Srishti Khanda Extracted Page 263

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-263

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Sanskrit Original

पश्चिमं सागरं नेतुं बाडवज्वलनं शुभे। एवं क्रमेण गच्छत्या तदा सः प्राप्स्यते शुभे ॥१९५॥ ततस्तं शातकुंभस्थं कृत्वासौ बडवानलम् । समर्पयत गोविंदः सरस्वत्या महोदरे ॥१९६॥ सा तं गृहीत्वा सुश्रोणी प्रतीच्यभिमुखी ययौ । अंतद्धनिन संप्राप्ता पुष्करं सा महानदी ॥१९७॥ मर्यादापर्वते तस्मिन्संभूता विमला सरित्। पुष्करारण्यं विपुलं सुरसिद्धनिषेवितम् ॥१९८॥ पितामहेन यत्रासीद्यज्ञसत्रं निषेवितम् । सिध्यर्थं मुनिमुख्यानामागताऽसौ महानदी ॥१९९॥ येषु तत्र कृतो होमः कुंडेष्वासीद्विरिचिना । तानि सर्वाणि संप्लाव्य तोयेनाप्युद्रताहि सा ॥२००॥ तत्र क्षेत्रे महापुण्या पुष्करे सा तथोत्थिता । तेन तत्पूरणं प्रोक्तं वायुना जगदायुषा ॥२०१॥ सापि तव्क्षेत्रमासाद्य पुण्यं पुण्या महानदी। सरस्वती स्थिता देवी मर्त्यानां पापनाशिनी ॥२० २॥ तत्र ये शुभकर्माणः पुष्करस्थां सरस्वतीम् । पश्यंति ते नपश्यंति सुघोरां तामधोगतिम् ॥२०३॥ यः पुनस्तत्र भावेन नरः स्नानं समाचरेत् । स ब्रह्मलोकमासाद्य ब्रह्मणा सह मोदते ॥२०४॥ यस्तु दद्यात्तत्र दधि ब्राह्मणाय मनोरमम्। सोप्यग्रिलोकमासाद्य भुंक्ते भोगान्सुशोभनान् ॥२०५॥ वरं प्रावरणं योपि भक्त्यादद्याद्द्विजातये। सोपि सद्दत्रदा नस्य फलं दशगुणं लभेत्॥२०६॥ ज्येष्ठकुंडे नरः स्नात्वा यः संतर्पयते पितृन् । स॒ तानुद्धरते सर्वान्नरकादपि शुद्धधीः॥२०७॥ क्षेत्रे पैतामहे पूते पुण्यां प्राप्य सरस्वतीम् । नरः किंम्रार्थयेदन्यत्तीर्थं ब्रह्मसुतोऽब्रवीत् ॥२०८॥ विद्यमान सरस्वती देवी ने भगवान् विष्णु से कहा-- आप मुझे अग्नि को प्रदान कीजिये मैं देवताओं के आदेश का पालन करूंगी ।।१९३॥ इसप्रकार से भगवान् विष्णु ने सरस्वती से कहा तुमको दाह का किसी प्रकार से भय नहीं है, इस महा अग्नि को तुम्हें पश्चिम सागर में छोड़ना है ॥१९४॥ हे शुभे ! पश्चिम सागर में वाडवाग्नि को ले जाने के लिए इसतरह क्रमश जाते हुए वह समुद्र मिलेगा ॥१९५॥ उसके बाद भगवान् गोविन्द ने वाडवाग्नि को सुवर्ण के घड़े में रखकर सरस्वती को समर्पित किया और सरस्वती देवी ने उसके अपने उदर में रख लिया ॥१९६॥ उस बाडवाग्नि को लेकर सरस्वती नदी पूर्वाभिमुख होकर प्रस्थान की वे अन्तर्द्धान होकर चलती हुयी पुष्कर क्षेत्र में प्रकट हुयी ॥१९७॥ देवताओं से सेवित पुष्करारण्य के मर्यादा पर्वत पर वे प्रकट हुयी ॥१९९॥ वहीं पर ब्रह्माजी ने यज्ञ किया था, उन महामुनियों को सिद्धि प्रदान करने के लिए वे श्रेष्ठ नदी वहाँ आयीं ॥१९९॥ जिन कुण्डों में ब्रह्माजी ने होम किया था उन समस्त कुण्डों को उन्होंने जल से भर दिया और वहीं वे प्रकट हुयीं ॥२००॥ उस अत्यन्त पवित्र पुष्कर में सरस्वती नदी उद्धुत हुयी । इसलिए उस तीर्थ का नाम पूरण तीर्थ पड़ा । संसार को आयु प्रदान करने वाले वायु भी वहाँ आये ॥२०१॥ मनुष्यों का पाप नाश करने वाली अत्यन्त पवित्र वह सरस्वती देवी वहाँ स्थिर हो गयीं ।।२०२॥ जो पवित्र कर्म करने वाले मनुष्य वहाँ जाकर सरस्वती नदी का दर्शन करते हैं वे अघोगति को नहीं जाते हैं ॥२०३॥ जो व्यक्ति वहाँ आकर भक्ति भाव पूर्वक स्नान करता है वह ब्रह्मलोक में जाकर ब्रह्माजी के साथ आनन्दानुभव करता है ॥२०४॥ जो व्यक्ति वहाँ ब्राह्मण को सुन्दर दधि का दान करता है, वह अग्नि लोक में जाकर सुन्दर भोगों को भोगता है ॥२०५॥ जो व्यक्ति वहाँ पर अच्छे वस्रों का दान ब्राह्मण को देता है, वह वस्र दान के दश गुणा अधिक फल को प्राप्त करता है ॥२०६॥ यदि कोई मनुष्य ज्येष्ठ पुष्कर में स्नान करके अपने पितरों का तर्पण करता है वह शुद्ध बुद्धि वाला मनुष्य अपने पितरों का नरक से भी उद्धार कर देता है ॥२०७॥ ब्रह्माजी के पवित्र क्षेत्र में सरस्वती तीर्थ को प्राप्त करके अन्य तीर्थो से कया प्रार्थना करे यह ब्रह्माजी के पुत्र ने कहा है ॥२०८॥ अतएव सभी तीर्था में स्नान करके जिस फल की प्राप्ति होती है, उन सभी फलों को मनुष्य ज्येष्ठ कुण्ड

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