Srishti Khanda Extracted Page 272
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-272
Sanskrit Original
कदाचिन्मन्यसे गत्वा मूर्खोऽयं वंचितो मया। अत्रापि केचिद्वक्ष्यंति शपथै नास्ति पातकम् ॥३२६॥ कामिनीषु विवाहेषु गवां मुक्तौ तथैव च । प्राणत्यागे समुत्पन्ने श्रब््ातव्यं न च त्वया ॥३२७॥ लोकेस्मिन्नास्तिकाः केचिन्मूर्खाः पंडितमानिनः । भ्रामयिष्यंति ते चित्तं चक्रारूढमिव क्षणात् ॥३२८॥ कुतर्कहेतुवृत्ातैरज्ञानावृतचेतसः । मोहयंति नराः क्षुद्रा आगमार्थ विशारदाः ॥३२९॥ अतथ्यान्यपि तथ्यानि दर्शयंत्यतिपेशलाः । समो निम्नोन्नतानीव चित्रकर्माविदोजनाः ॥३३०॥ प्रायः कृतार्थो लोकोयं मन्यते नोपकारिणम्। वत्सः क्षीरक्षयं दृष्ट्वा परित्यजति मातरम् ॥३३९॥ न तं पश्यामि लोकेस्मिन्कृते प्रतिकरोति यः । सर्वस्य हि कृतार्थस्य मतिरन्या प्रवर्तते ॥३३२॥ ऋषिदेवासुरनरैः शपथाः कार्यसिद्धये । कृताः पश्यामि लोकेस्मिन्कृते प्रतिकरोति यः॥३३३॥ सत्येनापि शपेद्यस्तु देवाग्नि गुरुसन्निधौ । तस्य वैवस्वतो राजाधर्मस्यार्द्ध निकृंतति ॥३३४॥ माते बुद्धिर्भवेदेवं शपथैरेष वंचितः । त्वयैव दर्शितं सर्व यथेष्टं कुरु सांप्रतम् ॥३३५॥ नंदोवाच एवमेव महासाधो कस्त्वां वंचयितुं क्षमः । आत्मैव वंचितस्तेन यः परं वंचयिष्यति ॥३३६॥ द्वीप्युवाच धेनुके पश्य गच्छ त्वं पुत्रकं पुत्रवत्सले । पाययित्वा स्तनं वत्समवलिह्य च मूर्द्धनि ॥३३७॥ मातरं भ्रातरं दृष्ट्वा सखीस्वजनबांधवान् । सत्यमेवाग्रतः कृत्वा शीघ्रमागमनं कुरु ॥३३८॥ एवं सा शपथं कृत्वा धेनुर्वै सत्यवादिनी। अनुज्ञाता मृगेद्रेण प्रयाता पुत्रवत्सला ॥३३९॥ गया है ॥३२५॥ हो सकता है कि तुम जाकर यह सोचो कि इस मूर्ख को मैंने खूब धोखा दिया । कुछ लोग यह भी कहेंगे कि शपथ करने से पाप नहीं लगता है ॥३२६॥ कामिनियों, विवाहों तथा गोओं के बचाने के समय तथा प्राण सङ्कट उपस्थित होने पर झूठ बोला जाता है, तो ऐसे लोगों की बातों पर तुम विश्वास नहीं करना ॥३२७॥ इस संसार में कुछ मूर्ख एवं अपने को पण्डित मानने वाले नास्तिक लोग तुम्हारे चित्त को चक्र के समान भ्रम में डाल सकते हैं ॥३२८॥ कुतर्क तथा हेतुवाद के द्वार जिनका अन्तःकरण अज्ञान से आवृत हो गया है । ऐसे क्षुद्र मनुष्य जो धर्म को नहीं जानते हैं, वे दूसरों को मोहित कर देते है ॥३२९॥ ऐसे लोग असत्य को भी सुन्दर सत्य के रूप में उपन्यस्त कर देते हैं । ऐसे लोग विचित्र कर्मो को करने में निपुण होते हैं, वे सम को भी निम्न तथा निम्न को भी उन्नत बना देते हैं ॥३३०॥ यह कृतार्थ लोक उपकार करने वाले को नही मानते हैं, बछड़ा भी दूध के समाप्त हो जाने पर अपनी माता को छोड़ देता है ॥३३१॥ संसार में ऐसे लोग नहीं मिलते है जो किए हुए उपकार का बदला चुकाते हैं । सभी कृतार्थ मनुष्यों की बुद्धि बदल जाती है ॥३३२॥ ऋषि, देवता, असुर और मनुष्य अपने कार्य की सिद्धि के लिए शपथ कर लेते हैं; किन्तु हम उसका महत्त्व नहीं देते हैं ॥३३३॥ जो व्यक्ति सत्य की शपथ देवता, अग्नि तथा गुरु के सामने करके भी नहीं निभाता है उसके आधे पुण्य को यमराज विनष्ट कर देते हैं।॥३३४॥ तुम ऐसा मत सोचना कि मैंने शपथ करके धोखा दे दिया है, क्योकि तुमने ही मुझे धर्म का मार्ग दिखाया है । अतएव जैसा मन में आये वैसा करो ॥३३५॥ नन्दा ने कहा-- महाराज ! आपको इसतरह से कौन ठग सकता है? जो दूसरों को ठगता है वह उसको नहीं अपितु अपने को ही ठगता है ॥३३६॥ व्याघ्र ने कहा-- हे गौ तुम जाओ | हे पुत्रवत्सले ! अपने बछड़े को देख लो । अपने बछड़े को स्तन पिलाकर तथा उसके माथा को चाटकर॥३३७॥ अपनी माता, भाई बहन तथा बांधवों से मिलकर, सत्य को ही महत्त्व देकर शीघ्र आ जाओ ॥३३८॥ सत्य बोलने
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