Srishti Khanda Extracted Page 289
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-289
Sanskrit Original
चकार वज्रं भृशमुग्रवीर्यं कृत्वा च शस्त्रं तमुवाच हृष्टः । अनेन शस्त्रप्रवरेण देवभस्मीकुरुष्वाद्य सुरारिमुग्रम् ॥८०॥ ततो हतारिः सगणः सुखं त्वं प्रशाधि कृत्स्र त्रिदिवं दिविष्ठः । त्वष्ट्रा तथोक्तस्तु पुरंदरश्च वज्रं प्रहृष्टः प्रयतो ह्यागृह्णात् ॥८ ९॥ ततः स वञ्रेणयुतो दैवतैरभिपूजितः । आससाद ततो वृत्रंस्थितमावृत्यरोदसी ॥८२॥ कालकेयै र्महाकायै स्समंतादभिरक्षितम् । समुद्यतप्रहरणैः सश्गंगैरिव पर्वतैः ॥८ ३॥ ततो युद्धं समभवद्देवानां सह दानवैः । मुहुर्त भरतश्रेष्ठ लोकत्रास करं महत् ॥८४॥ उद्यतैः प्रतिसृष्टानां खड्गानां वीरबाहुभिः । आसीत्सुतुमलः शब्दः शरीरैरभिपाटितैः ॥८ ५॥ शिरोभिः प्रपतद्धिश्चाप्यंतरिक्षान्महीतलम् । तालैरिव महीपाल वृतं तैरेव दृश्यते ॥८६॥ ते हेमकवचा भूत्वा कालेयाः परिघायुधाः । त्रिदशानभ्यवर्तन्त दावदग्धा इवदट्टुमाः ॥८७॥ तेषां वेगवतां वेगं सहितानां प्रधावताम् । नशेकुः सहिताः सोढं भम्नास्ते प्राद्रवन्भयात् ॥८८॥ तान्दृष्ट्वा द्रवतो भीतान् सहस्राक्षः पुरंदरः। वृत्रं च बर्द्धमानं तु कश्मलं महदाविशत् ॥८ ९॥ तं शक्रं कश्मलाविष्टं दृष्ट्वा विष्णुः सनातनः। स्वतेजोव्यदधाच्छक्रे बलमस्यविवर्धयन् ॥९०॥ विष्णुनाप्यायितं शक्रं दृष्ट्वा देवगणास्तदा । सर्वे तेजस्समादध्युस्तथा ब्रह्मर्षयोमलाः ॥९१॥ स समाप्यायितः शक्रो विष्णुना दैवतैः सह । ऋषिभिश्च महाभागैर्बलवान्समपद्यत॥९ २॥ ज्ञात्वा बलस्थं त्रिदशाधिपं तं ननादवृत्रस्सुमहानिनादम् । तस्य प्रणादेन धरादिशश्च खं द्यौ नंगाश्चेति चचाल सर्वम् ॥९३॥ का निर्माण किया और कहा हे देव आज आप इस श्रेष्ठ शस्त्र से भयङ्कर देवशत्रु को भस्म कर दें ॥८०॥ उसके पश्चात अपने शत्रु को मारकर आप अपने गण के साथ त्रैलोक्य का प्रशासन करें । त्वष्टा के द्वारा इसतरह से कहे जाने पर इन्द्र ने प्रसन्नता पूर्वक उस वज्र को ले लिया ॥८१॥ वत्र के साथ विद्यमान इन्द्र की देवताओं ने पूजा की। उसके बाद इन्द्र वहाँ आये जहाँ पर वृत्रासुर भूमि से लेकर आकाश तक व्याप्त था ॥८२॥ विशालकाय कालकेय दैत्य चारो ओर से घेरकर उसकी रक्षा कर रहे थे । वे अपने आयुधों को उठायें हुए थे, वे शिखर से युक्त पर्वत के समान दिख रहे थे ॥८३॥ उसके बाद देवताओं के साथ दानवों का भयङ्कर युद्ध हुआ । हे भरतश्रेष्ठ ! मुहूर्त भर तो वह युद्ध संसार को भयभीत बना देने वाला हुआ ॥८४॥ वीर अपनी तलवारें उठाकर उनका प्रहार कर रहे थे । अत्यधिक शोरगुल हो रहा था । शरीरों से पृथिवी पट गयी थी ॥८५॥ आकाश से कटकर पृथिवी पर गिरने वाले तथा ताल फल के समान प्रतीत होने वाले शिरों से पृथिवी पट गयी ॥८६॥ दावाग्नि से दग्ध हुए वृक्षों के समान काले-काले कालेय दैत्य सुवर्ण के कवच पहन कर देवताओं पर टूट पड़े ॥८७॥ वेग पूर्वक आक्रमण करने वाले दैत्यों के आक्रमण को देवता नहीं वर्दास्त कर सके और वे भयभीत होकर भाग चले ॥८८॥ देवताओं को भयभीत होकर भागते हुए तथा वृत्रासुर को बढ़ते हुए देखकर इन्द्र भी अत्यधिक भयभीत हो गये ॥८९॥ भगवान् विष्णु ने इन्द्र को भयभीत देखा तो उन्होंने अपने तेज का इन्द्र में आधान करके इन्द्र के बल को बढाया ॥९०॥ विष्णु भगवान् के द्वारा समर्थ बनाये गये इन्द्र को देखकर देवताओं ने भी अपने तेज का आधान इन्द्र में कर दिया और महर्षियों ने भी अपने तेज का आधान किया ॥९१॥ भगवान् विष्णु देव समूह तथा महर्षियो के द्वारा पुष्ट बनाये गये इन्द्र बलवान् हो गये ॥९२॥ इन्द्र को बल सम्पन्न जानकर वृत्रासुर ने सिंहनाद किया, उसकी उस सिंह गर्जना से
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