Srishti Khanda Extracted Page 265
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-265
Sanskrit Original
सर्वेषामेव तीर्थानामिदमेवाधिकं स्मृतम्। आदितीर्थमिदं तस्मात्तीर्थानां भुवि विश्रुतम् ॥२२५॥ धर्मापवर्गयोः क्रीडा निधिभूतमवस्थितम् । सरस्वत्या पुनश्चैव समेतं गुणवत्तरम् ॥२२६॥ धर्मार्थकाममोक्षाणां चतुर्णामपि दायकम्। येप्यत्र मलनाशाय पुमांसो विविशुर्जलम् ॥२२७॥ गोप्रदानसमं तेषां सुखेनैव फलं भवेत् । सुवर्णदानेन सममेवमाहुर्मनीषिणः ॥२२८॥ तर्पणात्पिण्डदानाच्च नरकेष्वपि संस्थिताः । स्वर्ग प्रयान्ति पितरस्तत्र पुत्रेणतारिताः ॥२२९॥ पुष्करेपि सरस्वत्यां ये पिबन्ति जलं जना: । ते लभन्तेऽ क्षयान् लोकान् ब्रह्मविश्वेशवंदितान् ॥२३०॥ स्वर्गनिश्रेणिकाभूता पुष्करे च सरस्वती । सापुण्यवद्धिस्संप्राप्तुं पुंभिशशक्या महानदी ॥२३९॥ मुनिभिर्धर्मतत्त्वज्ञ स्तत्र तत्र निषेविता । तस्मात्सर्वत्र सा देवी पवित्रा सर्वतस्स्थिता ॥२३२॥ पुष्करे तु विशेषेण पूतात्पूततमाहि सा । नदी सरस्वती पुण्या सुलभा जगति स्थिता ॥२३३॥ दुर्लभा सा कुरुक्षेत्रे प्रभासे पुष्करे तथा । तत्तीर्थ सर्वतीर्थानां प्रवरं विहितं भुवि ॥२३४॥ धर्मार्थकाममोक्षाणां चतुर्णामपि साधकम्। प्राचीं सरस्वतीं प्राप्य योन्यत्तीर्थं हि मार्गते॥२३५॥ स करस्थं समुत्सृज्य ह्यमृतं विषमिच्छति । ज्येष्ठे ज्येष्ठ प्रयागस्य मध्ये मध्यमास्मृता ॥२३६॥ प्रदक्षिणं ततो गच्छेत्कनीयांसं विचक्षणः । त्रिष्वष्येतेषु स्नायीत कुर्याच्चापि प्रदक्षिणम् ॥२३७॥ प्रयच्छति पितृभ्यो यस्तोयं तेषां तिलान्वितम्। तेपि तुष्टाः पुनस्तस्य प्रयच्छंत्यमितं फलम् ॥२३८॥ यः स्नात्वा प्रयतो नित्यं ततः पश्येत्पितामहम् । अनुलोमविलोमाभ्यां तथा व्यस्तसमस्तयोः ॥२३९॥ पवित्र है, उसी के कारण यह पुष्कर तीर्थ ही पृथिवी पर आदि तीर्थ के नाम से विख्यात है ॥२२५॥ यह तीर्थ धर्म तथा मोक्ष का क्रीडा निधि स्वरूप है और सरस्वती का संयोग प्राप्त करके और अधिक गुण सम्पन्न हो गया है।।२२६॥ यह तीर्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारो पुरुषार्थो को प्रदान करने वाला है । जो लोग शरीर का मल धोने के लिए जल में प्रवेश करते हैं ॥२२७॥ उनको भी बड़ी आसानी से गोदान करने का फल प्राप्त होता है। उसे मनीषियों ने सुवर्ण दान करने के फल के समान फल बतलाया है ॥२२८॥ यहाँ पर तर्पण तथा पिण्डदान करने से नरक मे भी विद्यमान पितृगण उस पुत्र के द्वारा तारे जाकर स्वर्ग में चले जाते हैं ॥२२९॥ पुष्कर तीर्थ में जो लोग सरस्वती नदी का जल पीते हैं, वे लोग ब्रह्माजी तथा श्रीशङ्करजी के द्वारा वन्दित अक्षय लोक में जाते हैं ॥२३०॥ पुष्कर तीर्थ में सरस्वती नदी स्वर्ग की सीढी के समान है । उस महानदी को कोई पुण्यवान् मनुष्य ही प्राप्त कर सकता है ॥२३१॥ उसका स्थान-स्थान पर सेवन धर्म तत्त्वों के ज्ञाता मुनिजन करते हैं । इसलिए सरस्वती देवी सभी स्थानों पर पवित्र मानी गयी हैं ॥२३२॥ पुष्कर तीर्थ में वह नदी विशेष रूप से अत्यन्त पवित्र मानी गयी है । पवित्र सरस्वती नदी संसार में अन्यत्र सुलभ है ॥२३३॥ वह प्रभास क्षेत्र तथा कुरुक्षेत्र तथा पुष्कर क्षेत्र में दुर्लभ है । पुष्कर तीर्थ पृथिवी के सभी तीर्थ में श्रेष्ठ तीर्थ है ॥२३४।। वह धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष इन चारो पुरुषार्थो को प्रदान करने वाला है । प्राची सरस्वती को प्राप्त करके जो मनुष्य दूसरे तीर्थ का अन्वेषण करता है ॥२३५॥ वह हाथ में आये हुए अमृत का परित्याग करके विष को प्राप्त करना चाहता है । ज्येष्ठ मास में ज्येष्ठ पुष्कर में स्नान करके उसकी प्रदक्षिणा करने से प्रयाग की प्रदक्षिणा का फल मिलता है, बीच में मध्यम पुष्कर में स्नान करके उसकी प्रदक्षिणा करे, उसके बाद विचक्षण पुरुष छोटे पुष्कर में स्नान करके उसकी प्रदक्षिणा करे । इन तीनों पुष्करों में स्नान करके उनकी प्रदक्षिणा करनी चाहिए ॥२३६-२३७॥। जो व्यक्ति उन पुष्करो के जल को तिल के साथ पितरों को जल दान करता है, उससे प्रसन्न होकर पितृगण उस तर्पण कर्ता को असीमित फल प्रदान करते हैं ॥२३८॥ जो
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