Srishti Khanda Extracted Page 275
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-275
Sanskrit Original
गंध: सर्वत्र सततमाप्रातव्य: प्रयत्नतः । गावः पश्यंति गंधेन राजानश्वारचक्षुषा ॥३६७॥ नैकस्तिष्ठेद्दने घोरे धर्ममेकं च चिंतयेत्। न चोद्वेगस्त्वया कार्यः सर्वस्य मरणं ध्रुवम् ॥३६८॥ यथाहि पथिकः कश्चिच्छायामाश्रित्य तिष्ठति। विश्रम्य च पुनर्याति तद्दद्भूतसमागमः ॥३६९॥ पुत्र नित्यं जगत्सर्वं तत्रैकः शोचसे कथम् । तावत्त्वं शोकमुत्सृज्य मद्वाम्यमनुपालय ॥३७०॥ शिरस्याघ्राय तं पुत्रमवलिह्य च मूर्द्धनि । शोकेन महता विष्टा वाष्पव्याकुललोचना ॥३७९॥ विनिःश्वसंती नागीव दीर्घमुष्णं मुहुर्मुहुः । पुत्रहीनं जगच्छून्यं प्रपश्यंतीव साऽ भवत् ॥३७२॥ महापंकनिमग्रेव तिष्ठती चावसीदती । विलप्य नंदिनी पुत्रमुवाचेदं पुनर्वचः ॥३७३॥ नास्ति पुत्रसमः स्नेहो नास्ति पुत्रसमं सुखम् । नास्ति पुत्रसमा प्रीतिर्नास्ति पुत्रसमा गतिः ॥३७४॥ अपुत्रस्य जगच्छून्यमपुत्रस्य गृहेऽसुखम्। पुत्रेणलभते लोकमपुत्रो नरकं व्रजेत् ॥३७५॥ लोको वदति वाक्यानि चंदनं किल शीतलम् । पुत्रगात्रपरिष्वंगश्च॑दनादतिशीतलः ॥३७६॥ इति पुत्रगुणानुक्त्वा निरिक्ष्य च पुनः पुनः । स्वमातरं सखीर्गोपीस्त्वरमाणा च पृच्छति॥३७७॥ यूथस्याग्रे चरंती मामाससाद मृगाधिपः । मुक्ताहं तेन शपथैः पुनर्यास्र्यामि तत्र वै॥३७८॥ सुतं च मातरं चैव सखार्द्रष्टं च गोकुलम् । आगता सत्यवाक्येन पुनर्यास्यामि तत्र वै॥३७९॥ करे सोए हुए, मत्त एवं प्रमत्त व्यक्ति पर भी विश्वास न करे, क्योंकि ये गुप्त रहस्य को बतला देते हैं ॥३६६॥ प्रयत्न पूर्वक गन्ध को भी सूंघना चाहिए क्योंकि गौ गन्ध के ही द्वारा किसी बात का पता लगा लेती है और राजा अपने दूतों द्वारा ही किसी बात को जान लेते हैं ॥३६७॥ भयङ्कर वन में अकेले न रहे, और धर्म का आचरण अकेले करना चाहिए । तुम्हें घबराना नहीं चाहिए, क्योंकि सबों का मरना निश्चित है ॥३६८॥ जिस तरह कोई किसी वृक्ष की छाया में विश्राम करता है और फिर थोड़ी देर के बाद उसे छोड़कर चला जाता है, उसी तरह किसी का किसी से मिलना निश्चित समय के ही लिए होता है ॥३६९॥ हे पुत्र ! यह सम्पूर्ण जगत् अनित्य है, अतएव तुम अकेले कयां शोक करते हो ? अतएव तुम शोक को छोड़कर मेरी बातों का पालन करो ॥३७०॥ इसके बाद नन्दा ने अपने बच्चे के शिर को सूंघा और उसके शिर को चाटा और वह महान् शोक से भर गयी, उसके नेत्रों में आँसू भर गये ॥३७१॥ उसने नागिन के समान लम्बी और गर्म-गर्म श्वास लिया और पुत्र से रहित होने के समान उसको सारा संसार सूना-सूना प्रतीत होने लगा ॥३७२॥ अत्यधिक कीचड़ में फंसकर खड़ी हुयी के समान दुःखानुभव करती हुयी, विलाप करके वह गौ फिर अपने बच्चे से कही ॥३७३॥ पुत्र के समान कोई स्नेह नहीं होता है, पुत्र के समान कोई सुख नहीं होता है, पुत्र के समान किसी पर प्रीति नहीं होती है, पुत्र के समान कोई गति नहीं है॥३७४॥ पुत्रहीन के लिए सारा जगत् सूना-सूना होता है, पुत्र हीन को अपने घर में भी सुख नहीं मिलता है, पुत्र के द्वारा ही अच्छे लोकों की प्राप्ति होती है, पुत्रहीन व्यक्ति नरकगामी होता है ॥३७५॥ संसार के लोग कहते हैं कि चन्दन सबसे अधिक शीतल होता है किन्तु वास्तविकता है कि पुत्र के शरीर का आलिङ्गन चन्दन से भी अधिक शीतल (सुखप्रद) होता है ॥३७६॥ इसतरह से पुत्र के गुणों का वर्णन करके नन्दा ने अपने बछड़े को बार-बार देखा, उसके बाद वह शीप्रता पूर्वक अपनी माता तथा सखियों के पास विदा लेने के लिए गयी ॥३७७॥ उसने कहा अपने समूह के आगे-आगे जब मैं चर रही थी उसी समय मुझको सिंह मिल गया, उससे मैं शपथ करके आयी हूँ अतएव में फिर उसके पास जा रही हूँ ॥३७८॥ अपने सत्य वाक्य के द्वारा अपने बच्चे, माता, सखियों तथा गोशाला को देखने के लिए मैं आयी थी अब मैं फिर उसी के पास जा रही हूँ ॥३७९॥ हे माँ ! मैंने जो कुछ भी गल्तियाँ की
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know