Srishti Khanda Extracted Page 287

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-287

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Sanskrit Original

श्रीपद्यमहापुरण दक्षिणां दिशमास्थाय गायत्र्या राजसत्तम । पितृणां परमा तृप्तिः क्रियते द्वादशान्दिकी ॥५३॥ युगसहस्रं पिण्डेन श्राद्धेनानन्त्यमश्नुते । एतदर्थं हि विद्वांसः कुर्वते दारसंग्रहम् ॥५४॥ तीर्थे गत्त्वा प्रदास्यामः पिंडान्वै श्राद्धपूर्वकं । तेषां पुत्रा धनं धान्यमविच्छिन्ना च संततिः ॥५५॥ भवेद्वै नात्र संदेह एतदाह पितामहः । तर्पयित्वा पितृन्देवानग्निष्टोमफलं लभेत् ॥५६॥ आश्रमानपि ते वाच्मि शृणुष्वैकमना नृप। अगस्त्येन कृतश्चात्र आश्रमो देवसंमितः ॥५७॥ सप्तर्षीणां पुरा चात्र आश्रमो देवसम्मतः। ब्रह्मर्षीणां तथा चात्र मनूनां परमस्तथा ॥५८॥ नागानां च पुरी रम्या यज्ञपर्वतरोधसि। अगस्त्यस्य महाराज प्रभावममितात्मनः॥५९॥ कथयामि समासेन शृणु त्वं सुसमाहितः । पूर्व कृतयुगे भीष्म दानवा युद्धदुर्मदाः ॥६०॥ कालेया इति विख्याता गणाः परमदारुणाः। ते तु वृत्रं समाश्रित्य देवान् हंतुं समुद्यताः ॥६९॥ ततो देवाः समुद्विग्ना ब्रह्माणमुपतस्थिरे । कृतांजली स्तुतान्सर्वान्परमेष्ठीत्युवाच ह ॥६२॥ विदितं मे सुराः सर्व यद्वः कार्य चिकीर्षितम्। तमुपायं प्रवक्ष्यामि यथा वृत्रं वधिष्यथ ॥६३॥ दधीचिरिति विख्यातो महानृषिरुदारधीः । तं गत्वा सहितास्सर्वे वरं च प्रतियाचत ॥६४॥ स वो दास्यति धर्मात्मा सुप्रीतेनांतरात्मना । स वाच्यः सहितैः सर्वैर्भवद्धिर्जयकांक्षिभिः ॥६५॥ स्वान्यस्थीनि प्रयच्छस्व त्रैलोक्यहितकांक्षया । सशरीरं समुत्सृज्य स्वान्यस्थीनि प्रदास्यति ॥६६॥ तस्यास्थिभिर्महाघोरं वञ्रं संक्रियतां दृढम् । महच्छन्नुहनं दिव्यं तदस्त्रमशनिः स्मृतम् ॥६७॥ तेन वज्रेण वै वृत्रं बधिष्यति शतक्रतुः | एतद्वः सर्वमाख्यातं तस्मात्सर्वं विधीयताम् ॥६८॥ भीष्म उसको भी बारह वर्षो तक सन्ध्या करने का फल प्राप्त करता है ॥५२-५३॥ वहाँ पर पिण्डदान करने से पितरों को हजारों युगों तक अक्षय तृप्ति बनी रहती है । विद्वान् पुरुष इसीलिए विवाह करते हैं कि पत्नी के साथ तीर्थो में जाकर हम श्रद्धापूर्वक पितरों का श्राद्ध करेंगे । ऐसा करने वाले ब्राह्मणों के धन, सम्पत्ति तथा सन्तान अविच्छिन्न रूप से बने रहते हैं ॥५४-५५॥ पुष्कर तीर्थ में जाकर पितरों का तर्पण करने से अग्निष्टोमयाग करने का फल प्राप्त होता है, यह ब्रह्माजी ने कहा है ॥५६॥ हे राजन् ! अब मैं तुमको पुष्कर तीर्थ के आश्रमों का वर्णन सुनाता हूँ, उसे सावधानी से सुनो । पुष्कर में देवतुल्य महर्षि अगस्त्य ने अपना आश्रम बनाया है ॥५७॥ यहाँ पर देवताओं के प्रिय सप्तर्षियों का, ब्रह्मर्षियों का तथा मनुओं के भी श्रेष्ठ आश्रम हैं ॥५८॥ यहाँ पर्वत की तलहटी में नागों की मनोहर पुरी है । वहाँ पर अमितात्मा महर्षि आगस्त्य का प्रभाव देखा जाता है ॥५९॥ उनका मैं संक्षेप में वर्णन करता हूँ; तुम सावधानी पूर्वक सुनो । हे राजन् पहले के सत्ययुग में युद्ध के मद में मदमत्त रहने वाले ॥६०॥ कालेय नाम से विख्यात दानवों का समूह हुआ । वह अत्यन्त भयङ्कर समूह था । वे सब वृत्रासुर के साथ मिलकर देवताओं को मार डालने के लिए तैयार हो गये ॥६१॥ उसके कारण उद्विग्न होकर देवता ब्रह्माजी के शरण में गये । हाथ जोड़े हुए देवताओं को देखकर ब्रह्माजी ने कहा ॥६२॥ देवताओं आपलोग जो कहना चाहते हैं, उसे मैं जानता हूँ ! आपलोगजिस तरह से वृत्रासुर का वध कर पायेंगे, उस उपाय को मैं आपलोगों को बतलाता हूँ ॥६३।। अत्यन्त उदार बुद्धि वाले महर्षि दधीचि हैं, उनके पास जाकर आपलोग उनसे वरदान माँगे ॥६४॥ वे धर्मात्मा अपनी अन्तरामा से प्रसन्न होकर आपलोगों को वरदान देंगे । उसके बाद विजय चाहने वाले आपलोग उनसे कहें कि ॥६५॥ त्रैलोक्य का कल्याण करने के लिए वे अपनी हड्डियों को प्रदान करें । ऐसा करने से वे अपने शरीर का परित्याग करके आपलोगों को अपनी हड्डी प्रदान कर देंगे ॥६६॥ उनकी हड्डियों सेआपलोग भयङ्कर वज्र का निर्माण करें । वह वज्र महान् से

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