Srishti Khanda Extracted Page 271

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-271

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Sanskrit Original

इतस्ततस्स्थितै वत्सै र्नर््चमानं समंततः । सरोवद्राजते गोष्ठं चलद्धिरिव पङ्कजैः ॥३९३॥ तं श्रीनिकेतनं सौम्यं हृष्टपुष्टजनाकुलम् । गोलोकप्रतिमं दृष्ट्वा कथंप्रत्यागमिष्यसि॥३९४॥ पंचभूतानि मे भत्रे पिबंतु रुधिरं तव । न निर्विण्णानि भूतानि वाङ्मात्रेण करोम्यहम्॥३१५॥ नंदोवाच एवं प्रथमवत्साया मृगेद्र शृणु मे वचः । दृष्ट्वा सखी सुतं बालं गोपांश्च प्रतिपालकान्॥३ १६॥ गोपीजनमुपामंत्र्य जननीं च विशेषतः । शपथैरागमिष्यामि मन्यसे यदि मुंच माम्॥३९७॥ यत्पापं ब्रह्मवध्याया मातृपितृवधेषु च । तेन पापेन लिप्येहं यद्यहं नागमे पुनः ॥३१८॥ यत्पापं लुब्धकानां तु म्लेच्छानां गरदायिनाम् । तेन पापेन लिप्येहं यद्यहं नागमे पुनः ॥३१९॥ गोषु विघ्नांश्च ये कुर्युः स्वपंतीं ताडयंति च । तेन पापेन लिप्येहं यद्यहं नागमे पुनः ॥३२०॥ सकृद्दत्वा तु यः कन्यां द्वितीये दातुमिच्छति । तस्य पापेन लिप्येहं यद्यहं नागमे पुनः ॥३२९॥ यस्त्वनर्हान् बलीवर्दान्विषमे वाहयेत्पुमान् । कथायां कथ्यमानायां विध्नं कारयते तु यः ॥३२२॥ तेन पापेन लिप्येहं यद्यहं नागमे पुनः । गृहे यस्यागतं मित्रं निराशां प्रतिगच्छति ॥३२३॥ तस्य पापेन लिप्येहं यद्यहं नागमे पुनः। इत्येतैः पातकैर्घोरै रागमिष्याम्यहं पुनः ॥३२४॥ बुध्वा संप्रत्ययं द्वीपी पुनर्वचनमब्रवीत् । व्याघ्र उवाच संजातः प्रत्ययोऽस्माकं शपथै धेनुके तव ॥३२५॥ हुंकार करते हैं ॥३११। बाहुयुद्ध के द्वारा परिश्रम करने वाले गोपों के द्वारा जो रक्षित होता है, जो जोर-जोर से गाये जाने वाले गीतों, नृत्यों, संलापों तथा ताल ठोकने की ध्वनियों से ध्वनित होता हे ॥३१२॥ जहाँ पर इधर-उधर बैठे हुए बछड़े बोलते रहते हैं, इस प्रकार का चंचल कमलों से सुशोभित होने वाले सरोवर के समान सुशोभित होने वाले गोष्ठ (गोशाला) में जाकर तुम कैसे लौट आ सकती है 2॥३१३-३१४॥ में अपनी वाणी मात्र से भी किसी जीव को उदासीन नहीं बनाता हूँ । मेरे पंचभूत तुम्हारा खून पी लें ॥३१५॥ नन्दा ने कहा-- हे मृगेन्द्र ! मुझे पहले बच्चे वाली गौ की मेरी वाणी आप सुनें में अपने बच्चे, गोपों तथा सखियों को देखकर ॥३१६॥ गायों से विचार करके विशेष रूप से अपनी माता से विचार करके लौट आऊंगी इस बात की मैं शपथ करती हुँ; अतएव आप मुझे छोड़ दें ॥३१७॥ ब्रह्महत्या करने तथा माता-पिता को मारने से जो पाप लगता है, यदि मैं नहीं लौटूं तो वही पाप मुझको भी लगे ॥३१८॥ जो पाप व्याधों को, म्लेच्छों को तथा विष देने वालों को लगता है, वही पाप मुझे भी यदि मैं पुन: नहीं लौटू तो लगे ॥३१९॥ यदि मैं लौट कर नही आऊं तो मुझे वही पाप लगे जो गायों का विघ्न करने वालों तथा सोयी हुयी गायों को मास्ने वालों को लगता है ।।३२०॥ यदि मैं नहीं लौदूँ तो मुझे वही पाप.लगे जो पाप कन्या का एक बार विवाह करके फिर उसका विवाह दूसरे के साथ करने वाले को लगता है ॥३२१॥ जो पाप अयोग्य (कमजोर) बैलों से भारी बोझ ढोआने वालों को लगता है, वही पाप मुझको भी लगे यदि मैं लौट कर नहीं आऊँ तो । कही जाने वाली कथा में विघ्न करने वालों को जो पाप लगता है, वही पाप मुझको भी लगे यदि मैं लौट कर नहीं आऊँ तो । जिसके घर में आया हुए मित्र निशश होकर लौट जाता है ॥३२२-३२३॥ उसको जो पाप होता है, उसी पाप से युक्त हो जाऊँ यदे लौट कर नहीं आऊं तो । इन भयङ्कर पापों के भय से में अवश्य आऊँगी ॥३२४॥ उसकी बातों पर विश्वास करके उस सिंह ने पुन: कहा व्याघ्र ने कहा-- हे गौ ! तुम्हारे शपथों से मुझे विश्वास हो

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