Srishti Khanda Extracted Page 259

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-259

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Sanskrit Original

भो भो विप्रर्षभत्वं हि नृत्यसे केन हेतुना । नृत्यमानेन भवता जगत्सर्वं च नृत्यति ॥१३७॥ तेनायं वारितः प्राह॒ नृत्यन्वै मुनिसत्तमः । मुनिरुवाच किं न पश्यसि मे देव कराच्छाकरसोस्रवत् ॥९३८॥ तं तु दृष्टवा प्रनृत्तोहं हर्षेण महता वृतः। तं प्रहस्याब्रवीद्देवो मुनिं रागेण मोहितम् ॥१३९॥ अहं न विस्मयं विप्र गच्छामीह प्रपश्य माम् । एवमुक्तो मुनिश्रेष्ठो महादेवेन कौरव ॥१४०॥ ध्यायमानस्तदा कोऽयं प्रतिषिद्धोस्मि येन हि। अङ्गुल्यग्रेण राजेंद्र स्वांगुष्ठस्ताडितस्तथा ॥ १४ ९॥ ततो भस्मक्षताद्राजन्निर्गतं हिमपांडुरम् । तद्दृष्टवा ब्रीडितश्चासौ प्राह तत्पादयो: पतन् ॥१४२॥ नान्यद्देवादयं मन्ये रुद्रात्परतरं महत्। चराचरस्य जगतो गतिस्त्वमसि शूलधृत् ॥१४३॥ त्वया सृष्टमिदं सर्व वदंतीह मनीषिणः । त्वामेव सर्व विशति पुनरेव युगक्षये॥१४४॥ देवैरपि न शक्यस्त्वं परिज्ञातुं मया कुतः । त्वयि सर्वे च दृश्यन्ते सुराब्रह्मादयोपि ये ॥१४५॥ सर्वस्त्वमसि देवानां कर्ता कारयिता चयः। त्वत्प्रसादात्सुराः सर्वे भवंतीहाकुतोभयाः ॥१४६॥ एवं स्तुत्वा महादेवमृषिश्च प्रणतोब्रवीत् । भगवंस्त्वत्प्रसादेन तपो न क्षीयते त्विह ॥१४७॥ ततोदेवः प्रीतमनास्तमृषिं पुनरब्रवीत् । तपस्ते वर्द्धतां विप्र मत्प्रसादात्सहस्रधा ॥९४८॥ प्राचीमेवेह वत्स्यामि त्वया सार्धमहं सदा । सरस्वती महापुण्या क्षेत्रे चास्मिन्विशेषतः ॥१४९॥ न तस्य दुर्लभं किंचिदिहलोके परत्र च । सरस्वत्युत्तरे तीरे यस्त्यजेदात्मनस्तनुम्॥९५०॥ उन्होंने ऋषि से कहा-- हे ऋषि श्रेष्ठ ! आप किस कारण से नृत्य कर रहे हैं ? आपके नृत्य करने के कारण सारा संसार नृत्य करने लग गया है ॥१३७॥ रुद्र के द्वारा नृत्य करने से रोके जाने पर ऋषि नृत्य करते हुए ही कहे मुनि ने कहा--- हे देव ! आप यह नहीं देख रहे हैं कि मेरे हाथ से शाक का रस प्रवाहित हो रहा है ॥१३८॥ उसी को देखकर अत्यधिक हर्षित होकर नृत्य कर रहा हूँ । प्रेम से मोहित मुनि को देखकर जोर से हँसकर रुद्र ने कहा।१३९॥ हे विप्र इसको देखकर मैं तो आश्चर्यित नहीं हूँ । आप देखिये मुझको; हे कौरव भीष्म जी ! महादेव शाङ्करजी के द्वारा इसतरह से कहने पर ॥१४०॥ इसके बाद ध्यान करके महर्षि ने जानना चाहा कि ये कौन पुरुष हैं जो मुझे रोक रहे है ? हे राजेन्द्र रुद्र ने अपने अङ्गलियों के अग्रभाग से अपने अङ्गूठे को ठोका ॥१४१॥ उसके बाद उस घाव से वर्फ के समान श्वेत वर्ण का भस्म निकला । उसको देखकर लज्जित हुए ऋषि शङ्कर के पैरों पर गिर पड़े और कहे ॥१४२॥ मैं रुद्र से बढकर किसी भी देवता को नहीं मानता हूँ । हे त्रिशूलधारी ! चराचरात्मक जगत् के आप ही आश्रय हैं ॥१४३॥ मनीषी पुरुष कहते हैं कि आपने ही सम्पूर्ण जगत् की सृष्टि की है और जब युग की समाप्ति होती है तो प्रलय काल में सम्पूर्ण जगत् आप में ही प्रविष्ट हो जाता है ॥१४४॥ आपको तो देवगण भी तत्त्वत: नहीं जान पाते हैं, तो मैं कैसे जान पाऊंगा ? समस्त ब्रह्मा आदि देवता आप में ही दिखायी पड़ते हैं ॥१४५॥ आप ही देवताओं के सब कुछ करने वाले तथा उनसे कराने वाले हैं । आपकी कृपा प्राप्त करके सभी देवता इस संसार में निर्भय हो जाते हैं ॥१४६॥ इसतरह से महादेव शिवजी की स्तुति करके ऋषि ने उनको प्रणाम करके कहा-- हे भगवन् ! आपकी ही कृपा से यहाँ पर मेरा तप क्षीण नहीं होता है ॥१४७॥, उसके बाद प्रसन्न होकर शङ्करजी ने ऋषि ने कहा हे ब्रह्मण ! मेरी कृपा से आपकी तपस्या हजारो गुणा बढेगी ॥१४८॥ में इस प्राची सरस्वती में ही मैं आपके साथ निवास करूँगा । विशेष रूप से इस क्षेत्र में सरस्वती नदी अत्यधिक पुण्य

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