Srishti Khanda Extracted Page 288
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-288
Sanskrit Original
एवमुक्तास्ततो देवा अनुज्ञाप्य पितामहम् । शतक्रतुं पुरस्कृत्य दधीचेराश्रमं ययुः ॥६९॥ सरस्वत्याः परे पारे नानाड्रुमलतावृतम् । षट्पदोद्वीतनिनदैरुदपुष्ट सामगैरिव ॥७०॥ पुं्कोकिलरवोन्मिश्रं जीवं जीवकनादितम् । महिषैश्च वराहैश्च सृमरै श्वामरैरपि ॥७१॥ तत्र तत्रानुचरितैः शार्दूलभयवर्जितैः। करेणुभि वारणैश्च प्रभिन्नकरटामुखैः ॥७२॥ स्वरोद्वारैश्च क्रीडद्भिः समंतादनुनादितम् । सिंहव्याघ्रै महानादं नदद्धिरनुनादितम्॥७ ३॥ मयूरैश्चापि संलीनै रगुहाकंदरवासिभिः। तेषु तेषु च कुंजेषु नादितं सुमनोरमम् ॥७४॥ त्रिविष्टपसमप्रख्यं दधीच्याश्रममागमन्। तत्रापश्यन् दधीचिं तं दिवाकरसमप्रभम् ॥७५॥ जाज्वल्यमानं वपुषा यथालक्ष्म्या चतुर्भुजम् । तस्य पादौ सुराराजन्नभिवंद्य प्रणम्य च ॥ अयाचंत वरं सर्वे यथोक्तं परमेष्ठिना ॥७६॥ ततो दधीचिः परमप्रतीतः सुरोत्तमांस्तानिदमित्युवाच । करोमि यद्दोहितमद्य देवाः स्वं वापि देहंत्वहमुत्सृूजामि ॥७७॥ तानेवमुक्त्वा द्विपदांवरिष्ठः प्राणांस्ततोसौ सहसोत्ससर्ज । सुरास्तदस्थीनि सवासवास्ते यथोपयोगं जगृहुः स्म तस्य ॥७८॥ प्रहृष्टरूपाश्च जयाय देवास्त्वष्टारमासाद्य तमर्थमूचुः । त्वष्टा तु तेषां वचनं निशम्य प्रहृष्टरूपः प्रयतः प्रयत्नात् ॥७९॥ महान् शत्रु का वध करने वाला अशनि शब्द से कहा जाने वाला दिव्य वज्र होगा ॥६७॥ उसी ब्रज से इन्द्र वृत्रासुर का वध करेंगे । मैंने आपलोगों को सारी बातें बतला दी अब आपलोग जाइये और प्रयास कीजिये ॥६८॥ ब्रह्माजी के इसतरह से कहने पर सभी देवता ब्रह्माजी से विदा लेकर इन्द्र को आगे करके महर्षि दधीचि के आश्रम में गये।६९॥ सरस्वती नदी के दूसरे तट पर अवस्थित, अनेक प्रकार के वृक्षों तथा लताओं से घिरे हुए उस आश्रम में भ॑वरे ऐसे गुन-गुना रहे थे जैसे सामवेद का वहाँ गान हो रहा हो ॥७०॥ वहाँ पर पुंस्कोकिलों की मधुर ध्वनि हो रही थी, जीवक पक्षी की भी ध्वनि सुनायी देती थी । सिंह के भय से निर्भय होकर वहाँ पर महिष, वराह, सृमर-चमर आदि पशु चर रहे थे । वहाँ पर जिनके गालों से मदवारि प्रवाहित हो रहा थे ऐसे हाथी मादा हाथी के साथ विद्यमान थे॥७१-७२॥ वे भी वहाँ पर बोल रहे थे तथा क्रीडा करते थे । गरजने वाले सिंह तथा व्याघ्र भी गरज रहे थे।।७३॥। गुफाओं तथा कन्दराओं में रहने वाले मयूर की विभिन्न कुञ्ों में बोलने की आवाज आ रही थी ।७४।। महर्षि दधीचि का वह आश्रम स्वर्ग के समान प्रतीत हो रहा था, उस आश्रम में सभी देवता आये । वहाँ पर देवताओं ने सूर्य के समान देदीप्यमान महर्षि दधीचि का दर्शन किया ॥७५॥ जिस तरह श्रीलक्ष्मीजी के द्वारा श्रीभगवान् का शरीर चमकता है उसीतरह महर्षि दधीचि का शरीर चमक रहा था । हे राजन् ! उन देवताओं ने महर्षि के चरणों में प्रणाम करके उनकी स्तुति की और अन्त में देवताओं ने ब्रह्माजी के कहे के अनुसार महर्षि से वरदान माँगा ॥७६॥ उसके बाद दधीचि महर्षि ने अत्यन्त प्रसन्नता पूर्वक देवताओं से कहा देवताओं यदि मुझे अपने शरीर का भी त्याग करना पड़े तो भी मैं अपने शरीर का त्याग करके आपलोगों का कल्याण करूंगा ॥७७॥ देवताओं से इस प्रकार कहकर मनुष्यों में श्रेष्ठ दधीचि महर्षि ने अपने शरीर का परित्याग कर दिया और इन्द्रादि देवताओं ने अपने उपयोगानुसार उनकी हड्डी को ले लिया ॥७८॥ वहाँ से देवतागण प्रसन्नता पूर्वक त्वष्टा के पास आकर अपने प्रयोजन को बतलाये। देवताओं की बात को सुनकर त्वष्टा प्रसन्नता पूर्वक अपने कार्य में लग गये ॥७९॥ उन्होंने उग्र पराक्रम सम्पन्न वज्र
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