Srishti Khanda Extracted Page 268
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-268
Sanskrit Original
आत्मानं निदमानस्य मृगमांसानि खादतः । कदाहं मानुषं भावं गमिष्यामीदृशं पुनः ॥२६८॥ कुत्सितं न करिष्यामि वियोनिकरणं महत् । कुर्वता मांसलोभेन मृगयां परिधावता ॥२६९॥ आपदासहितं प्राप्तं मानुषाणां भयावहम्। दर्शनं दुःखदं मह्यां मृगाणां मानुषैः सह ॥२७०॥ पापेन पापतां नीतोह्यपापेऽपि सतां कुले । उत्पन्नो विकृतिं नीतः पश्य कालस्य पर्ययम्॥२७९॥ तस्मान्मे सुकृतं नास्ति हिंसाप्येका विगर्हिता। तया तु प्राप्यते दुःखं न च मोक्षो भविष्यति॥२७२॥ कथं मे भविता मोक्षः कथं सत्या मृगी भवेत्। गते वर्षशते तस्य वसतस्तद्ववे तदा ॥२७३॥ आयातं गोकुलं काले यवसादेककारणात् । गोवाटवाटीं संस्थानं तत्तत्र समवस्थितम् ॥२७४॥ वनोपकण्ठे मंथानं रवेणापूरितं च यत् । क्षीबैगोपैः समाकीर्णं पादपैरपि तद्वनम् ॥२७५॥ निशि बंशरवोपेतं गोपीनां च शुभप्रदम्। एवं तु वसतस्तस्य खर्ज्रवनसंसदि॥२७६॥ हृष्टा तुष्टा पुष्टा च नंदा वै नामनामतः । गोमंडलस्य सामुख्या हंसवर्णा घटस्रवा ॥२७७॥ दीर्घघोणा विभक्तांगी बंधुरांगी तनुत्वचा। नीलकंठा शुभग्रीवा घंटाली मधुरस्वना॥२७८॥ सा च यूथस्य सर्वस्य पुरश्चरति निर्भया । घासस्थानं चरेच्छन्नं गत्वैका च यथासुखम् ॥२७९॥ यथेष्टकामा सुरभी छन्नं चरति वै तृणम् । रोहितो नाम तत्रान्यः पर्वतः सरितस्तटे ॥२८०॥ अनेककदरदरी गुहासत्वनिषोवितः । तस्य पूर्वोत्तरे भागे घोरे तृणसमाकुले ॥२८ १॥ निवास करता था । यदि कालवशात् वहाँ कोई मनुष्य भी आ जाता था तो वह उसे भी मारकर खा जाता था । इसतरह से उसे उस वन में रहते हुए सौ वर्ष बीत गये ॥२६६-२६७॥ वह मृगों का मांस खाते हुए अपने आप की निन्दा करता था । वह सोचता था न जाने कब मैं पुन: मनुष्य हो पाऊंगा ?।।२६८॥ जब कभी भी मैं मारना रूप इस निन्दित कर्म को कभी नहीं करूँगा । माँस के लोभ से में आखेट में दौड़ता हुआ मारने का काम करता था । उसके फल स्वरूप मनुष्यों को भय प्रदान करने वाली यह विपत्ति आयी । मेरे लिए मृगों तथा मनुष्यों का दिखायी देना भी कष्टप्रद है ॥२६९-२७०॥ पाप ने मुझे पापी बना दिया है, यद्यपि मैं निष्पाप सज्जनों के वंश में उत्पन्न हुआ हूँ । किन्तु मुझमें विकार उत्पन्न हो गया है, यही काल की विपरीतता है ॥२७१॥ अतएव मुझमें कोई भी पुण्य नहीं है, केवल अकेली निन्दित हिंसा बची है, वह मुझे दुख ही देती है, अब मेरी मुक्ति नहीं होगी ॥२७२॥ न जाने किस प्रकार से मेरी मुक्ति होगी और वह मृगी सत्यवादिनी होगी । इसतरह राजा के सोचते हुए तथा वन में रहते हुए सौ वर्ष बीत जाने पर ॥२७३॥ समयानुसार घास और जल की सुविधा के कारण वहाँ गायों का समूह आया । वहाँ पर गायों के रहने के लिए चारो ओर से बाड़ लगा दिए गये ॥२७४॥ वन के सन्निकट की भूमि गायों के रंभाने की ध्वनि से पूर्ण हो गयी । मदमत्त गोपों और वृक्षों से वह वन भर गया ॥२७५। रात्रि में गोपों तथा गोपियों की ध्वनि सुनायी देने लगी । इस तरह खर्जूरी बन में रहते हुए उस गोमण्डल में ॥२७६॥ नन्दा नाम की एक हृष्ट-पुष्ट गौथी । वह उस गोमण्डल में प्रधान थी, हंस के समान उसका वर्ण था, वह घड़े भर दूध देती थी ॥२७७॥ उसकीनाक लम्बी थी उसके सभी अङ्ग पुष्ट थे । उसका शरीर देखने में सुन्दर था और उसका चमड़ा पतला था । उसकागला नील वर्ण का था उसकी ग्रीवा मनोहर थी तथा उसके गले में घण्टे की मधुर ध्वनि होती थी ॥२७८॥ वहअपने समूह के आगे निर्भय होकर चलती थी । वह घास के स्थान में अकेले जाकर अपनी इच्छा के अनुसार चरती थी॥२७९॥ अपनी इच्छा के अनुसार वह गौ घासों को चरती थी । उस नदी के तट पर रोहित नाम का दूसरा पर्वत था ॥२८०॥ उसमें अनेक गुफाएँ थी जिसमें विभिन्न प्रकार के जीव रहते थे । उस पर्वत के पूर्वोत्तर भाग में घासों से
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