Srishti Khanda Extracted Page 260
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-260
Sanskrit Original
प्राची तटे जाप्यपरो नचेह म्रियते पुनः। अल्पतो वाजिमेघस्य फलमाप्स्यति पुष्कलम् ॥९५ ९॥ नियपैश्चोपवासैश्च कर्शयन्देहमात्मनः । जलाहारो वायुभक्षः पर्णाहारश्च तापसः ॥१५२॥ तथास्थंडिलशायी च ये चान्ये नियमा: पृथक् । करोति योद्विजश्रेष्ठो नियमांस्तान् ब्रतानि च ॥१५३॥ स याति शुद्धदेहश्च ब्रह्मणः परमं पदम् । तस्मिस्तीर्थे तु यैर्दत्तं तिलमात्रं तु कांचनम् ॥१५४॥ मेरुदानसमं तत्स्यात्पुरा प्राह प्रजापतिः । तस्मिंस्तीर्थे तु ये श्राद्धं करिष्यंति हि मानवाः॥१५५॥ एकविंशकुलोपेताः स्वर्ग यास्यंति ते नराः । पितृणां च शुभं तीर्थं पिण्डेनैकेन तर्पिताः ॥९५६॥ ब्रह्मलोकं गमिष्यंति स्वपुत्रेणेह तारिताः । भूयश्चान्नं न चेच्छति मोक्षमार्गं व्रजंति ते ॥१५७॥ प्राचीनत्वं सरस्वत्या यथाभूतं शृणुष्व तत्। सरस्वती पुरा प्रोक्ता देवैः सर्वैः सवासवैः ॥१५८॥ तटं त्वया प्रयातव्यं प्रतीच्यां लवणोदधेः । बडवाग्निमिमं नीत्वा समुद्रे निक्षिपस्व ह ॥१५९॥ एबं कृते सुराः सर्वे भवंति भयवर्जिताः। अन्यथाबाडवाग्निस्तु दहते स्वेन तेजसा ॥१६०॥ तस्माद्रक्षस्व विबुधानेतस्मादचिराद्भयात् । मातेव भव सुश्रोणि सुराणामभयप्रदा ॥१६९॥ एवमुक्ता तु सा देवी विष्णुना प्रभविष्णुना । आह नाहं स्वतंत्रास्मि पिता मे व्रियतां स्वराट्॥९६२॥ तदाज्ञाकारिणी नित्यं कुमारीह धृतव्रता । पित्रादेशाद्विना नाहं पदमेकमपि क्वचित् ॥१६३॥ गच्छामि तस्मात्कोप्यन्य उपायञ्चित्यतामहो । तदाशयं विदित्वाहुस्ते समेत्य पितामहम्॥९६४॥ नान्येन शक्यत नेतुं बडवाग्निः पितामह। अदृष्टदोषाम्मुक्त्वैकां कुमारीं तनयां तव ॥१६५॥ प्रदान करने वाली है ॥१४९॥ जो व्यक्ति इस सरस्वती नदी के उत्तर तट पर आपने शरीर का परित्याग करेगा, उसको इस लोक में तथा परलोक में कुछ भी दुर्लभ नहीं होगा ॥१५०॥ जो व्यक्ति प्राची सरस्वती नदी के तट पर जप करता है, उसकी पुनः मृत्यु नहीं होती है; अर्थात् वह मुक्त हो जाता है । इस नदी में स्नान करने वाले को अश्वमेघ यज्ञ करने का फल प्राप्त होता है ॥१५१॥ यहाँ पर नियम पूर्वक उपवास करते हुए जो तपस्वी अपने शरीर का शोषण जल पीकर, वायु पीकर या पत्तों का आहार करके करता है ॥१५२॥ स्थण्डिल (वेदी) पर सोता हे इसके अतिरिक्त अन्य नियमों का पालन करता है तथा श्रेष्ठ नियमों और ब्रतों का पालन करता है ॥१५३॥ वह शुद्ध देह ब्राह्मण परमपद को प्राप्त करता है । जो इस तीर्थ में तिल के बराबर भी सुवर्ण का दान करता है, उसके द्वारा किया गया वह दान सुमेरु के दान के समान होता है । इस बात को प्राचीन काल में ब्रह्माजी ने कहा है । उस तीर्थमें जो मनुष्य अपने पितरों का श्राद्ध करेंगे, वे अपने इक्कीस पीढी के पितरों के साथ स्वर्गलोक में चले जायेंगे । यहाँ एक ही पिण्ड का दान करने से पितरों को तृप्ति हो जाती है ॥१५४-१५६॥ वे अपने पुत्र के द्वारा तारे जाकर ब्रह्मलोक में जाते हैं । वे फिर अन्न प्राप्त करने की इच्छा नहीं करते है, वे मुक्त हो जाते हैं । यह प्राची सरस्वती कैसे हुयी इस बात को आप सुनें । प्राचीन काल में इन्द्र आदि देवताओं ने सरस्वती से कहा ॥१५७-१५८।। आप पश्चिम दिशा में क्षार समुद्र के तट पर जायँ और इस बाडवाग्नि को लेकर पश्चिम समुद्र में डाल दें ॥१५९॥ ऐसा करने से सभी देवता निर्भय हो जायेंगे, अन्यथा यह बाडवग्नि अपने तेज से सबों को जलाता रहता है ॥१६०॥ अतएव आप शीघ्र ही देवताओं को इस भय से रक्षा करें । हे सुश्रोणि ! देवताओं को अभय प्रदान करके आप उनकी माता के समान हो जायँ ॥१६१॥ इसतरह से प्रभविष्णु भगवान् विष्णु के द्वारा कहे जाने पर सरस्वती ने कहा-- में स्वतंत्र नहीं हूँ इसके लिए आप मेरे पिता ब्रह्माजी से कहें ॥१६२॥ मैं कुमारी हूँ, ब्रत धारण करने वाली हुँ, सदा उनकी आज्ञा का पालन करती हूँ पिता के आदेश के बिना मैं कहीं एक डग भी नहीं जा सकती हूँ ॥१६३॥ अतएव आप
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