Srishti Khanda Extracted Page 280

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-280

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Sanskrit Original

तदादिशस्व संक्षेपान्नकालो विस्तरस्य तु। धेनुरुवाच तपः कृते प्रशंसंति त्रेतायां ज्ञानमेव च ॥४३७॥ द्वापरे यज्ञमित्याहुदनमेकं कलौ युगे । सर्वेषामेव दानानामिदमेवैकमुत्तमम् ॥४ ३८॥ अभयं सर्वभूतानां नास्ति दानमतः परम् । चराचराणां भूतानामभयं यः प्रयच्छति ॥४३९॥ स च सर्वभयान्मुक्तः परंब्रह्माधिगच्छति । नास्त्यहिसां समं दानं नास्त्यहिंसासमं तपः ॥४४०॥ यथाहस्ति पदेष्वन्यत्पदं सर्व॑ प्रलीयते । सर्वे धर्मास्तथा व्याघ्र प्रलीयंते ह्वाहिंसया ॥४४९॥ योगवृक्षस्य छाया या तापत्रयविनाशिनी । धर्मज्ञाने च पुष्पाणि स्वर्गमोक्षौ फलानि च ॥४४२॥ दुः खत्रयाभितप्तस्य छाया योगतरोः स्मृता । नबाध्यते पुनर्दुः खैः प्राप्य निर्वाणमुत्तमम् ॥४४३॥ इत्येतत्परमं श्रेयः कीर्तितं ते समासतः । ज्ञातं चैव त्वया सर्व केवलं मां तु पृच्छसि॥४४४॥ दीप्युवाच अहं मृग्या पुरा शप्तो व्याघ्ररूपेण संस्थितः । ततः प्राणिवधात्सर्वमशेषं मम विस्मृतम्॥४४५॥ त्वत्संपर्कोपदेशाभ्यां संजातं स्मरणं पुनः। त्वं चाप्यनेन सत्येन गमिष्यसि परां गतिम् ॥४४६॥ तदहं त्वां पुनः पृच्छे प्रश्नमेकं हृदि स्थितम् । साग्रंवर्षशतं जातं चिंयानस्य मे शुभे ॥४४७॥ भवत्या भाग्ययोगेन कदाचित्स्वर्गशोभने । कृतं धर्मस्य संस्थानं सतां मार्गे प्रतिष्ठितम् ॥४४८॥ पवर्त पर चढकर में उससे गिर पडूंगा अथवा जलती हुयी अग्नि में प्रवेश कर जाऊंगा । हे धेनो ! तुम उस तपस्या को बतलाओ जिससे मेरी पाप से शुद्धि हो सके ॥४३६॥ उसे तुम मुझे संक्षेप में बतलाओं अब मेरे पास अधिक समय नहीं है । धेनु ने कहा-- सत्ययुग में विज्ञ पुरुष तप की प्रशंसा करते हे, त्रेतायुग में वे ज्ञानकी प्रशंसा करते हें ॥४३७॥। द्वापर में ऋषियों ने यज्ञ को श्रेष्ठ बतलाया हे और कलियुग में केवल दान को श्रेष्ठ बतलाया गया है । सभी दानों में श्रेष्ठ दान ॥४३८॥ यही है कि सभी जीव को अभय प्रदान किया जाय, इससे बढकर कोई भी दूसरा दान नहीं है । जो समस्त चर एवं अचर जीवों को अभय दान करता है ॥४३९॥ वह सभी भयों से मुक्त होकर परंब्रह्म को प्राप्त कर लेता है । अहिंसा के समान न तो कोई दान है और न तो अहिंसा के समान कोई तप हे॥४४०॥ जिस तरह हाथी के पैर में सबों के पैर समा जाते हैं, उसीतरह हे व्याघ्र ! सभी धर्म अहिंसा में ही आ जाते हैं ॥४४१॥। भोग रूपी वृक्ष की छाया तीनों प्रकार के तापों को विनष्ट कर देने वाली है । धर्म और ज्ञान उसके पुष्प हैं तथा स्वर्ग की प्राप्ति तथा मोक्ष की प्राप्ति उसके फल हैं ॥४४२॥ दुःखत्रय से संतप्त व्यक्ति के लिए योग रूपी वृक्ष की छाया आवश्यक बतलायी गयी है । उसके द्वारा निर्वाण को प्राप्त करके जीव पुन: दुःख को नहीं प्राप्त करता है । मैंने संक्षेप में इस परमकल्याण के साधन को बतलाया है । तुम स्वयं भी इन सारी बातों को जानते हो केवल मुझसे पूछ रहे हो ॥४४४॥ सिंह ने कहा-- बहुत पहले मृगी ने मुझे शाप दे दिया था, उसी के कारण मैं व्याघ्र हो गया हूँ उसके कारण प्राणियों का वध करने के कारण मैं सब कुछ भूल गया ॥४४५॥ तुम्हारे संपर्क तथा उपदेश के कारण मुझको वे सारी बातें याद आ गयी हैं तुम भी इस सत्य के द्वारा मुक्ति को प्राप्त कर लोगी॥४४६॥ मेरे हृदय में एक और प्रश्न है, उसे मैं तुमसे पूछना चाहता हूँ, हे शुभे ! चिन्ता करते हुए सौ वर्ष से अधिक बीत गये ॥४४७॥ मेरे सौभाग्य से आकर तुमने मुझे धर्म के स्वरूप को बतलाया और मैं धर्म मार्ग में प्रतिष्ठित हो गया॥४४८॥ हे सुव्रते ! में अज्ञानी हूँ । बतलाओ तुम्हारा नाम क्या हैं ? नन्दा ने कहा-- मेरे स्वामी का नाम

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