Srishti Khanda Extracted Page 278

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-278

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

अवियोगं च पश्यामस्त्यागादस्मात्सुतेन हि । नार्याः कल्याणचित्तया नापदः संति कुत्रचित्॥४ ० ७॥ दृष्टवागोपीजनं सर्व परिक्रम्य च गोकुलम् । नंदा संप्रस्थिता देवान् वृक्षांश्रापछय सा पुनः॥४०८॥ क्षितिं वरुणमग्मिं च वायुं चापि निशाकरम् । दशदिग्देवतावृक्षान्नक्षत्राणि ग्रहैः सह ॥४०९॥ सर्वान्विज्ञापयामास प्रणिपत्य मुहुर्मुहुः । ये संश्रिता वने सिद्धाः सर्वाश्च वनदेवताः ॥४१०॥ वनेचरंतं च तृणं ते रक्षंतु सुतं मम। चंपकाशोकपुन्नागास्सरलार्जुनरकिंशुकाः ॥४९९॥ शृण्वंतु पादपाः सर्वे संदेशं मम विक्लवम्। वत्समेकाकिनं दीनं चरंतं विषमे वने ॥४१२॥ रक्षध्वं वत्सकं बालं स्नेहात्पुत्रमिवौरसम्। मात्रा पित्रा विहीनं च अनाथं दीनमानसम् ॥४१३॥ विचरंतमिमां भूमिं क्रंदमानं सुदुःखितम् । तस्येह क्रंदमानस्य मत्पुत्रस्य महावने ॥४ १४॥ महाशोकाभिभूतस्य क्षुत्पिपासातुरस्य च । शून्यस्यैकाकिनः सर्व जगच्छून्यं प्रपश्यतः ॥४९५॥ चरमाणस्य कर्तव्यं सानुक्रोशैस्तु रक्षणम् । संदिश्य नंदा प्ररीत्यैवं पुत्रस्नेहवशं गता ॥४१६॥ शोकाम्निना च सन्दीप्ता विच्छिन्ना पुत्र दर्शने । वियुक्ता चक्रवाकीव लतेव पतिता तरोः ॥४१७॥ अंधेव दृष्टिरहिता प्रस्खलंती पदे पदे। अगच्छत्सा पुनस्तत्र यत्रासौ पिशिताशनः ॥४१८॥ आस्ते विस्फूर्जितमुखस्तीक्ष्णदंष्रो भयावहः । तावत्तस्याः सुतो वत्स उदर्ध्व पुच्छोति वेगवान्॥४ १९॥ आगत्य मातुरग्रेऽसौ मृगेद्रस्याग्रतो भवत् । आगतं तु सुतं दृष्ट्वा मृत्युं तमग्रतः स्थितम्॥४२०॥ व्याघ्रं दृष्ट्वा तु सा धेनुरिदं वचनमब्रवीत् । भो भो मृगेंद्रागताहं सत्यधर्मब्रते स्थिता ॥४२९॥ सकती है तुम तो धर्मधुरन्धर हो । इस त्याग के द्वारा तो त्रैलोक्य में सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है ॥४०५-४०६॥ हमलोग इस त्याग से समझती हैं कि तुम्हारा तुम्हारे पुत्र का वियोग नहीं होगा । कल्याण मार्ग में प्रवृत नारी के ऊपर कोई भी विपत्ति नहीं आती है ॥४०७॥ सभी गायों से मिलकर गोशाला की परिक्रमा करके तथा उसे प्रणाम करके नन्दा ने देवताओं और वृक्षों से विदा लेकर प्रस्थान किया ॥४०८॥ पृथिवी, वरुण (जल) अग्नि, वायु, चन्द्रमा, दशो दिक्पाल, देवताओं, वृक्षों, क्षेत्रों तथा ग्रहों ॥४०९॥ इन सबों को बार-बार प्रणाम करके नन्दा ने निवेदन किया इस वन में रहने वाले जितने भी सिद्धजन और वन देवता हैं ॥४१०॥ वे सब वन में घास चरने वाले मेरे पुत्र की रक्षा करें । चम्पक, अशोक, पुन्नाग, सरल, अर्जुन तथा पलाश मेरी वाणी सुनें । यह मेरा अन्तिम सन्देश हैं अकेले तथा दीन इस वन में चरने वाले मेरे वत्स को ॥४११-४१२॥ आपलोग मेरे छोटे बछड़े को अपने बच्चे के समान रक्षा करें माता-पिता से रहित, अनाथ तथा दुःखी मन वाले ॥४१३॥ इस भूमि में चरते हुए तथा दुःखी होकर रोते हुए मेरे पुत्र की रक्षा आपलोग इस वन में करेंगे ॥४१४।। अत्यधिक शोक से संतप्त तथा भूख-प्यास से व्याकुल अकेले रहने वाले, शून्य तथा सम्पूर्ण संसार को शून्य देखने वाले चरते हुए मेरे बच्चे की रक्षा आपलोग कृपा करके करेंगे । अपने पुत्र के प्रति स्नेहिल नन्दा ने सबों को इस तरह से सन्देश देकर ॥४१५-४१६॥ शोकाग्नि से सन्तप्त अपने बच्चे की आँखों से ओझल होकर, चकवे से अलग हुयी चकई के समान वृक्ष से गिरी हुयी लता के समान ॥४१७॥ अन्धी के समान दृष्टि रहित पद-पद पर गिरती पड़ती हुयी वहाँ आयी जहाँ पर वह मांसभक्षी अपना मुख खोले हुये तीक्ष्ण दाँतों वाला भयङ्कर व्याघ्र था । उसी समय उसका बछड़ा भी पूंछ उठाये हुए अत्यन्त वेग पूर्वक ॥४१८-४१९।। आकर अपनी माता के आगे तथा उस सिंह के सामने खड़ा हो गया अपने बच्चे को आये हुए तथा उसके सामने खड़ी मृत्यु को देखकर ॥४२०॥ उस व्याघ्र से उस गौ ने कहा हे मृगेन्द्र ! सत्य धर्म का पालन करती हुयी मैं आ गयी हूँ ॥४२१। इस समय तुम मेरे मांस से अपनी इच्छा भर तृप्ति कर लो । तुम

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know