Srishti Khanda Extracted Page 261

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-261

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

सरस्वतीं सामानीय कृत्वांकेवरवर्णिनीम् । शिरस्याघ्राय सस्नेहमुवाचाथ सरस्वतीम् ॥१६६॥ मां च देवि सुराः प्राहुः सत्वं ब्रूहि यशस्विनीम् । नीत्वा विनिक्षिपेदेनं बाडवं लवणांवुनि ॥१६७॥ पितुर्वाक्यं हि तच्छुत्वा वियुक्ता कुररी यथा। पित्रा तदैव सा कन्या रुरुदे दीनमानसा ॥१६८॥ शोभते तन्मुखं तस्याः शोकबाष्पाविलेक्षणम्। सितं विकसितं तद्दत्पदमं तोयकणोक्षितम् ॥१६९॥ तत्तथाविधमालोक्य पितामह पुरस्सराः। बिबुधाः शोकभावस्य सर्वे वशमुपागताः ॥१७०॥ संस्तभ्य हृदयं तस्याः शोकसंतापितं तदा । पितामहस्तामुवाच मारोदी नास्ति ते भयम् ॥१७१॥ मानलाभश्च भविता तव देवानुभावतः। नीत्वा क्षारोदमध्ये तु क्षिपस्वज्वलनं सुते॥१७२॥ एवमुक्ता तु सा बाला बाष्पाकुलितलोचना । प्रणम्य पद्मजन्मानं गच्छाम्युक्तवती तु सा ॥१७३॥ मा भैरुक्ता पुनस्तैस्तु पित्रा चापि तथैव सा। त्यक्त्वाभयं हृष्टमनाः प्रयातुं समवस्थिता॥९७४॥ तस्याः प्रयाणसमये शंखदुंदुभिनिस्वनैः। मंगलानां च निर्घोषे र्ज॑गदापूरितं शुभैः ॥१७५॥ सितांबरधरा धन्या सितचंदनमंडिता । शरदंबुजसच्छायतारहारविभूषिता ॥१७६॥ संपूर्णचंद्रवदना पद्यपत्रायतेक्षणा । शुभां कीर्ति सुरेशस्य पूरयंती दिशो दश ॥१७७॥ स्वतेजसा तद्ूदया निःसृता भासयञ्जगत्। अनुव्रजन्ती तां गंगा तयोक्ता वरवर्णिनी ॥१७८॥ द्रक्ष्यामि त्वां पुनरहं प्रयासि कुत्र मे सखि । एवमुक्ता तु सा गंगा प्रोवाच मधुरांगिरम् ॥१७९॥ यदैवायास्यसि प्राची दिशां मां पश्यसे शुभे। बिबुधैस्त्वं परिवृता दर्शनं तव संश्रये ॥१८०॥ कोई दूसरा उपाय सोचें । सरस्वती देवी के अभिप्राय को जानकर सभी देवताओं ने ब्रह्माजी से कहा ॥१६४॥ हे पितामह ! बाडवाग्नि को कोई दूसरा नहीं ले जा सकता है । केवल आपकी कुमारी कन्या सरस्वती ही इस काम को कर सकती हैं । इनमें कोई भी दोष नहीं है ॥१६५॥ इसके बाद ब्रह्माजी ने सरस्वती को बुलाकर उन्हें अपनी गोद में बैठाया और उनका सिर सुंधा, उसके बाद उन्होने प्रेमपूर्वक सरस्वती से कहा ॥१६६॥ हे देवि ! देवताओं ने मुझसे प्रार्थना की है कि आप सरस्वती से कहें कि वे बाडवाग्नि को क्षार समुद्र में डाल दें ॥१६७॥ अपने पिता की बात को सुनकर चक्रवाकी के समान ब्रह्माजी से अलग होकर सरस्वती दीन होकर रोने लगीं ।।१६८।। उस समय सरस्वती देवी के मुख और नेत्र आंसुओं से भरे होने पर भी सुशोभित हुए । लगता था कि जैसे विकसित श्वेत कमल के ऊपर ओस कण पड़ें हों ॥१६९॥ उनको वैसा देखकर पितामह ब्रह्माजी सहित सभी देवता शोक सन्तप्त हो गये॥ १७०॥ ब्रह्माजी ने सरस्वती के शोक संतप्त हृदय को पकड़कर कहा रोओ मत तुमको किसी भी प्रकार का भय नहीं है ॥१७१॥ देवताओं के प्रभाव से तुमको सम्मान मिलेगा । पुत्रि ! इस अग्नि को लेजाकर तुम क्षार समुद्र में जल में फेक दों ॥१७२॥ ब्रह्माजी की इस वाणी को सुनकर आंसू भरे नेत्रो वाली सरस्वती ने ब्रह्माजी को प्रणाम करके कहा-- मैं जा रही हूँ ॥१७३॥ इसके बाद देवताओं तथा ब्रह्माजी ने सरस्वती से कहा किसी प्रकार का भय मत करो । इसके बाद भय का परित्याग करके प्रसन्नता पूर्वक सरस्वती देवी जाने के लिए तैयार हो गयी ।।१७४॥ सरस्वती देवी के जाने के समय शंख, दुन्दुभि इत्यादि मङ्गलमय वाद्यों को ध्वनि से सारा संसार गुञ्जित हो उठा॥१७५॥ श्वेत वस्त्र धारण की हुयी, प्रशंसनीय श्वेत चन्दन से मण्डित शरत् कालीन कमल के समान मनोहर मोतियों की माला से मनोहर बनी हुयी सरस्वती देवी ॥१७६॥ का मुखमण्डल पूर्ण चन्द्रमा के समान आह्लादक था, कमलदल के समान उनके नेत्र विस्तृत थे । दशो दिशाओं में वे ब्रह्माजी के पवित्र यश को फैला रही थी ॥१७७॥ उनके ही तेज से उनके हदय से जगत् को प्रकाशित करती हुयी सरस्वती नदी निकल पड़ी । उनके पीछे-पीछे चलती

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know