Srishti Khanda Extracted Page 262
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-262
Sanskrit Original
उदड्मुखी तदा भूत्वा त्यज शोकं शुचिस्मिते । अहं चोदड्मुखी पुण्या त्वंतु प्राची सरस्वति ॥१८ १॥ तत्र क्रतुशतं पुण्यं स्नानदानेन सुव्रते । श्राद्धदाने तथा नित्यं पितृणां दत्तमक्षयम् ॥१८२॥ ये करिष्यंति मनुजा विमुक्तास्त ऋणैस्त्रिभिः । मोक्षमार्गं गमिष्यंति विचारो नात्र विद्यते ॥९८३॥ तामुवाच ततो गंगा पुनर्दर्शनमस्तु ते । गच्छ स्वमालयं भत्रे स्मर्तव्याहं त्वयानघे ॥ ९८ ४॥ यमुना पि तथैवं सा गायत्री च मनोरमा । सावित्र्या सहिताः सर्वाः सखीं संप्रैषयंस्तथा ॥१८५॥ ततोविसृज्य तान्देवान्नदी भूत्वा सरस्वती । उत्तंकस्याश्रम पदं उद्धूता सा मनस्विनी ॥१८६॥ अधस्तात्प्लक्षवृक्षस्य अवरोप्य च तां तनुम् । अवतीर्णा महाभागा देवानां पश्यतां तदा ॥१८७॥ विष्णुरूपस्तरुः सोऽत्र सर्वदेवैस्तु वंदितः । संसेव्यश्च द्विजैर्नित्यं फलहेतोर्महोदयः ॥१८८॥ अनेकशाखावितत श्चतुर्मुख इवापरः। तत्कोटरकुटीकोटिप्रविष्टानां द्विजन्मनाम्॥१८९॥ श्रूयंते विविधा वाचः सुराणां रक्तचेतसाम् । वनस्पतिरपुष्पोपि पुष्पितश्चोपलक्ष्यते ॥१९०॥ जातीचंपकवत्पुष्पैः शाखालग्नैः शुकैः शुभैः । केतकीभिः सुरभिभिरशोभत सरिद्दरा॥१९१॥ कोकिलाभिस्समालेव फेनकैः पुष्पितेव सा । हरेणेव यथा गंगा प्लक्षेणैव हि सा तथा ॥१९२॥ तत्रांभस्थ तदा देवं प्रोवाचाथ जनार्दनम् । समर्पयस्व तं वह्निं देवादेशं करोम्यहम् ॥१९३॥ एवमुक्तेन सा तेन प्रत्युक्ता विष्णुना तदा। न ते दाहभयं त्याज्यस्त्वयायं वह्विराट् स्वयम्॥९९४॥ हुयी गङ्गा देवी को सरस्वती ने कहा ॥१७८॥ हे सखि ! मैं पुनः तुमसे मिलूंगी, तुम कहाँ तक जाओगी ? इस तरह से सरस्वती के कहने पर गङ्गा ने मधुर वाणी में कहा ॥१७९॥ जब तुम पूर्व दिशा में आओगी तो तुम मुझको देखोगी । देवताओं से घिरी हुयी तुम मुझे दर्शन दोगी ॥१८०॥ हे शुचिस्मिते ! तुम उत्तराभिमुखी होकर अपने शोक का परित्याग कर दो । मैं उत्तर वाहिनी होकर अत्यन्त पवित्र हो जाती हूँ तथा तुम प्राची सरस्वती के रूप में परम पवित्र होती हो ॥१८१॥ हे सुव्रते ! प्राची सरस्वती में स्नान और दान करने से सैकड़ों यज्ञों का फल प्राप्त होता है। वहाँ पर श्राद्ध करने से पितरों को अक्षय तृप्ति होती है ॥१८२॥ जो मनुष्य प्राची सरस्वती में श्राद्ध करके दान करेंगे वे तीनों ऋणों से मुक्त हो जायेंगे वे लोग निश्चित रूप से मोक्ष को प्राप्त करेंगे ॥१८३॥ सरस्वती ने गङ्गा से कहा अब फिर तुम्हारा दर्शन कब होगा । हे अनघे ! तुम अपने घर जाओ, मेरी भी याद रखना ॥१८४॥ उसी तरह से यमुना, मनोरमा, गायत्री तथा सावित्री ने भी अपनी सखी सरस्वती को भेजा ॥१८५॥ उसके बाद उन देवताओं से विदा लेकर सरस्वती ने नदी का रूप धारण कर लिया । उसके बाद मनस्विनी सरस्वती नदी उत्तंकमुनि के आश्रम में प्रकट हुयीं ।।१८६॥ उन्होंने अपने उस शरीर को पाकड़ वृक्ष की जड़ में स्थापित कर दिया और वे सभी देवताओं के सामने ही नदी के रूप में अवतीर्ण हो गयीं ।१८७॥ वह वृक्ष विष्णु स्वरूप है, सभी देवता उनकी वंदना करते हैं अतएव वह फल चाहने वालों के द्वारा सेवनीय हैं ॥१८८॥ वह दूसरे ब्रह्मा के समान है । उसकी अनेक शाखायें फैली हुयी हैं । उस वृक्ष के कोटर में उसमें प्रवेश किए हुए ऋषियों की करोड़ों कुटिया हैं ॥१८९॥ उसमें अनुरक्त अन्तःकरण वाले देवताओं की अनेक प्रकार की ध्वनियाँ सुनायी देती हैं । वह पुष्परहित भी वनस्पति पुष्पित के समान दिखता है ॥१९०॥ उसकी शाखा में बैठे हुए सुन्दर शुक पक्षी चमेली तथा चम्पा के पुष्पों के समान प्रतीत होते हैं । वह श्रेष्ठ नदी सुगन्धित केतकी पुष्प के समान सुशोभित होती हैं ॥१९१॥ कोकिलाओं के द्वारा वह माला से युक्त के समान प्रतीत होती है और फेनों के द्वारा पुष्पित के समान लगती है । जिसतरह गंगाजी को शङ्करजी धारण करते हैं, उसीतरह सरस्वती नदी को वह प्लक्ष वृक्ष धारण करता है ॥१९२॥ वहाँ पर जल में
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