Srishti Khanda Extracted Page 284
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-284
Sanskrit Original
प्रतिग्रहादुपावृत्त: संतुष्टो येन केनचित् । अहँकारनिवृत्तश्न सतीर्थफलश्नुते।।९॥ अक्रोधनश्व राजेंद्र सत्यशीलो दृढव्रतः । आत्मोपमश्च भूतेषु स तीर्थफलमश्नुते॥१०॥ ऋषीणां परमं गुह्ामिदं भरतसत्तम। पूर्व यत्र महाराज सत्रे पैतामहे तथा ॥११॥ यतीनामुग्रतपसां येषां कोटिः समागता । मुखदर्शनमाश्रित्य स्थितास्ते ज्येष्ठ पुष्करे ॥१२॥ सुरूपतां परां लब्ध्वा प्रीतास्ते मुनिसत्तमाः । हर्षेण महता विष्टा ब्रह्मदर्शनकांक्षिणः ॥१३॥ यज्ञोपवीतैस्ते भूमिं माप्य सर्वे चतुर्दिशं । कृत्वा तीर्थ विभागं च स्थिता भक्तिपरायणाः॥१४॥ आसन्नश्च॒ ततस्तेषां तदा तुष्टः पितामहः । कोटिं कृवा तदा तेषां मानं दृष्ट्वा मनीषिणाम्॥१५॥ अद्य प्रभृति युष्माकं धर्मवृद्धिर्भविष्यति। इहागत्य नरो यो वै यदंगंप्रथमं जले ॥१६॥ प्लावयिष्यति रूपार्थं रूपिता तीर्थ करिता । भविष्यति न संदेहो योजनायतमंडले ॥१७॥ अर्धयोजनविस्तारं दीर्घ सार्धं हि योजनम् । एतत्प्रमाणं तीर्थस्य ऋषि कोटिप्रवर्त्तितम् ॥१८॥ गमनादेव राजेद्र पुष्करस्य त्वरिंदम । राजसूयाश्वमेधाभ्यां फलमाप्रोति मानवः॥१९॥ सरस्वती महापुण्या प्रविष्टा ज्येष्ठपुष्करे । तत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयः सिद्धचारणाः ॥२०॥ अभिगच्छति राजेद्र चैत्र शुक्लचतुर्दशी। तत्राभिषेकं कुर्वीत पितृदेवार्चने रतः ॥२९॥ गोमेधं च तदाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् । एवं तीर्थविभागस्तु कृतस्तैस्तु महर्षिभिः ॥२२॥ पितृन् देवांश्च सन्तर्प्य विष्णुलोके महीयते । तत्र स्नात्वा भवेन्मत्यों विमलश्चन्द्रमा यथा ॥२३॥ सुसंयत रहते हैं, वही तीर्थ के फलों को प्राप्त करता है ॥८॥ जो कोई भी दान नहीं लेता है, जो कुछ भी मिल जाय उसी से सन्तुष्ट रहने वाला तथा जो अहङ्कार से रहित होता है, उसे ही तीर्थ का सम्पूर्ण फल प्राप्त होता है ॥९॥ हे राजेन्द्र ! जो क्रोध रहित, सत्य का पालन करने वाला तथा दृढतापूर्वक व्रत का पालन करने वाला होता है, तथा सभी जीवों में आत्मबुद्धि करता है, वह तीर्थ के फलों को प्राप्त करता है ॥१०॥ हे भरतश्रेष्ठ ! यह ऋषियों का परम रहस्यात्मक सिद्धान्त हे । हे महाराज ! जहाँ पर प्राचीन काल में ब्रह्माजी के यज्ञ में ॥११॥ करोड़ों उग्र तपस्वी आये और अपने मुख का दर्शन करके ज्येष्ठ पुष्कर में निवास किए ॥१२॥ वे अपने अत्युत्कृष्ट सुरूपता को प्राप्त करके अत्यन्त प्रसन्न हुए । अत्यन्त हर्षित होकर वे ब्रह्माजी का दर्शन करना चाहते थे ॥१३॥ वे लोग चारो दिशाओं में भूमि को माप करके भक्ति पूर्वक तीर्थो का विभाग करके वहीं स्थित हो गये ॥१४॥ उन सबों से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी उनके सन्निकट रहने लगे । उन ऋषियों के सम्मान को करोड़ों गुणा बढाकर कहे ।।१५।। आज तक आपलोगों के धर्म की वृद्धि होती रहेगी । यहाँ पर आकर जो मनुष्य अपने जिस अंग को सर्वप्रथम जल में ॥१६॥ रूप की प्राप्ति के लिए इस रूप को करने वाले तीर्थ में डालेगा, वह सुन्दर रूप वाला हो जायेगा इसमें कोई सन्देह नहीं है । ऋषियों ने आधा योजन (दो कोस) चौड़ा तथा ढाई योजन (दश कोस) लम्बा इस तीर्थ का निर्माण किया है । इसमें उन ऋषियों ने करोड़ों तीर्थो को बनाया है ॥१७-१८॥ हे राजेनद्र ! पुष्कर तीर्थ में जाने मात्र से ही कोई मनुष्य राजसूय तथा अश्वमेध नामक दोनों यज्ञों के फल को प्राप्त कर लेता है ॥१९॥ महापुण्या सरस्वती नदी ज्येष्ठ पुष्कर में ही सर्वप्रथम प्रवेश की है वहाँ पर ब्रह्मा आदि सभी देवता, ऋषिगण सिद्ध तथा चारणगण ॥२०॥ चेत्र मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को जाते हैं । वहाँ पर जाकर स्नान करके पितृगण तथा देवगण की अर्चना करनी चाहिए ।।२१।। ऐसा करने वाला व्यक्ति गोमेध यज्ञ का फल प्राप्त करके अपने वंश का उद्धार कर देता है । इस तरह से महर्षियों ने वहाँ पर तीर्थो का विभाग किया है ॥२२॥ वहाँ पर पितरों तथा देवताओं की तृप्ति करके जीव
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