Srishti Khanda Extracted Page 291

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-291

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Sanskrit Original

|| २६६ श्रीपद्ममहापुराण समुद्रंते समासाद्य वारुणं त्वंभसांनिधिम्। कालेयास्मपद्यंत त्रैलोक्यस्य विनाशने ॥१०४॥ ते रात्रौ समभिक्रुद्धा बभक्षुस्तांस्तदां मुनीन् । आश्रमेषु च ये संति पुण्येष्वायतनेषु च ॥९०५॥ वसिष्ठस्याश्रमे विप्रा भक्षितास्तै दुरात्मभिः । अशीतिः शतमष्टौ च वने चान्ये तपस्विनः ॥१०६॥ च्यवनस्याश्रमं गत्वा पुण्यं द्विजनिषेवितम् । फलमूलाशनानां हि मुनीनां भक्षितं शतम् ॥९०७॥ एवं रात्रौस्मकुर्वतो विविशुश्चार्णवं दिवा। भरद्वाजाश्रमं गत्वा नियता ब्रह्मचारिणः ॥१०८॥ वाताहारांबुभक्षाश्च विंशतिश्च निषृदिताः । एवं क्रमेणभक्षार्थं मुनीनां दानवास्तदा ॥१०९॥ निशायां पर्यधावंत शक्ताभुजबलाश्रयात् । कालेन महता ते वै जनध्नुर्मुनिगणान्बहून् ॥११०॥ नचैतानवबुध्यंत मनुजा मनुजाधिप। निस्वाध्यायवषट्कारं नष्टयज्ञोत्सवक्रियम् ॥१११॥ जगदासीन्निरुत्साहं कालेयभयपीडितम् । एवं प्रक्षीयमाणास्ते मानवा मनुजेश्वर ॥११२॥ आत्मत्राणपराभीताः प्रादवंस्तु दिशो दश । केचिहुहांप्रविविशु र्विकीर्णाश्चापरे द्विजाः ॥९९३॥ अपरे च भयोद्विग्ना भयात्प्राणान्समत्यजन् । केचित्तत्र महेष्वासाः शूराः परमदर्पिताः ॥११४॥ मार्गमाणाः परं यत्नं दानवानां प्रचक्रिरे। न चैताननुजग्मुस्ते समुद्रं समुपाश्रितान् ॥११५॥ शमं न जग्मुः परममाजग्मुः क्षयमेव च। जगत्प्रशमने जाते नष्ट यज्ञोत्सवक्रिये ॥११६॥ आजग्मुः परमोद्दिग्रास्त्रिदशा मनुजेश्वर । समेत्यसमहेद्रास्तु भयान्मंत्रं प्रचक्रिरे ॥११७॥ नारायणं पुरस्कृत्य वैकुंठमपराजितम् । ततो देवास्समेतास्ते तदोचुर्मधुसूदनम् ॥११८॥ के ज्ञाता हैं उनका शीघ्र नाश कर दिया जाय, उनके विनष्ट हो जाने पर जगत् का विनाश हो जायेगा ॥१०२॥ इसतरह से बुद्धि के विनष्ट हो जाने से दैत्यों ने बड़ी प्रसन्नता पूर्वक जगत् का विनाश करने के लिए सोचा । उन सबों ने विशाल लहरों वाले समुद्र को ही अपना किला बना लिया ॥१०३॥ जल के आकर समुद्र में जाकर वे कालेय दैत्य रहने लगे और त्रैलोक्य का विनाश करने में लग गये ॥१०४॥ वे रात्रि में समुद्र से बाहर निकलकर पवित्र आश्रमों तथा मन्दिरों में रहने वाले मुनियों को खा जाते थे ॥१०५॥ वे महर्षि वसिष्ठ के आश्रम में जाकर वहाँ पर रहने वाले आठ हजार आठ सौ महर्षियों को तथा दूसरे तपस्वियों को खा लिया ॥१०६॥ इसीतरह महर्षि च्यवन के आश्रम में रहने वाले तथा फल मूल का आहार करने वाले सौ मुनियों को खा लिया ॥१०७॥ वे रात्रि में इन सभी कामों को करके दिन में समुद्र में घुस जाते थे । महर्षि भरद्वाज के आश्रम में जाकर वहाँ पर नियम पूर्वक रहने वाले बीस ब्रह्मचारियों को खा लिया । वे ब्रह्मचारी वायु का आहार करके रहते थे । इस तरह से वे दानव क्रमश: मुनियों को खा जाते थे ॥१०८-१०९॥ महाबलवान् वे दानव रात्रि में ही धावा बोलते थे । कुछ ही समय में वे दानब बहुत से मुनियों के समूह को मार दिये ॥११०॥ हे मनुजाधिप भीष्म ! कोई भी मनुष्य उन सबों को जान नहीं पाता था । सारा संसार वेदाध्ययन, वषट्कार तथा यज्ञ महोत्सवों से रहित हो गया ॥१५११॥ कालेय के भय से पीडित संसार उत्साहहीन हो गया । हे मनुजेश्वर ! इसतरह से मनुष्यों का विनाश हो रहा था ॥११२॥ अपनी रक्षा करने के लिए मनुष्य दशो दिशाओं में भाग गये । कुछ ब्राह्मण गुफाओं में जाकर छिप गये ॥१५१३॥ भय के मारे भयभीत होकर कुछ द्विजों ने अपना प्राण त्याग कर दिया । कुछ जो वीर थे अपने हाथ में धनुष बाण लेकर दानवों का अन्वेषण करने लगे । किन्तु दानव चूकि समुद्र में रहते थे अतएव उन सबों को वे जान नहीं पाये ।। ११४-१ १५॥ उन्हें कही भी शान्ति नहीं मिलती थी, उनका नाश होता रहा । जगत् का विनाश सा हो जाने के कारण यज्ञ तथा वषटकार आदि का होना बन्द हो गया॥११६॥ हे मनुजेश्वर! सभी देवता उद्विग्न हो गये, वे भयभीत होकर इन्द्र से

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