Srishti Khanda Extracted Page 264

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-264

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Sanskrit Original

तस्मात्सर्वेषु तीर्थेषु स्नातः प्राप्रोति यत्फलम्। तत्सर्व प्रापनुयान्मत्यों ज्येष्ठकुंडे सकृत्प्लुतः ॥२०९॥ किमत्र बहुनोक्तेन क्षेत्रं तीर्थं गतिश्शुभा। येगैत्त्रितयं प्राप्तं प्राप्ता तेन गतिः परा ॥२१०॥ कालेक्षेत्रे तथातीर्थे स्नात्वा हुत्वापि तत्र यः । प्रयच्छतो द्विजायार्थं सोऽनंतं सुखमश्नुते ॥२११॥ कार्तिके मोसि शुक्ले च वैशाखे शशिभूषणे। चंद्रसूर्योपरागे च काले च कुरुजांगले ॥२१२॥ क्षतरष्वेतेषु तीर्थानि यान्युक्तानि मुनीश्वरैः । तेषां पुण्यतमं तीर्थमिदमाह पितामहः॥२९३॥ कुंडे तु मध्यमे स्नात्वा कार्तिक्यां यः पुमान्द्रिजे । प्रयच्छते चापि द्रव्यं सोश्वमेधमवाघ्नुयात् ॥२९४॥ एवं कनिष्ठकेप्यत्र कुंडे स्नात्वा समाधिना । यः प्रयच्छति विप्राय सुरूपामपि शालिकाम् ॥२१५॥ स प्रयाति नरः क्षिप्रमध्रिलोकं मनोरमम् । त्रिः सप्तकुलसंयुक्तो भुंक्ते तत्र महाफलम् ॥२१६॥ तस्मात्सर्वप्रयत्मेन गमनाय मतिः स्थिरा । पुरुषेण तु कर्तव्या पुष्करावाप्तये शुभा ॥२९७॥ पुष्करारण्यमासाद्य॒ प्राची यत्र सरस्वती । मतिः स्मृतिः शुभा प्रज्ञा मेधा बुद्धि दया परा॥२९८॥ सरस्वत्यास्तु पर्यायाष्षडेते संप्रकीर्तिताः। ततः प्रभृति यत्रासौ प्राची भूता सरस्वती ॥२१९॥ तत्रस्थं तज्जलं येऽपि पश्यंति तटसंस्थिताः । तेप्यश्वमेधस्य फलं लभंते नात्र संशयः ॥२२०॥ योवतीर्य॑ पुनस्तत्र कश्चित्स्नानं समाचरेत् । नरः समाधियुक्तो वै ब्रह्मणोऽनुचरो भवेत् ॥२२१॥ शाकादिनापि हि पितृन्यस्तत्रार्चयते नरः । सोप्येति विपुलान्भोगांस्तेषामेवानुभावतः ॥२२२॥ ये पुनर्विधिना तत्र श्राद्धं कुर्वंति मानवाः। ते नयंति पितृन्स्वर्गं नरकादपि दुःखदात्॥२२३॥ तृप्यंति पितरस्तस्य यस्तत्र कुशमिश्रितम् । स्नात्वा प्रयच्छते तोयं पूतं तेषां तिलान्वितम् ॥२२४॥ में एक बार स्नान करके ही प्राप्त कर लेता है ॥२०९॥ इस विषय में बहुत अधिक क्या कहना है जिसने, जिसने उत्तम क्षेत्र, उत्तम तीर्थ तथा उत्तम गति इन तीनों को प्राप्त कर लिया उसने परमागति को प्राप्त कर लिया ॥२१०॥ जो व्यक्ति पुण्यकाल, पवित्र क्षेत्र तथा पवित्र तीर्थ में स्नान और होम करके ब्राह्मणों को धन दान करता है वह अनन्त सुख को प्राप्त करता है ॥२११॥ कार्तिक मास तथा वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में तथा चन्द्रग्रहण एवं सूर्यग्रहण के समय कुरुजाङ्गल प्रदेश में ॥२१२॥ मुनीश्वरों ने इन क्षेत्रों में जिन तीर्थो को बतलाया है, उन सभी तीर्थो में इस ज्येष्ठ पुष्कर तीर्थ को सबसे बड़ा तीर्थ ब्रह्माजी ने बतलाया है ॥२१३॥ जो व्यक्ति कार्तिक मास की पूर्णिमा को पुष्कर के मध्यपुष्कर में स्नान करके ब्रह्मण को द्रव्य दान करता है वह अश्वमेध याग करने का फल प्राप्त करता है॥२१४॥ इसीतरह छोटे पुष्कर कुण्ड में भी भक्ति पूर्वक स्नान करके जो ब्राह्मण को सुन्दर शाल दान करता है॥२१५॥ वह भी शीघ्र ही सुन्दर अग्नि लोक में जाता है और वहाँ पर अपने इक्कीस पीढ़ी के पूर्वजों के साथ महान् फल का भोग करता है ॥२१६॥ अतएव पुरुष को चाहिए कि वह हर प्रकार के प्रयास पूर्वक पुष्कर क्षेत्र में जाने का दृढ निश्चय करे ॥२१७॥ मति, स्मृति, मेधा, प्रज्ञा तथा दया ये सरस्वती के पर्याय माने गये हैं, जो व्यक्ति पुष्कर तीर्थ में आकर जहाँ पर प्राची सरस्वती हैं, वहाँ पर तट पर खड़ा होकर जल का दर्शन कर लेने मात्र से भी अश्वमेध यज्ञ करने का फल प्राप्त होता है॥२१८-२२०॥जो व्यक्ति सरस्वती नदी में प्रवेश करके भक्ति पूर्वक स्नान करता है, वह मृत्यु के बाद ब्रह्माजी का अनुचर होता है ॥२२१॥ जो व्यक्ति शाक इत्यादि से भी पितरों की पूजा करता है, वह उन पितरों की ही कृपा से विपुल मात्रा में भोगों को प्राप्त करता है ॥२२२॥ जो व्यक्ति वहाँ पर विधिपूर्वक श्राद्ध करते हैं वे लोग दुःखद नरक से भी अपने पितरों का उद्धार कर लेते हैं ॥२२३॥ जो व्यक्ति वहाँ कुश और तिल लेकर स्नान करके पितरों का तर्पण करते हैं उनके भी पितृगण तृप्त हो जाते हें ॥२२४॥ सभी तीर्थो से यह पुष्कर तीर्थ ही अधिक

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