयाचामस्त्वां वरं वरदोह्यसि ॥१४१॥ भीष्म उवाच किमर्थ सहसा विंध्य: प्रवृद्धः क्रोधमूर्च्छितः । एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण महामुने॥१४२॥ पुलस्त्य उवाच अद्रिराजं महाशैलं मेरुं कनकपर्वतम् । उदयेस्तमये भानुः प्रदक्षिणमवर्तत ॥९४३॥ तं दृष्ट्वा तदाविध्यः शैलः सूर्यमथात्रवीत्। यथाहि मेरुर्भवता नित्यशः परिगम्यते ॥१४४॥ दानवों का भयङ्कर समूह है ॥१३१॥ जब इन्द्र ने वृत्रासुर का बध कर दिया तो वे असुर अपनी जान बचाने के लिए समुद्र में प्रवेश कर गये ॥१३२॥ अत्यन्त भयङ्कर तथा अनेक प्रकार के ग्राहों से व्याप्त समुद्र में प्रवेश करके वे संसार का विनाश करने के लिए रात्रि में मुनियों को मारने का काम करते हैं ॥१३३॥ वे सब समुद्र के भीतर छिपे हुए है, अतएव उन्हें ऐसे नहीं मारा जा सकता है, आपलोग कोई ऐसा उपाय कीजिये कि समुद्र सुख जाय॥ १३४॥ भगवान् विष्णु की इस बात को सुनकर देवता ब्रह्माजी को साथ लेकर महर्षि अगस्त्य के आश्रम में गये।। १३५॥ वहाँ पर देवताओं ने अपने तेज से देदीप्यमान वरुण के पुत्र महर्षि अगस्त्य का दर्शन किया । जिसतरह देवता ब्रह्माजी की उपासना करते हैं, उसीतरह महर्षिगण उनकी उपासना कर रहे थे ॥१३६॥ वे उन प्रमाद रहित, तप: समूह स्वरूप तथा अपने द्वारा अनुष्ठित कमों के कारण देदीप्यमान महर्षि अगस्त्य के पास जाकर ॥१३७॥ देवताओं ने कहा-- प्राचीनकाल में जब नहुष ने संसार को कष्ट पहुँचाया था उस समय भी आप ने लोक की रक्षा करके लोक कण्टक नहुष को शाप देकर देवताओं के ऐश्वर्य से भ्रष्ट करके संसार की रक्षा किया था ॥१३८॥ जब सूर्य पर क्रोध करके पर्वत श्रेष्ठ विन्ध्यगिरि बढने लगा था उस समय भी आपकी बातों को मानकर वह आज भी नहीं बढ रहा है ॥१३९॥ अन्धकार से आच्छलन संसार पर जब प्रजाओं पर मृत्यु ने आक्रमण कर दिया था उस समय आपकी कृपा से संसार को परम शान्ति प्राप्त हुयी ॥१४०॥ हम भयभीत देवताओं के लिए आप ही आश्रय हैं। इसीलिए हमलोग आप से वरदान की याचना करते हैं, और आप वरदान देने वाले हैं ॥१४१॥ भीष्मजी ने कहा-_ क्या कारण था कि क्रोध करके विन्ध्य पर्वत सहसा बढने लगा ? हे महामुने ! आप इस बात को मुझे विस्तार से बतलाइये ॥१४२॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- पर्वतों के राजा सुमेरु पर्वत की सूर्य उदय के समय तथा अस्त होने के समय प्रदक्षिणा करते थे ॥१४३॥ उसको देखकर विन्ध्यगिरि ने भी सूर्य से कहा जिस तरह आप

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