Srishti Khanda Extracted Page 276
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-276
Sanskrit Original
मातः क्षमस्व तत्सर्वं दौ: शील्यादि कृतं मम । बालस्तवायं दौहित्रः किमत्रान्यद्ववीम्यहम् ॥३८०॥ विपुले चपके मातर्भद्रे सुरभिमानिनि । वसुधारे प्रियानंदे महानंदे घटस्रवे ॥३८ १॥ अज्ञानाज्ज्ञानतो वापि यदुक्तं किंचिदप्रियम् । तत्क्षमध्वं महाभागा यच्चान्यच्च कृतं मया॥३८२॥ सर्वाः सर्वगुणोपेताः सर्वा लोकस्य मातरः । सर्वाः सर्वप्रदा नित्यं रक्षध्वं मम बालकम् ॥३८३॥ अनार्थ विकलं दीनं रक्षध्वं मम पुत्रकम् । मातृशोकभिसंतप्तं भगिन्यः पालयिष्यथ ॥३८४॥ यस्मादनाथमबलं पुत्रवत्पालयिष्यथ । क्षमध्वं च महाभागा यास्यामि सत्यसंश्रयात् ॥३८५॥ नचिंता महती कार्या सखीभिश्च कथंचन । प्रथमस्यास्य जातस्य स्थितं मरणमग्रतः ॥३८६॥ श्रुत्वा तु नंदावचनं माता सख्यश्च दुःखिताः । विषादं परमं जग्मुरिदमूचुश्च विस्मिताः ॥३८७॥ अहोत्र महदाश्चर्यं यङ््या्रवचनं तव । प्रकर्तुमुद्यतं भीमं नंदा त्वं सत्यवादिनी ॥३८८॥ शपथैः सत्यवाक्येन वंचयित्वा महाभयम् । नाशनीयं प्रयत्नेन न गंतव्यं कथंचन॥३८९॥ नन्दे न चैव गंतव्यमधर्मः क्रियते त्वया । यद्वालं स्वसुतं त्यक्त्वा सत्यलोभेन गम्यते ॥३९०॥ अत्र गाथा पुरा प्रोक्ता क्रषिभिर्त्रह्मवादिभिः । प्राणत्यागे समुत्पन्ने शपथैर्नास्ति पातकम् ॥३९१॥ उक्त्वानृतं भवेद्यत्र प्राणिनां प्राणरक्षणम्। अनृतं तत्र सत्यं स्यात्सत्यमप्यनृतं भवेत् ॥३९२॥ कामिनीषु विवाहेषु गवां मुक्तौ तथैव च। ब्राह्मणानां विपत्तौ च शपथैर्नास्ति पातकम्॥३९३॥ नंदोवाच परेषां प्राणरक्षार्थं वदाम्येवाृतं वचः । नात्मार्थमुत्सहे वक्तुं जीवितार्थे कथंचन ॥३९४॥ है, उसे तुम क्षमा कर देना यह मेरा बच्चा तुम्हारा दौहित्र (नाती) है, इससे अधिक में क्या कहूँ ?॥३८०।। इसके बाद उसने अपनी सखियों से कहा हे विपुले ! हे चम्पके ! हे मात: ! हे सुरभि !, हे मानिनि !, हे वसुधरे !, हे प्रिया नन्दे ! हे महानन्दे ! हे घटस्त्रवे ॥३८ १॥ मैंने जानकर अथवा आज्ञानवशात् यदि कोई अप्रिय वाक्य कह दिया हो तो हे महाभागाओं ! आपलोग उसे क्षमा करेंगी अथवा यदि दूसरा भी अपराध मुझसे हो गया हो तो आपलोग क्षमा करेंगी ॥३८२॥ आप सभी सभी गुणों से युक्त हैं, सम्पूर्ण संसार की माताएँ हैं आप सभी, सभी कुछ देने वाली हैं आपलोग मेरे बच्चे की रक्षा करना ॥३८३॥ वह अनाथ, व्याकुल तथा दीन है, उसकी रक्षा तुमलोग करना । हे बहनों ! माता के शोक से संतप्त मेरे बच्चे का पालन आप लोग करेंगी ॥३८४॥ हे महाभागाओं ! चूकि आपलोग मेरे अनाथ तथा निर्बल पुत्र का पालन करेंगी अतएव आपलोग मुझे क्षमा कर देंगी मेरा आश्रय तो एकमात्र सत्य है॥३८५।। आपलोग मेरे विषय में कोई चिन्ता न करें क्योंकि आपलोगों को मेरे इस प्रथम बच्चे को मृत्यु से बचाना है ॥३८६॥ नन्दा की बातों को सुनकर उसकी माता और सखियाँ दुःखी हो गयी और आश्चर्यित होकर उन सबों ने कहा ॥३८७॥ हे नन्दे ! यह बड़े आश्चर्य की बात है कि तुम सत्यवादिनी होकर एक व्याघ्र के भयङ्कर बात का पालन करने जा रही हो ॥३८८॥ महाभय के उपस्थित होने पर प्रयत्न पूर्वक सत्य वाक्य के द्वारा शपथ करके उस भय को विनष्ट करना चाहिए ।।३८९॥ हे नन्दे ! तुम्हें छोटे से अपने बच्चे को छोड़कर नहीं जाना चाहिए । सत्य के लोभ से जो तुम जाना चाहकर पाप कर रही हों ॥३९०॥ इस विषय में ब्रह्मवादी ऋषियों की एक पुरानी गाथा है। प्राण सङ्कट उपस्थित होने पर झूठी शपथ कर लेने से पाप नहीं लगता है ॥३९१॥ झूठ बोलने मात्र से यदि किसी प्राणी की जान बच जाये तो वहाँ पर असत्य ही सत्य हो जाता है और ऐसा नहीं होने पर सत्य ही असत्य हो जाता है ॥३९२॥ रमणियों के समक्ष, विवाह के अवसर पर गौ को बचाने के लिए तथा ब्राह्मण को विपत्ति से
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