Srishti Khanda Extracted Page 283

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-283

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Sanskrit Original

उन्नीसवाँ अध्याय भीष्म उवाच पुष्करस्य च नंदायाः श्रुतं महाम्यमुत्तमम्। ऋषिकोटिर्यदा याता पुष्करे मुखदर्शनात् ॥१॥ सर्वैः सुरूपतालब्धा सर्वमेतन्मया श्रुतम्। यज्ञोपवीतै भक्तानि यानि तानि वदस्व मे ॥२॥ कथं तीर्थविभागस्तु कृतस्तैस्सुमहात्मभिः । आश्रमे यानि तीर्थानि कृतान्यपि महर्षिभिः ॥३॥ पदन्यासः कृतः पूर्व विष्णुना यज्ञपर्वते । नागैस्तत्र पंच तीर्थं कृतं तैस्तु महाविषैः ॥४॥ पिंडप्रदानवापी च केनपूर्व विनिर्मिता। उदङ्मुखी भूमिगता कथं गङ्गा सरस्वती ॥५॥ ब्राह्मणैवेंदविद्वद्धि: कथं यात्रा त्रिपुष्करे। कर्तव्या यत्फलं तस्या जायते तद्वदस्व मे ॥६॥ पुलस्त्य उवाच प्रश्नभारो महानेष भवता परिकल्पितः । तदेकाग्रमना भूत्वा श्ृणु तीर्थमहाफलम्॥७॥ यस्य हस्तौ च पादौ च मनश्चैव सुसंयतम्। विद्यातपश्च कीर्तिश्च स॒ तीर्थफलमश्नुते ॥८॥ ऋषियों द्वारा यज्ञोपवीत से नाप कर तीर्थो का विभाग, ब्राह्मणों तथा ऋषियों को वरदान, पुष्कर क्षेत्र का माहात्म्य, पुष्कर में ब्रह्मर्षियो के आश्रम आदि का वर्णन, अगस्त्य महर्षि के प्रभाव का वर्णन, वृत्रासुर के वध की कथा, देवताओं की ऋषि दधीचि से प्रार्थना, दधीचि ऋषि की हड्डी से वञ्र का निर्माण, इन्द्र द्वारा वज्र से वृत्रासुर का वध, इन्द्र का सरोवर में प्रवेश, देवताओं से भयभीत कालेय असुरों का समुद्र में प्रवेश, कालेय कृत उपद्रवो का वर्णन, देवताओं द्वारा भगवान् विष्णु की स्तुति, भगवान् विष्णु की आज्ञा से देवताओं द्वारा आगस्त्य महर्षि के आश्रम में जाकर उनकी स्तुति, अगस्त्य महर्षि द्वारा विन्ध्यगिर को झुकाया जाना, अगस्त्य महर्षि का समुद्र को पीना, देवताओं द्वारा कालेय का वध, ब्रह्माजी की आज्ञा से भागीरथी द्वारा समुद्र को भरना, पुष्कर क्षेत्र में श्राद्ध इत्यादि की विधि, अवर्षण तथा दुर्भिक्ष से त्रस्त ऋषियों द्वारा -मरे हुए कुमारों के शरीर को पकाने पर उनका राजा से संवाद, दान लेने के दोष, शान्ति प्रशंसा, द्रव्यों के संग्रह तथा तृष्णा के दोष, सन्तोष की प्रशंसा, काम दोष का वर्णन, दान न लेने का फल, भूखों की अवस्था का वर्णन, अन्न की प्रशंसा, अन्नदान की प्रशंसा, दम आदि का वर्णन, शान्त के लक्षण, शान्ति तथा क्षमा की प्रशंसा और मध्यपुष्कर का महात्म्य वर्णन भीष्मजी ने कहा-- आपने मुझे पुष्कर तीर्थ के नन्दातीर्थ का उत्तम माहात्म्य सुनाया कि करोड़ों ऋषि पुष्कर में अपना मुख देखकर ॥१॥ सुन्दर रूप वाले हो गये । इसके बाद उन लोगों ने अपने यज्ञोपवीत से नाप कर जिन तीर्थो का विभाग किया उसे आप मुझे बतलायें ॥२।। उन माहात्माओं ने किस प्रकार से तीर्थो का विभाग किया और उन महर्षियों ने अपने आश्रमों में जिन तीर्थो का निर्माण किया उसे भी आप बतलाइये ॥३॥ सर्वप्रथम भगवान् विष्णु जो यज्ञ पर्वत पर आये और वहाँ पर महाविषैले नागों ने पाँच तीर्थो का निर्माण किया, उसे बतलाइयें ॥४॥। सर्वप्रथम पिण्डप्रदान वापी का निर्माण किसने किया ? क्यों सरस्वती गङ्गा भूमि के भीतर चली गयीं । वेदज्ञ ब्राह्मणों को तीनों पुष्करों की यात्रा कैसे करनी चाहिए ? उस यात्रा से होने वाले फल को आप मुझे बतलायें ।।५-६।। पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- आपने तो यह प्रश्नों केबहुत बड़े भार की कल्पना की है अतएव एकाग्रमना होकर आप इस तीर्थ में पराप्त होने वाले महान् फल का श्रवण करें ॥७॥ जिस के हाथ, पैर तथा मन एवं विद्या, तपस्या और यश अयन्त

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