Srishti Khanda Extracted Page 266
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-266
Sanskrit Original
स्नातव्यं पुष्करे नित्यं ब्रह्मलोकमभीप्सिता । त्रीणिश्वृंगाणि शुभ्राणि त्रीणि प्रस्रवणानि च ॥२४०॥ पुष्कराणि प्रसिद्धानि न विद्यास्तत्र कारणम् । कनीयांसंमध्यमं च तृतीयं ज्येष्ठपुष्करम् ॥२४१॥ श्रृगशब्दाभिधानानि शुभप्रस्रवणानि च। धर्मार्थकाममोक्षाणं संकल्पैरफलं नरः॥२४२॥ यस्तत्र संत्यजेद्देह मोक्षं प्राप्रोत्यसंशयम् । प्रयतः संयतस्तस्यां स्रात्वा दद्याद्विजे शुभाम् ॥२४३॥ गामेकां मंत्रपूतां च लोकानाप्रोतिमोक्षदान् । किमत्रबहुनोक्तेन रात्रावपि हि योर्थिने॥२४४॥ अर्थ प्रयच्छते स्त्रात्वा सोऽनन्तं सुखमश्नुते । तत्र दानं प्रशंसंति तिलानां मुनिसत्तमाः ॥२४५॥ कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां स्नानं च विहितं सदा । पिण्याकेन गुडेनापि पिंडं योत्र प्रयच्छति ॥२४६॥ पितृणां प्रयतो भूत्वा पितृलोकं स गछति । पुष्करारण्यमासाद्य पुनस्तस्मात्सरस्वती ॥२४७॥ अंतर्धानं गता गंतुं प्रवृत्ता पश्चिमामुखी । नातिदूरे ततस्तस्य पुष्करस्य सुशोभना ॥२४८॥ खर्जूरवनमासाद्ा फलपुष्पोपशोभितम् । तत्रोषित्वा पुनर्देवी वने मुनिमनोरमे॥२४९॥ सर्वर्तुकुसुमाकीर्णे सिद्धचारणसेविते। नंदा नाम सरिच्छेष्ठा त्रिषु लोकेषु विश्रुता॥२५०॥ मीननक्रझषोपेता विमलोदकपूरिता । सूत उवाच अथ देवव्रतः प्राह किमनया सा सरिद्वरा ॥२५९॥ एतन्मे कौतुकं ब्रह्मन्नंदा शब्दा सरस्वती। यथाभूता येन कृता कारणेन सरिद्वरा ॥२५२॥ नियमपूर्वक पुष्कर तीर्थ में स्नान करके प्रतिदिन ब्रह्माजी का दर्शन करता है । अनुलोम तथा विलोम रूप से अथवा व्यस्त एवं समस्त रूप से (अर्थात् पहले ज्येष्ठ पुष्कर फिर मध्यम पुष्कर और अन्त में कनिष्ठ पुष्कर और उसके वाद पहले कनिष्ठ पुष्कर फिर मध्यम पुष्कर और अन्त में ज्येष्ठ पुष्कर यह अनुलोम और विलोम विधि है, या एक- एक दिन एक-एक पुष्कर में यह व्यस्त क्रम है अथवा प्रतिदिन तीनों पुष्करों में यह समस्त क्रम है |) ब्रह्मलोक को प्राप्त करने की कामना वाले को स्नान करना चाहिए । पुष्कर क्षेत्र में तीन सुन्दर शिखर है तथा तीन स्रोत है वे सब न जाने क्यों पुष्कर के ही नाम से प्रसिद्ध हैं । वे क्रमशः कनिष्ठ पुष्कर, मध्यम पुष्कर तथा ज्येष्ठ पुष्कर कहलाते हैं॥२४१॥ शृङ्ग शब्द से कहे जाने वाले तथा सुन्दर स्रोत ये धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष के सङ्कल्प से युक्त मनुष्य फल रहित हो जाता हे । जो नियम पूर्वक इन्द्रियों को वश में रखकर उस सरस्वती नदी में स्नान करके वहाँ पर ब्राह्मणों को एक गौ का दान करता है । वह मोक्ष प्राप्त करता है । जो मनुष्य सरस्वती नदी के तट पर ही अपने शरीर का त्याग कर देता है, वह मोक्ष को प्राप्त करता है । इस विषय में बहुत क्या कहना है, जो रात्रि मे भी स्नान करके याचक को ॥२४३-२४४॥ धन दान देता है, वह अनंत सुख को प्राप्त करता है । श्रेष्ठ मुनिजन वहाँ पर तिल के दान की प्रशंसा करते हैं ॥२४५॥ वहाँ पर कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को सदैव ही स्नान करना चाहिए। यहाँ पर पिण्याक अथवा गुड का भी जो पिण्डदान पितरों को करता है ॥२४६॥ वह पितृलोक में जाता है । पुष्करारण्य में आकर सरस्वती नदी वहाँ से ॥२४७॥ पश्चिम समुद्र में जाने के लिए अन्तर्धान हो गयी और पश्चिमाभिमुख चली । उसके बाद पुष्कर के संन्निकट में ही वह सरस्वती नदी ॥२४८॥ पुष्प एवं फल से सुशोभित खर्जूरी वन में आयी । मुनियों से मनोहर बने हुए उस वन में सरस्वती देवी रुक गयीं ॥२४९॥ वह वन सभी ऋतुओं में होने वाले पुष्पों से सुशोभित था, उस वन में सिद्ध एवं चारणगण रहते थे वहाँ पर वे नन्दा नामक नदी गयीं । यह नदी तीनों लोकों में विख्यात हैं ॥२५०॥ वह नदी मछली, घड़ियाल तथा झष से परिपूर्ण हो गयी ।
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