Srishti Khanda Extracted Page 285

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-285

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

ब्रह्मलोकमवाप्रोति गतिं च परमां व्रजेत् । नृलोके देवदेवस्य तीर्थ त्रैलोक्यविश्रुतम् ॥२४॥ पुष्करं नाम विख्यातं महापातकनाशनम् । दशकोटिसहस्राणि तीर्थानां वै महीपते ॥२५॥ सान्निध्यं पुष्करे येषां त्रिसन्ध्यं कुलनन्दन । आदित्या वसवो रुद्रास्साध्याश्च समरुद्गणाः ॥२६॥ गन्धर्वाप्सरसश्चैव नित्यं सन्निहिता विभोः । यत्र देवास्तपस्तप्त्वा दैत्या ब्रह्मर्षयस्तथा ॥२७॥ दिव्ययोगा महाराज पुण्येन महतान्विता: । मनसाप्यभिकामस्य पुष्कराणि मनस्विनः ॥२८॥ पूयन्ते सर्वपापानि नाकपृष्ठे समोदते। तस्मिंस्तीर्थे महाराज नित्यमेव पितामहः ॥२९॥ उवास परमप्रीतो देवदानवसम्मतः । पुष्करेषु महाराज देवास्सर्षि पुरोगमाः ॥३०॥ सिद्धिं च समनुप्राप्ताः पुण्येन महतान्विताः । तत्राभिषेकं यः कुर्यात्पितृदेवार्चने रतः ॥३१॥ अश्वमेधाद्दशगुणं प्रवदंति मनीषिणः । अप्येकं भोजयेद्विप्रं पुष्करारण्यमाश्रितः ॥३२॥ अन्नेन तेन संप्रीता कोटिर्भवति पूजिता । तेनासौ कर्मणा भीष्म प्रेत्य चेह च मोदते ॥३३॥ शाकैर्मूलैः फलैर्वापि येन वा वर्त्तयेत्स्वयम् । तद्वै दद्याद्वाह्मणाय श्रद्धावाननसूयकः ॥३४॥ तेनैव प्राप्तुयात्प्राज्ञो हयमेधफलं नरः । ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो वा राजसत्तम ॥३५॥ पैतामहं सरः पुण्यं पुष्करं नाम नामतः। वैखानसानां सिद्धानां मुनीनां पुण्यदं हि यत् ॥३६॥ सरस्वती पुण्यतमा यस्माद्याता महार्णवम् । आदिदेवो महायोगी यत्रास्ते मधुसूदनः ॥३७॥ ख्यात आदिवराहेति नाम्रात्रिदशपूजितः । हीनवर्णाश्च ये वर्णा्तीर्थे पैतामहे गताः ॥३८॥ विष्णुलोक में जाकर पूजित होता है । वहाँ पर स्नान करने वाला मनुष्य चन्द्रमा के समान स्वच्छ हो जाता है ॥२३॥ वह व्यक्ति, मृत्यु के पश्चात् ब्रह्मलोक में जाता है और परमा गति को प्राप्त कर लेता है । वह मनुष्यलोक में देवाराध्य ब्रह्माजी का सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है और त्रैलोक्य में विख्यात है ॥२४॥ पुष्कर नाम का तीर्थ महापातकों का विनाश करने वाले तीर्थ के रूप में विख्यात है । हे राजन् ! पुष्कर तीर्थ में दश हजार तीर्थ हें ॥२५॥ वहाँ पर आदित्यगण वसुगण, रुद्रगण, साध्यगण, मरुद्गण, गन्धर्वो तथा अप्सराओं का तीनों सन्ध्याओं (प्रातः, मध्याह्न तथा सायम्) में सान्निध्य बना रहता है । वहाँ पर तपस्या करके, दैत्य तथा ब्रह्मर्षिण ॥२६-२७॥ दिव्ययोग से युक्त तथा महापुण्य से सम्पन्न हो जाते हैं । वे मन से भी जिसकी कामना करनी चाहिए ऐसे पुष्कर तीर्थ में स्नान करके अपने समस्त पापों का प्रक्षालन करके स्वर्गलोक में आनन्दानुभव करते हैं । हे महाराज ! उस तीर्थ में देवता एवं दानव दोनों के पूज्य ब्रह्माजी अत्यन्त प्रेम पूर्वक नित्य ही निवास करते है । हे महाराज ! तीनों पुष्करों में देवतागण और ऋषिगण।।२८-३०॥ महान् पुण्य से युक्त होकर सिद्धि प्राप्त कर लिए देवताओं और पितरों की अर्चना करने वाला जो व्यक्ति वहाँ पर स्नान करता है ॥३१॥ उसको अश्वमेध यज्ञ के दश गुणा फल मिलता है, यह मनीषिगण कहते हैं । पुष्करारण्य में यदि कोई एक भी ब्राह्मण को भोजन कराता है ॥३२॥ उसको करोड़ ब्राह्मणों को भोजन कराने का फल प्राप्त होता है । हे भीष्म जी ! उस कार्य को करके वह व्यक्ति इस लोक में और परलोक में अनन्दानुभव करता है ॥३३॥ नवीन शाक, मूल, फल इत्यादि जो कुछ भी मिले उसको बिना किसी असूया के श्रद्धापूर्वक ब्राह्मण को प्रदान करना चाहिए ॥३४॥ ऐसा करने वाला मनुष्य अश्वमेध यज्ञ करने का फल प्राप्त करता है । हे राजश्रेष्ठ ! वह चाहे ब्राह्मण हो, या क्षत्रिय हो, या वैश्य हो ब्रह्माजी का पुष्कर सरोवर अत्यन्त पवित्र है । वह वैखानसों, सिद्धं तथा मुनियों को पुण्य प्रदान करने वाला है ॥३६॥ इस तीर्थ से अत्यन्त विख्यात सरस्वती नदी महार्णव में गयी है। यहीं पर आदि देव भगवान् वराह विराजते हैं ॥३७॥ ये आदि वराह के नाम से विख्यात हें तथा देवताओं से पूजित

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know