Srishti Khanda Extracted Page 290
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-290
Sanskrit Original
ततो महेंद्र: परमाभितप्तः श्रुत्वा रवं घोरतरं महांतम् । भयेन मम्नस्त्वरितं मुमोच वज्रं महान्तं खलु तस्य शीर्षे ॥९४॥ सशक्रवञ्राभिहतः पपात महास्वनः कांचनमाल्यधारी । यथा महाशैलवरः पुरस्तात्समंदरो विष्णुकरात्प्रमुक्तः ॥९५॥ तस्मिन्हते दैत्यवरे भयार्तः शक्रः प्रदुद्राव सरः प्रवेष्टुम् । वज्रं च मेने स्वकरात्प्रमुक्तं वृत्रं भयाच्चैव हतं न पश्यति ॥९६॥ सर्वे च देवा मुदिताः प्रहृष्टाः महर्षयश्चैनमथो स्तुवंति । शेषांश्च दैत्यांस्त्वरितं समेत्य यघ्नुः सुरा वृत्रवधाभितप्तान् ॥९७॥ ते वध्यमानास्त्रिदशैस्तदानीं महासुरा वायुसमानवेगाः । समुद्रमेवाविविशु भयार्ताः प्रविश्य चैवोदधिमप्रमेयम् ॥९८॥ झषाकुलं रत्नसमाकुलं च तदास्म मंत्रं सहिताः प्रचक्रुः । तत्रस्म केचिन्मतिनिश्चयज्ञास्तांस्तानुपायान्परिचितयंतः ॥९९॥ भयार्दिता देवनिकायतप्तास्रैलोक्यनाशाय मतिं प्रचक्रुः । तेषां तु तत्र क्षयकालयोगाद्धोरामतिश्चिंतयतां बभूव ॥१००॥ ये संति विद्यातपसोपपन्नास्तेषां विनाशः प्रथमं च कार्यः । लोकाश्च सर्वे तपसा धियंते तस्मात्त्वरध्वं तपसः क्षयाय ॥९०९॥ ये संति केचिद्धिवसुंधरायां तपस्विनो धर्मविदश्च तज्ज्ञाः । तेषां वधश्च क्रियतां हि क्षिप्रं तेषु प्रणष्टेषु जगद्दिनष्टम् ॥१०२॥ एवं हि सर्वे गतबुद्धिभावा जगद्विनाशे परमप्रहृष्टाः । दुर्ग समाश्रित्यमहोर्मिमंतं रत्माकरं बारुणमालयं स्म ॥९०३॥ प्रथिवी, दिशाएँ आकाश, स्वर्गलोक तथा पर्वत काँप गये ॥९३॥ उस भयङ्कर ध्वनि को सुनकर इन्द्र अत्यन्त संतप्त हो गये । वे भयभीत होकर शीघ्रता पूर्वक उसके शिर पर वज्र का प्रहार किए ॥९४॥ इन्द्र के वज्र द्वारा मारा गया, सुवर्ण की माला धारण किए हुए वृत्रासुर घोर ध्वनि करते हुए पृथिवी पर उसी तरह गिर पड़ा जिस तरह भगवान् विष्णु के हाथ से छूटकर महान पर्वत मन्दराचल गिर पड़ा था ॥९५॥ उस श्रेष्ठ दैत्य के मारे जाने के बाद भयभीत होकर इन्द्र सरोवर में प्रवेश करने के लिए भाग चले । उन्हें लगा कि उनका ब्रज उनके हाथ से छूट गया । वे यह नहीं देखे कि वृत्रासुर मर गया है ॥९६॥ उसके बाद सभी देवताओं और ऋषियों ने प्रसन्न होकर इन्द्र की स्तुति की। उसके बाद वे मिलकर बचे हुए दैत्यों को मारने लगे, क्योंकि वे दैत्य वृत्रासुर के मारे जाने से दुःखी थे ॥९७॥ देवताओं के द्वारा मारे जाते हुए वायु के समान वेग वाले दानव भयभीत होकर अपार सागर में जाकर छिप गये॥९८॥ समुद्र जलचरों तथा रत्नों से भरा था । उसमें जाकर वे आपस में देवताओं को विनष्ट करने वाले अनेक प्रकार के साधनों पर विचार करने लगे ॥९९॥ देवताओं के भय से संतप्त तथा भयभीत दैत्यों ने सोचा कि त्रैलोक्य का नाश कर दिया जाय । विनाश का समय आ जाने के कारण वे सोचे कि ॥१००॥ सर्वप्रथम, तपस्या, इत्यादि साधनों का अनुष्ठान करने वालों का नाश करना चाहिए । क्योंकि सम्पूर्ण लोक तपस्या के बल पर टिके हुए हैं । अतएव सबसे पहले शीध्रता पूर्वक तपस्वियों का नाश कर देना चाहिए ॥१०१॥ पृथिवी पर जो भी तपस्वी तथा धर्म
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