Srishti Khanda Extracted Page 274
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-274
Sanskrit Original
सष्टिखण्ड २४९ नास्ति मातृसमो बंधुर्बालानां क्षीरजीविनाम् । नास्ति मातृसमो नाथो नास्ति मातृसमा गतिः॥३५३॥ नास्ति मातृसमः स्नेहो नास्ति मातृसमं सुखम् । नास्ति मातृसमो देव इह लोके परत्र च ॥३५४॥ एवं वै परमो धर्मः प्रजापतिविनिर्मितः । ये तिष्ठंति सदा पुत्रास्ते यांति परमां गतिम्॥३५५॥ नंदोवाच ममैव विहितो मृत्यु र्न त्वं पुत्रागमिष्यसि। न चायमन्यजीवानां मृत्युः स्यादन्यमृत्युना ॥३५६॥ अपश्चिममिमं पुत्र मातृसंदेशमुत्तमम् । अत्रातिष्ठस्व मद्वाक्यात्ततः शुश्रूषणं पुनः ॥३५७॥ जले स्थले च विचरन्प्रमादं तात मा कुरु । प्रमादात्सर्वभूतानि विनश्यंति न संशयः ॥३५८॥ न च लोभेन चर्तव्यं विषमस्थं तृणं क्वचित् । लोभाद्विनाशः सर्वेषामिह लोके परत्र च ॥३५९॥ समुद्रमटवीं पुत्र विशंति लोभमोहिताः। लोभादकार्यमत्युग्रं विद्वानपि समाचरेत् ॥३६०॥ लोभात््रमादाद्विस्रंभात्त्रिभिर्नाशो भवेन्नणाम् । तस्माल्लोभं नकुर्वीत न प्रमादं ना विश्वसेत् ॥३६१॥ आत्मा हि सततं पुत्र रक्षितव्यः प्रयत्नतः । सर्वेभ्यः श्वापदेभ्यश्च म्लेच्छचोरादिसंकटात्॥३६२॥ तिरश्चां पापयोनीनामेकत्र वसतामपि । विपरीतानि चित्तानि विज्ञायते न पुत्रक॥३६३॥ नखीनां च नदीनां च शृंगिणां शस्त्रधारिणाम्। न विश्वासस्त्वया कार्यः स्त्रीणां प्रेष्य जनस्य च॥३ ६ ४॥ न विश्वसेदविश्वस्तो विश्वस्ते नातिविश्वसेत् । विश्वासाद्धयमुत्पन्नं मूलान्यपि निकृंतति॥३६५॥ न विश्वसेत्स्वदेहेपि बलिष्ठे भीतचेतसि । वक्ष्यंति गूढमत्यर्थ सुप्तं मत्तं प्रमादतः ॥३६६॥ के लिए माता के समान दूसरा कोई बंधु नहीं है । माता के समान कोई नाथ (स्वामी) नहीं होता और माता केसमान कोई आश्रय नहीं होता है ॥३५३॥ माता के समान किसी का प्रेम नहीं होता है, और माता के मुख के समान कोई मुख नहीं होता है । इसलोक तथा परलोक में माता के समान कोई देवता भी नहीं होता है ॥३५४॥ ब्रह्माजी ने इसीप्रकार का सर्वश्रेष्ठ धर्म बनाया है । जो पुत्र सदा माता की आज्ञा का पालन करते हैं, उन सबों को मुक्ति की प्राप्ति होती है ॥३५५॥ नन्दा ने कहा-- हे पुत्र ! मृत्यु तो मेरी ही विहित है, अतएव तुम वहाँ नहीं जा सकते हो। दूसरे जीवों की मृत्यु के बदले दूसरे जीवों की मृत्यु नहीं होती हैं ॥३५६॥ हे पुत्र ! यह मेरा अन्तिम सन्देश सुनो। मेरी आज्ञा है तुम यहीं रहो, यही तुम्हारे द्वारा मेरी सबसे बड़ी सेवा है ॥३५७॥ जल अथवा स्थल पर विचरण करते हुए तुम असावधान मत होना, प्रमाद करने से सभी जीवों का विनाश हो जाता है ॥३५८॥ विषम स्थल में जाकर कभी घास के लोभ से नहीं चरना चाहिए । इसलोक में तथा परलोक में भी सबों का लोभ के कारण विनाश हो जाता है ॥३५९॥ पुत्र ! लोभ के कारण जीव समुद्र तथा भयङ्कर वन में भी प्रवेश कर जाते हैं । लोभ के कारण विद्वान व्यक्ति भी अत्यन्त उग्र कार्य को कर बैठता है ॥३६०॥ लोभ, प्रमाद तथा विश्वास इन तीनों के कारण जीव का विनाश हो जाता है । इसीलिए न तो लोभ करना चाहिए, न प्रमाद करना चाहिए और न तो विश्वास करना चाहिए।। ३६ १॥ हे पुत्र ! सभी हिंसक जीवों से म्लेच्छों तथा चोरों तथा सङ्कों से हर प्रकार से प्रयास द्वारा अपने आत्मा की रक्षा करनी चाहिए ॥३६२॥ हे पुत्र ! पक्षियों, पापियों तथा एक साथ रहने वालों के भी विपरीत चित्तवृत्ति का पता नहीं चल पाता है ॥३६३॥ नख वाले जीवों, नदियों, सींग वाले पशुओं तथा शस्त्र धारण करने वालें स्रियों तथा अनुचरों का तुम्हें अन्धविश्वास नहीं करना चाहिए ॥३६४।॥ अविश्वसनीय व्यक्ति का विश्वास न करे तथा विश्वस्त व्यक्ति का अत्यन्त विश्वास न करे । विश्वास के कारण जो विपत्ति आती है, उसके कारण तो मूल का भी नाश हो जाता हे ॥३६५॥ अपने बलवान शरीर का भी विश्वास नहीं करना चाहिए । जो भयभीत हो उस पर भी विश्वास न
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