Srishti Khanda Extracted Page 292

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-292

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Sanskrit Original

त्वं न:स्रष्टा च गोप्ता च भर्ता च जगतः प्रभो। त्वया सृष्टं जगत्सर्वं यच्चङ्गं यच्च नेङ्गति॥११९॥ त्वया भूमिः पुरा नष्टा समुद्रात्पुष्करेक्षण । वाराहं रूपमास्थाय जगदर्थे समुद्धता॥१२०॥ आदिदैत्यो महावीर्यो हिरण्यकशिपुः पुरा । नारसिंहं वपुः कृत्वा सूदितः पुरुषोतम ॥१२९॥ अवध्यः सर्वभूतानां बलिश्चापि महासुरः । वामनं वपुरास्थाय त्रैलोक्याद्भ्रंशितस्त्वया ॥१२२॥ असुरः सुमहेष्वासो जंभ इत्यभिविश्रुतः । यज्ञ क्षोभकरः क्रूरस्त्वमरैर्विनिपातितः॥१२३॥ एवमादीनि कर्माणि येषां संख्या न विद्यते। अस्माकं भयभीतानां त्वं गतिर्मधुसूदन ॥१२४॥ तस्मात्त्वां देवदेवेश लोकार्थ ज्ञापयामहे । रक्षलोकांश्च देवांश्च शक्रं च महतो भयात् ॥१२५॥ भवत्प्रसादाद्वर्तते प्रजास्सर्वाश्चतुर्विधाः । स्वस्था भवंति मनुजा हव्यकव्यै दिवौकसः ॥१२६॥ लोकाहोवं प्रवर्तते अन्योन्यं च समाश्रिताः । त्वत्प्रभावान्निरुद्रिग्रास्त्वयैव परिरक्षिताः ॥१२७॥ इदं हि समनुप्राप्तं लोकानां भयमुत्तमम्। जानीमो न च केनैते वध्यन्ते ब्राह्मणा निशि।॥१२८॥ ब्राह्मणेषु च क्षीणेषु पृथिवी क्षयमेष्यति । त्वत्प्रसादान्महाबाहो लोकास्सर्वे जगत्पते॥१२९॥ विनाशं नाधिगच्छेयुस्त्वया वै परिरक्षिताः । विष्णुरुवाच विदितं मे सुरास्सर्व प्रजायाः क्षयकारणम् ॥१३०॥ भवतां चापि वक्ष्यामि शृणुध्वं विगतज्वराः। कालकेया इति ख्याता गणाः परमदरुणाः ॥१३२॥ मिलकर विचार करने लगे ॥११७॥ उसके बाद वे सभी देवता एक साथ मिलकर भगवान् नारायण के वैकुण्ठ लोक में गये और भगवान् मधुसूदन से कहे ॥११८॥ हे जगत् के स्वामिन् ! आप ही हमलोगों की सृष्टि करने वाले और रक्षा करने वाले हैं । आपने ही चराचर जगत् की सृष्टि की है ॥११९॥ हे कमलनयन ! जब पृथिवी विनष्ट हो गयी थी उस समय संसार का कल्याण करने के लिए आपने वराह रूप धारण करके पृथिवी का उद्धार किया ॥१२०॥ हे पुरुषोत्तम ! आपने ही आदि दैत्य हिरण्यकशिपु का बध नृसिंह रूप धारण करके किया ॥१२१॥ महा असुर बलि सभी जीवों के लिए अवध्य हो गये थे । आपने उस समय वामन का रूप धारण करके बलि का त्रैलोक्य के राज्य से पतन करा दिया ॥१२२॥ महावीर जम्भ नामक असुर जज्ञों में उत्पात करता था उस समय आपने ही उसका विनाश देवताओं द्वारा कराया ॥१२३॥ हे भगवन् मधुसूदन ! इसतरह से आपके असंख्य जगत् की रक्षा से संबद्ध कार्य हैं । हमलोग भयभीत हो गये है । केवल आप ही हमारे रक्षक हैं ॥१२४॥ हे देवताओं के आराध्य भगवन् ! हमलोग आपसे प्रार्थना करते हैं कि आप संसार की रक्षा करने के लिए लोकों, देवताओं तथा इन्द्र की इस महती विपत्ति से रक्षा करें ॥१२५॥ आपकी ही कृपा से चारो प्रकार के (देव, मनुष्य, तिर्यक् तथा स्थावर अथवा अण्डज, पिण्डज, स्वेदज और उद्भिज) जीव सुरक्षित हैं । आपकी ही कृपा से मनुष्य स्वस्थ रहते हैं तथा देवता एवं पितृगण हव्य एवं कव्य को प्राप्त करते हैं ॥१२६॥ आपके ही प्रभाव से सभी जीव परस्पर में व्यवहार करते हैं, निरुद्विग्न मी आपके ही द्वारा रक्षित होकर रहते हैं ॥१२७॥ इस समय संसार के ऊपर बहुत बड़ी विपत्ति आ गयी है, हम यह नहीं जान पाते हैं कि रात्रि में कौन ब्राह्मणों को खा जाता है ॥१२८॥ ब्राह्मणों के विनष्ट हो जाने पर तो पृथिवी का ही नाश हो जायेगा । हे जगत्पते ! हे महाबाहो ! हम चाहते हैं कि ये सभी जीव ॥१२९। आपके द्वारा संरक्षित होकर विनष्ट न हों । भगवान् विष्णु ने कहा-- हे देवताओं ! में प्रजाओं के विनाश के सभी कारणों को जानता हुँ ॥१३०॥ आपलोग भी शान्ति पूर्वक सुनें । उसको मैं आपलोगों को बतला रहा हूँ । कालकेय नाम से विख्यात

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