Srishti Khanda Extracted Page 279
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-279
Sanskrit Original
कुरुतृप्ति यथाकाममस्मन्मांसेन सांप्रतम्। संतर्पयस्व भूतानि पिब त्वं शोणितं मम ॥४२२॥ मृतायां तु मयि त्वंभो भक्षयेमं तु बालकम् । द्वीप्युवाच स्वागतं तव कल्याणि धेनुके सत्यवादिनि ॥४२३॥ नहि सत्यवतां किंचिदशुभं भवति क्वचित् । त्वयोक्तं धेनुके पूर्व सत्यं प्रत्यागमे पुनः॥४२४॥ तेन मे कौतुकं प्राप्तं प्राप्तागच्छेत्कथं पुनः । तव सत्यपरीक्षार्थं प्रेषितासि मया पुनः॥४२५॥ अन्यथा मां समासाद्य जीवंती यास्यसे कथम् । यच्च नः कौतुकं जातं सत्यमन्वेषणं मम ॥४२६॥ तस्मादनेन सत्येन मुक्तासि च मयाधुना। भगिनी भवती मह्यां भागिनेयः सुतस्तव ॥४२७॥ दत्तोपदेशस्य शुभे मम पापिष्ठकर्मणः। सत्ये प्रतिष्ठिता लोका धर्मः सत्ये प्रतिष्ठितः॥४२८॥ सत्येन गौः क्षीरधारां प्रमुंचति हविःप्रियाम् । स वै धन्यतमो गोपो यस्त्वतक्षीरेण जीवति ॥४२९॥ भूमिप्रदेशा धन्यास्ते सतृणा वीरुधः शुभे। ते धन्याश्च कृतार्थाश्च तैरेव सुकृतं कृतम् ॥४३०॥ तैराप्तं जन्मनः सारं येपिबंति पयस्तव । मृगेंद्र प्रत्ययं गत्वा विस्मयं परमं गतः ॥४३९॥ प्रत्यादेशोऽयमस्माकं सत्यं देवैः प्रदर्शितः । सत्यमिष्टं गवां दृष्ट्वा न मे वाञ्छास्ति जीवितुम्॥४ ३ २॥ तत्करिष्याम्यहं कर्म येन मुच्येय किल्विषात्। मया जीवसहस्राणि भक्षितानि शतानि च ॥४३३॥ गतिं कामिह गच्छामि दृष्ट्वा गोः सत्यमीदृशम् । अहं पापो दुराचारो नृशंसो जीवघातकः ॥४३४॥ कांस्तुलोकानगमिष्यामि कृत्वा कर्म सुदारुणम् । गमिष्ये पुण्यतीर्थानि करिष्ये पापशोधनम् ॥४३ ५॥ पतिष्ये गिरिमारुह्य प्रवेक्ष्ये वा हुताशनम् । धेनोद्य यन्मयाकार्यं तपः पापाद्विशुद्धये ॥४३६॥ भूतों की तृप्ति करो मेरे खून को पीओ ॥४२२॥ मेरे मर जाने के बाद तुम मेरे इस बच्चे को मारना । सिंह ने कहा- हे सत्यवादिनि ! क्ल्याणि ! तुम्हारा स्वागत है ॥४२३॥ सत्य बोलने वालों का कहीं भी अकल्याण नहीं होता है । हे गौ तुमने पहले कहा था कि सत्य के बल पर मैं लौटकर आऊंगी ॥४२४।। उससे मुझे यह जानने की उत्कण्ठा हुयी कि, किसी तरह से त्राण पायी हुयी यह कैसे आती है ? तुम्हारे सत्य की परीक्षा करने के ही लिए मेने तुम्हें भेज दिया था ॥४२५॥ अन्यथा मुझको प्राप्त हो जाने पर तुम जिन्दा कैसे जा सकती थी ?। मुझको जो कौतुक हुआ था उसका अन्वेषण सत्य हुआ ॥४२६॥ इस सत्य के ही बल पर तुम मुझसे मुक्त हो गयी ।तुम मेरी बहन हो और तुम्हारा यह पुत्र मेरा भाँजा है ॥४२७॥ हे शुभे ! तुमने मुझे सत्य का उपदेश दिया है मैं तो पापी हूँ ।सारे लोक सत्य पर ही स्थित हैं, सत्य पर ही धर्म टिका हुआ है । सत्य के ही बल पर गौ हविष्य के लिए प्रिय दुग्ध की धारा बहाती है । वह गोप धन्य है जो तुम्हारे दुग्ध से जीवित रहता है ॥४२९॥ हे शुभे ! वहाँ के तृण और लताओं से युक्त भूमि भी धन्य है । जो लोग धन्य तथा कृतार्थ हैं, वस्तुत उनलोगों ने ही पुण्य किया है ॥४३०॥ उनलोगों ने ही जीवन का सारांश प्राप्त किया है जो लोग तुम्हारा दूध पीते हैं । वह सिंह विश्वस्त होकर अत्यन्त आश्चर्यित था ॥४३१।। यह देवताओं की कृपा है जो हमलोगों को सत्य दिखलाता है । गौओं को सत्य अभिप्रेत हैं इस बात को देखकर अब मैं जीवित नहीं रहना चाहता हूँ ॥४३२॥ अब मैं वही कर्म करूंगा जिसके कारण मैं पाप मुक्त हो सकूँ । मैंने सैकड़ों हजारों जीवों को खा लिया है । गौ को इस प्रकार सत्य अभिप्रेत देखकर न जाने मेरी कौन सी गति होगी । मै पापी, दुराचारी, नृशंस (क्रूर) तथा जीवों को मारने वाला हूँ ॥४३४॥ इन अत्यन्त दारुण कर्मों को करके मैं न जाने किन लोकों में जाऊंगा । मैं पवित्र तीर्थो में जाकर अपने पापों का प्रायश्चित करूँगा।४३५॥
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