Srishti Khanda Extracted Page 267

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-267

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Sanskrit Original

ह श्रीपद्ममहापुराण | एवमुक्ते पुलस्त्यः स भीष्मायैत्पुरातनम् । आख्यातुमुपचक्राम नंदा नाम यतस्स्मृतम् ॥२५३॥ | क्षत्रब्रतधरो नित्यमासीद्राजाप्रभंजनः। प्रवृत्तो सो मृगान्हंतुं वने तस्मिन्महाबलः ॥२५४॥ | स ददर्श ततस्तस्मिन्मृगीं गुल्मांतरे स्थिताम् । मार्गणेन सुतीक्ष्णेन तांविव्याधपुरोगताम् ॥२५५॥ सा विलोक्य दिशः सर्वास्ं दृष्ट्वाशरपाणिनम् । आह किं ते कृतं मूढ त्वयैतत्कर्म दुष्करम् ॥२५६॥ स्तनं तावत्प्रयच्छामि सुतस्याधो मुखीस्थिता । मांसलोभेन विद्धाहं तरसा ह्यकुतोभया ॥२५७॥ पिबंतं गुप्तवत्सं च गूढमैथुनमागतम्। एवं विधं मृगं राजन्नहन्यात्प्राड् मया श्रुतम् ॥२५८॥ स्तनं तनयस्यास्य॒प्रयच्छंती त्वया हता । बाणेनाशनि कल्पेन निर्दोषा वनमागता ॥२५९॥ तस्मात्त्वमपि दुर्बुद्धे कव्यादत्वमवाप्स्यसि । वनेस्मिन्कंटकाकीर्णे व्याघ्ररूपं त्वमाप्ठुहि॥२६०॥ शापप्रदानं श्रुत्वैवं स राजा पुरतः स्थितः । प्रोवाच प्रांजलिर्भूत्वा तां मृगीं व्यथितेंद्रियः॥२६१॥ स्तनं तु तनयस्येह प्रयच्छंती न मे मता । अज्ञानेन हता भद्रे प्रसीद सुसमाधिना ॥२६२॥ व्याघ्ररूपमहं त्यक्त्वा प्राप्स्यामि मानुषं कदा। एवंविधस्य शापस्य विमोक्षं शंस मे मृगि॥२६३॥ एवमुक्तो मृगी तस्य प्रोवाच वचनं शुभम् । राजन्नब्दशतं ते तु शापस्यागतया गवा॥२६४॥ नंदया सह संवादमासाद्यांतो भविष्यति । मृग्योक्ते वचने राजा व्याघ्र एवाभवत्तदा॥२६५॥ नखदंष्ट्रायुघोपेतो व्याघ्ररूपोति भीषणः । तत्रासौ भक्षयन्नास्ते मृगान्हत्वा चतुष्पदः ॥२६६॥ द्विपदानपि तत्रस्थान्कालेन क्रमयोजितान् । एवं तत्र वने तस्य संवत्सरशतं गतम् ॥२६७॥ सूतजी ने कहा-- इस पर भीष्मजी ने पूछा कि क्या वह (नन्दा) नदी कोई दूसरी नदी है 2॥२५१॥ हे ब्रह्मन् ! यह मुझको उत्कण्ठा है, अथवा सरस्वती का ही नाम नन्दा है । वह नदी नन्दा कैसे हुयी ? उसका यह नाम कैसे पड़ा 2॥२५२॥ इस तरह कहने पर महर्षि पुलस्त्य उस इतिहास को बतलायें जिसके कारण सरस्वती नदी का नाम नन्दा हुआ ॥२५३॥ क्षत्रिय के ब्रत को धारण करने वाले एक प्रभञ्जन नाम के राजा थे । वे महाबलवान् राजा इस वन में मृगों को मारने लगे ॥२५४॥ राजा ने एक लता के नीचे बैठी हुयी एक मृगी को देखा । उस सामने पड़ी हुयी मृगी को राजा ने तीक्ष्ण बाण से बेध दिया ॥२५५॥ वह सभी दिशाओं में देखकर उस बाणधारी पुरुष को देखकर कहा अरे मूर्ख ! तुमने यह दुष्कर कर्म क्यों किया ?॥२५६॥ मैं तो नीचे मुँह करके अपने बच्चे को दूध पिला रही थी । मैं निर्भय थी और तुमने माँस के लोभ से मुझे मार दिया ॥२५७॥ राजन् ! मैने सुना है कि जिसका बच्चा पी रहा हो अथवा छिपकर मैथुन करते हुए ऐसे मृग को नहीं मारना चाहिए ॥२५८॥ जब में अपने बच्चे को दूध पिला रही थी उसी समय तुमने मुझे मारा है । तुमने वज्र के समान बाण से निर्दोष मुझको इस वन में मारा है ॥२५९॥ अतएव हे दुर्बुद्धि ! तुम भी राक्षस हो जाओगे । इस कंटकाकीर्ण वन में तुम व्याघ्र हो जाओ ॥२६०॥ इस प्रकार के शाप को सुनकर राजा उस मृगी के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये और दुःखी होकर कहे ॥२६१॥ मैंने यह नहीं जाना कि तुम बच्चे को दूध पिला रही हो, अज्ञानवशात् मैंने तुमको इसतरह से मारा है । अतएव तुम मुझपर प्रसन्न होओ ॥२६२॥ बतलाओं मैं व्याघ्र का रूप त्याग कर कब फिर मनुष्य होऊँगा ? हे मृगि ! इस प्रकार के शाप से मुक्ति का साधन तुम मुझे बतलाओ ॥२६३॥ राजा के इस तरह कहने पर मृगी ने उससे कहा-- हे राजन्! इस शाप के सौ वर्ष बीत जाने पर यहाँ पर एक गौ आयेगी । उस नन्दा नाम की गौ के साथ तुम्हारा संवाद होने पर तुम्हारे शाप का अंत होगा । मृगी के इस प्रकार से कहने पर वह राजा व्याघ्र बन गया ॥२६५॥ उसके नख एवं दाँत ही आयुध थे वह राजा अत्यन्त भयङ्कर व्याघ्र हो गया । वह वहाँ पर पशुओं तथा मृगों को मार कर खाते हुए शि ९

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