Srishti Khanda Extracted Page 277

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-277

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Sanskrit Original

श्रीपद्यमहापुराण* एक: संश्लिष्यते गर्भे मरणे भरणे तथा ।भुक्ते चैकः सुखं दुःखमतः सत्यं वदाम्यहम्॥३९५॥ सत्ये प्रतिष्ठिता लोका धर्म: सत्ये प्रतिष्ठितः । उदधिस्सत्यवाक्येन मर्यादां न विलंघते ॥३९६॥ विष्णवे पृथिवीं दत्वा बलिः पातालमाश्रितः । छड्रानापि बलिर्वद्धः सत्यवाक्यं न चात्यजत् ॥३९७॥ प्रवर्धमानः शैलेंद्रः शतश्वृंग: समुत्थितः । सत्येन संस्थितों विध्यः प्रबन्धं नातिवर्तते ॥३९८॥ स्वर्गापवर्गनरकाः सत्यवाचि प्रतिष्ठिताः । यस्तु लोपयते वाचमशेषं तेन लोपितम् ॥३९९॥ योन्यथा संतमात्मानमन्यथा प्रतिपद्यते। किं तेन न कृतं पापं चोरणोत्मापहारिणा ॥४००॥ यास्यामि नरकं घोरं विलोप्यात्मानमात्मना । तस्य वैवस्वतो राजा धर्मस्यार्ध॑ निकृंतति ॥४०९॥ अगाधे सलिले शुद्धे सत्यतीर्थे क्षमाहुदे। स्रात्वा पापविनिर्मुक्तः प्रयाति परमां गतिम् ॥४०२॥ अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम् । अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेव विशिष्यते ॥४०३॥ सत्यं साधुतपः श्रुतं च परमं क्लेशादिभिर्वर्जितम्। साधूनां निकषं सतांकुलधनं सर्वाश्रमाणां फलम् ॥ यस्मात्तं समवाप्य गच्छति दिवं संत्यज्यतेऽसौकथम्। लोकैरत्र समागमे प्रतिदिनं सत्यं वदध्व ध्रुवम् ॥४०४॥ सख्य ऊचु नंदे सात्वं नमस्कार्या सर्वैरपि सुरासुरैः। या त्वं परमसत्वेन प्राणांस्त्यजसि दुस्त्यजान् ॥४०५॥ ब्रूम: किं तत्र कल्याणि यात्वं धर्मधुरंधरा । त्यागेनानेन ना प्राप्य त्रैलोक्ये वस्तु किंचन ॥४०६॥ बचाने के लिए, झूठी शपथ से पाप नहीं लगता है ॥३९३॥ नन्दा ने कहा-- दूसरों के प्राण की रक्षा करने के लिए तो में झूठ बोलती ही हूँ, किन्तु अपनी जान बचाने के लिए में किसी भी हालत में झूठ नहीं बोल सकती हुँ।३९४।। जीव अकेले गर्भ में जाता है वह अकेले ही मरता है तथा अकेले ही उसका भरण पोषण होता है, वह अकेले ही सुख तथा दुःख भोगता है, अतएव में सत्य ही बोलूँगी ॥३९५॥ सारे लोक सत्य में ही प्रतिष्ठित हैं, और धर्म भी सत्य पर ही टिका हुआ है, सत्य के ही कारण समुद्र अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता है ॥३९६॥ राजा बलि अपना राज्य विष्णु को देकर पाताल में चले गये, यद्यपि कपट पूर्वक वे बंध गये किन्तु उन्होंने सत्य को नहीं छोड़ा ॥३९७॥ पर्वत श्रेष्ठ विन्ध्यगिरि जब अपने सैकड़ों शिखरों से बढने लगा किन्तु सत्य में बंधकर वह आज भी नहीं बढ रहा है ॥३९८॥ सत्य वचन के ही आधार पर स्वर्ग, मोक्ष तथा नरक स्थित हैं, जो व्यक्ति अपनी वाणी का लोप (त्याग) कर देता है, उसका सब कुछ छूट जाता है ॥३९९॥ जो व्यक्ति आत्मा के वास्तविक स्वरूप को न कहकर उसका दूसरे प्रकार से प्रतिपादन करता है, उस आत्मापहारी चोर ने कौन सा पाप नहीं किया ?॥४००॥ अपनी बातों का परित्याग करके मैं घोर नरक में जाऊंगी बुषावादी मनुष्य के आधे पुण्यों को यमराज विनष्ट कर देते हें ॥४०१॥ अगाध जल वाले सत्य रूपी तीर्थ में तथा क्षमा रूपी जलाशय में स्नान करके निष्पाप बना हुआ जीव मुक्ति प्राप्त कर लेता हे ॥४०२॥ हजार अश्वमेध यज्ञ के फल को तराजू के एक पलड़े पर तथा सत्य के फल को दूसरे पलड़े पर रखा जाय तो सत्य का फल अधिक हो जायेगा ॥४०३॥ सत्य ही उत्तम तप है, वह सुन्दर शास्र ज्ञान है, उसमें किसी प्रकार का क्लेश भी नहीं होता है, सत्य साधु जनों के परखने की कसौटी है, वह सज्जनों का कुलधन (सर्वोत्तम धन) हैं, वह सभी आश्रमों का फल है, इसीलिए उस सत्य कोही प्राप्त करके जीव स्वर्ग लोक जाता है, अतएव.उसको कैसे त्यागा जा सकता है ? फलत: तुमलोग भी एक दूसरे से मिलकर सत्य बोलो।॥४०४॥ सखियों ने कहा-- हे नंदे ! तुम समस्त देवताओं तथा असुरों के लिए प्रणम्य हो, क्योंकि तुम सत्य का पालन करने के. लिए अपने दुस्त्यज प्राणों का परित्याग कर रही हो । हे कल्याणि ! हमलोग तुम्हारे विषय में क्या कह

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