Srishti Khanda Extracted Page 273

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-273

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Sanskrit Original

अश्रुपूर्णमुखी दीना वेपमाना सुदुःखिता । हंभारवं प्रमुंचंती पतिता . शोकसागरे ॥३४०॥ करीव चरणग्राहं गृहीतः सलिलाशये। अशक्ता स्वपरित्राणे विलपंती मुहुर्मुहुः ॥३४१॥ सा तत्र गोकुलं प्राप्ता हरिन्नद्यास्तटे स्थितम् । श्रुत्वा वत्सं तु क्रोशंतं पर्यधावत संमुखी ॥३४२॥ उपसृप्य च तं बालं वाष्पपर्याकुलेक्षणम् । संप्राप्य मातरं वत्सः शंकितः परिपृच्छति ॥३४३॥ न ते पश्याम्यहं स्वास्थ्यं धैर्य नैवाद्य लक्षये । उद्दिग्मा चापि ते दृष्टिभीता चातीव लक्ष्यसे ॥३४४॥ नन्दोवाच पिब पुत्र स्तनं मेद्य कारणं यदि पृच्छसि । अशक्ताहं तवाख्यातुं कुरु तृप्तिं यथेप्सिताम् ॥३४५॥ अपश्चिमं तु ते पुन्रदुर्लभं मातृदर्शनम्। एकाहमद्य मे पीत्वा प्रभाते कस्य पास्यसि ॥३४६॥ त्वां त्यक्त्वा पुत्र गंतव्यं शपथैरागताह्यहम् । क्षुतक्षामस्य च व्याघ्रस्य दातव्यमात्मजीवितम् ॥३४७॥ नंदायाश्च वचःश्रुत्वा वत्सो वचनमव्रवीत्। वत्स उवाच अहं तत्र गमिष्यामि यत्र त्वं गंतुमिच्छसि ॥३४८॥ श्लाघ्यं ममापि मरणं त्वया सह न संशयः । एकाकिनाऽपि मर्तव्यं मयार्तेन त्वया बिना ॥३४९॥ यदि मां सहितं मातर्वने व्याघ्रो हनिष्यति। या गतिर्मातृभक्तानां ध्रुवं सा मे भविष्यति ॥३५०॥ तस्मादवश्यं यास्यामि त्वया सह न संशयः । अथवा तिष्ठमातस्त्वं शपथाः संतु ते मम ॥३५१॥ जनन्या च वियुक्तस्य जीविते किं प्रयोजनम् । अनाथस्य वने नित्यं को मे नाथो भविष्यति ॥३५२॥ वाली पुत्र वत्सला वह गौ इस प्रकार से शपथ करके उस व्याघ्र की आज्ञा लेकर चली गयी ॥३३९॥ उसके आँखों में आँसू भरे थे, वह काँप रही थी तथा दीन तथ दुःखी थी । शोक सागर में पड़ी हुयी वह हुंकार करती हुयी॥३४०॥ जैसे किसी हाथी के पैरों को कोइ घडियाल पानी में पकड़ ले, और वह अपनी रक्षा करने में असमर्थ हो जाय उसी तरह से अपनी रक्षा में असमर्थ वह बार-बार विलाप कर रही थी ॥३४१॥ वह तो गोशाला में पहुँच गयी और वह व्याघ्र नदी के तट पर स्थित रहा । रंभाती हुयी उसकी ध्वनि को सुनकर उसका बछड़ा दौड़कर उसके सामने आया।।३४२॥ वह उस बछड़े के पास आयी और बछड़े ने अपनी माँ को रोते हुए देखा और उसने सशंकित होकर पूछा॥३४३॥ आज में देखता हूँ कि तुम्हारा स्वास्थ्य ठीक नहीं है और न तो तुममें धैर्य हे तुम्हारी दृष्टि उद्विग्न सी लगती है, लगता है जैसे तुम डरी हुयी हो ॥३४४॥ नन्दा ने कहा-- हे वत्स ! तुम मेरा स्तन पिओ । तुम जो कारण पूछते हो उसे में कह नहीं सकती हूँ । तुम अपनी इच्छा भर कर तृप्त हो जाओ ॥३४५॥ हे वत्स ! यह हमसे तुम्हारी अंतिम भेंट है । मैं तो एक हूँ । आज तो तुम मेरा स्तन पी लोगे, प्रातःकाल किसका स्तन पिओगे?॥३४६॥ हे वत्स ! तुमको छोड़कर मुझे जाना है, में शपथ करके आयी हुँ । भूखे हुए व्याघ्र को मुझे अपना जीवन समर्पित करना है ॥३४७॥ नन्दा की बात को सुनकर बछड़े ने कहा बछड़े ने कहा--- जहाँ तुम जाना चाहती हो वहाँ मैं भी चलूँगा ॥३४८॥ तुम्हारे साथ मेरी मृत्यु प्रशंसनीय हो जायेगी । तुम्हारे बिना आर्त बनकर अकेले भी मुझे मरना ही है । हे माँ ! यदि वन में तुम्हारे साथ मुझे भी व्याघ्र मार देगा तो माता के भक्तों की जो गति होती है, वही गति मुझे भी मिल जायेगी ॥३५०।। अतएव निश्चित रूप से मैं तुम्हारे साथ चलूँगा अथवा हे मात: ! तुम यहीं रहो तुम्हारे शपथ हमारे ही शपथ बन जायँ ॥३५१॥ माँ से अलग हो जाने पर मेरा जीने से कौन सा प्रयोजन है ? मैं अनाथ हो जाऊंगा इस वन में मेरा नाथ कौन होगा ?॥३५२॥ दुग्ध पीकर जीने वाले बालकों

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