Srishti Khanda Extracted Page 269
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-269
Sanskrit Original
संकटे विषमे दुर्गे भैरवे लोमहर्षणे । मृगसिंहसमाकीर्णे बहुश्चापदसेविते ॥२८ २॥ वल्लीवृक्षादि गहने शिवाशतनिनादिते । दुर्गेस्मिन्वसते रौद्रः कामरूपी भयङ्करः ॥२८३॥ द्वीपीशोणितदिग्धांसो घोरदंष्ट्रा नखायुधः । नंदो नाम स धर्मात्मा स च गोपीहिते रतः॥२८४॥ अच्छिन्नामरैस्तृणै दोघे गोधनं परिरक्षति । तस्य यूथपरिभ्रष्टा सा नंदा तृणलिप्सया ॥२८५॥ चरंतीव्याघ्रपुरतः साधेनुः प्रत्युपस्थिता । अभ्यद्रवच्च तां द्वीपी तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत् ॥२८६॥ त्वमद्य विहितो भक्षः स्वयं प्राप्तासि धेनुके । द्वीपिनश्च वचः श्रुत्वा निष्ठुरं रोमहर्षणम् ॥२८७॥ शुक्लरूपान्वितं बालं भब्रमिंदुसमप्रभम्। वत्सं स्मरति सा धेनुः स्रेहाक्ता गद्नदाक्षरम् ॥२८८॥ दह्यंती पुत्रशोकेन नंदा सा पुत्रवत्सला । रुदंती करुणं चैव निराशा पुत्रदर्शने ॥२८९॥ द्वीपी दृष्टवा तु तां धेनुं क्रंदमानां सुदुःखिताम्। उवाच वचनं धोरं धेनुके किं प्ररुद्यते ॥२९०॥ दैवात्सुखोपपन्नासि भक्षस्त्वं मे यदृच्छया। रुदंत्या वा हसंत्या वा तवात्तं जीवितं भवेत्॥२९९॥ विहितं भुज्यते लोके स्वयं प्राप्तासि धेनुके। मृत्युस्ते विहितोऽद्यैव वृथा किमनुशोचसि॥२९२॥ पप्रच्छतां पुनद्वीपी किमर्थ रुदितं त्वया । कौतुकं चात्र मे जातं महन्मे कथयस्व वै ॥२९३॥ व्याघ्रस्य वचनं श्रुत्वा नंदा वाक्यमथाब्रवीत्। क्षंतुमर्हसि मे नाथ कामरूपिन्नमोस्तुते॥२९४॥ त्वां समासाद्य लोकस्य परित्राणं न विद्यते। जीवितार्थं न शोचामि प्राप्तव्यं मरणं मया ॥२९५॥ जातस्य हि ध्रुवो मृत्युध्रुवं जन्म मृतस्य च । तस्मादपरिहायेर्थे न शोचामि मृगाधिप ॥२९६॥ परिपूर्ण ॥२८ १॥ भयङ्कर गुफा थी । उसमें मृग तथा सिंह आदि अनेक जीव रहते थे ॥२८२॥ लताओं तथा वृक्षों से दुर्गम बने हुए तथा जिसमें स्यारिन बोला करती थी । उसी गुफा में वह भयङ्कर व्याघ्र रहता था ॥२८३॥ उसका कंधा हाथी के खून से भींगा रहता था । दाँत और न्रख ही उसके आयुध थे । वहीं पर नन्द नाम के धर्मात्मा गोप अपनी गायों को रखते थे ॥२८४॥ वहाँ पर खूब घास बढी हुयी थी । उस समूह से भूलकर नन्दा नाम की गौ घास के लोभ से ॥२८५॥ चरती हुयी उस व्याघ्र के समने चली गयी उसको देखकर वह व्याप्र-- ठहरो ! ठहरो !! रे गौ; कहता हुआ उस पर टूट पड़ा ॥२८६॥ मेरा आज का भोजन तुम ही हो, क्योंकि तुम स्वयं यहाँ आयी हो । गौ ने उस व्याघ्र की भयङ्कर और निष्ठुर वाणी को सुना ॥२८७॥ उसके बाद वह गौ अपने श्वेत वर्ण के चन्द्रमा के समान मनोहर, स्नेह युक्त मनोहर बोलने वाले बच्चे का स्मरण करके ॥२८८॥। पुत्र के शोक से संतप्त हो गयी । वह पुत्रवत्सला थी । वह अपने बच्चे को देखने के विषय में निराश हो गयी थी; अतएव करुण क्रन्दन कर रही थी॥२८९॥ सिंह ने उस रोती हुयी गौ को देखा और भयङ्कर वाणी में कहा कि तुम क्यों रोती हो ?॥२९०॥ भाग्यवशात् तुम यहाँ अपने आप आयी हो; अतएव तुम मेरा भक्ष्य हो । तुम चाहे रोओ या हँसो; मैं तुम्हे मारूँगा ही॥२९१॥ हे धेनुजे जिसके लिए जो विहित होता है वही खाने को मिलता है तुम स्वयं आयी हो । तुम्हारी आज ही मृत्यु लिखी है, व्यर्थ क्यों शोक कर रही हो ?॥२९२॥ व्याघ्र ने फिर उससे पूछा तुम क्यों रो रही हो ? इस विषय में मुझको बड़ी उत्कण्ठा है, उसे तुम मुझे बतलाओ ॥२९३॥ व्याघ्र की बात सुनकर नन्दा ने कहा हे अपनी इच्छानुसार रूप बनाने वाले स्वामिन् ! आपको नमस्कार है । आप मुझे क्षमा करेंगे ॥२९४॥ जो व्यक्ति आपके पास आ जाता है उसको संसार में कोई बचा नही पाता है । मैं अपने जीवन के लिए चिन्ता नहीं करती हूँ । एक दिन मुझे मरना ही है ॥२९५॥ जो उत्पन्न होता है, उसकी मृत्यु निश्चित होती है और जो मरता है । उसका जन्म भी निश्चत होता है । अतएव हे मृगाधिप ! मैं इस अवश्यंभावी के विषय में चिन्ता नहीं कर रही हूँ ॥२९६॥ जैसे देवताओं को
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