Srishti Khanda Extracted Page 258

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-258

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Sanskrit Original

उपतिष्ठंति राजेंद्र द्विजातीस्तत्र तत्र ह । जगुश्च देवगंधर्वा ननृतुश्चाप्सोगणा: ॥९२२॥ वादित्राणि च दिव्यानि वादयामासुरंजसा । तस्य यज्ञस्य संपत्या तुतुषुदेर्वता अपि ॥१२३॥ विस्मयं परम जग्मुः किमु मानुषयोनयः । वर्तमाने तथा यज्ञे पुष्करस्थे पितामहे ॥१२४॥ अब्रुवज्षयो भीष्म तदा तुष्टा स्सरस्वतीम्। सुप्रभां नाम राजेंद्र नाम्ना चैव सरस्वतीम् ॥१२५॥ ते दृष्ट्वा मुनयः सर्वे वेगयुक्तां सरस्वतीम् । पितामहं भासयंतीं क्रतुं ते बहुमेनिरे॥१२६॥ एवमेषा सरिच्छ्रेष्ठा पुष्करेषु सरस्वती । पितामहार्थ सम्भूता तुष्ट्यर्थं च मनीषिणाम् ॥९२७॥ पुण्यस्य पुण्यताकारि पंचस्त्रोतास्सरस्वती । सुप्रभा नाम राजेन्द्र नाम्ना चैव सरस्वती ॥९२८॥ यत्र ते मुनयश्शान्ता नाना स्वाध्यायवादिनः । ते समागत्य ऋषयस्सस्मरु श्वसरस्वतीम् ॥१२९॥ साभिध्याता महाभागा ऋषिभिः सत्रयाजिभिः । समास्थिता दिशं पूर्वा भक्तिप्रीता महानदी ॥१३०॥ प्राची पूर्वावहा नाम्ना मुनिबंद्या सरस्वती । इदमन्मयन्हाराज शभृण्वाश्चर्यरं भुवि ॥१३९॥ क्षतो मंकणको विप्रः कुशाग्रेणेति नः श्रुतम् । क्षतात्किल करे तस्य राजन् शाकरसोस्त्रवत् ॥१३२॥ स वै शाकरसं दृष्ट्वा हर्षाविष्टः प्रनृत्तवान् । ततस्तस्मिन्प्रनृत्ते तु स्थावरं जंगमं च यत् ॥१३३॥ प्रानृत्यत जगत्सर्वं तेजसा तस्य मोहितम् । शक्रादिभिस्सुरै राजन्रषिभिश्च तपोधनैः ॥१३४॥ विज्ञप्तस्तत्र वै ब्रह्मा नायं तृत्येत्तथा कुरु । आदिष्टो ब्रह्मणा रुद्र ऋषेरर्थे नराधिप॥१३५॥ नायं नृत्येद्यथा भीम तथा त्वं वक्तुमर्हसि । गत्वा रुद्रो मुनिं दृष्ट्वा हर्षाविष्टमतीव हि॥१३६॥ सभी कामनाओं की समृद्धि से ब्रह्माजी के यज्ञ करते रहने पर, धर्म एवं अर्थ में प्रवीण पुरुष भी वहाँ चिन्ता करते ही उपस्थित हो जाते थे ॥१२१॥ हे राजेन्द्र ! वे विभिन्न स्थान पर ब्राह्मणों की सेवा में लग जाते थे । देवगन्धर्व वहाँ गायन करते थे और अप्सराएँ नृत्य करती थीं ॥१२२॥ वे सदा दिव्य वाद्यो को बजाते थे । उस यज्ञ की सम्पत्ति से देवता भी सन्तुष्ट हो गये ॥१२३॥ वे भी अत्यन्त आश्चर्यित थे तो मनुष्यों के विषय में क्या कहना है ? ब्रह्माजी का इस प्रकार का यज्ञ जब पुष्कर में हो रहा था ॥१२४॥ हे भीष्म ! उस समय सन्तुष्ट होकर ऋषियों ने सुप्रभा नाम से सरस्वती को कहा ॥१२५॥ उन ऋषियों ने वेग युक्त सरस्वती को पितामह और उनके यज्ञ को प्रकाशित हुयी देखकर बहुत प्रसन्नता का अनुभव किया ॥१२६॥ इस प्रकार से नदियों में श्रेष्ठ सरस्वती नदी पुष्कर में ब्रह्माजी की तथा मनीषी ऋषियों की प्रसन्नता के लिए प्रकट हुयी थीं ॥१२७॥ पवित्र मनुष्य को पवित्र बनाने वाली तथा पाच रतो में प्रवाहित होने वाली सरस्वती नदी का नाम सुप्रभा तथा सरस्वती है ॥१२८॥ वहाँ पर शान्त मुनिजन अनेक वेदों का स्वाध्याय करते हैं, वे सभी ऋषि आकर सरस्वती देवी का स्मरण किए ॥१२९॥ सत्र में यजन करने वाले उन ऋषियों के द्वारा ध्यान किए जाने पर, उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर पूर्व दिशा में सरस्वती नदी प्रकट हुयी॥ १३ ०॥ मुनियों के द्वारा वंदनीय प्राची सरस्वती पर हुए एक अन्य आश्चर्यमय वृतान्त को मैं बतला रहा हूँ सुनो॥१३१॥ हमने सुना है कि मंकण नामक ब्राह्मण का हाथ कुश के अग्रभाग से कट गया । उस कटे हुए हाथ से शाक का रस प्रवाहित होने लगा ॥१३२॥ वे ब्राह्मण शाक के रस को देखकर अत्यन्त प्रसन्न होकर नाचने लगे । उनके नृत्य करते समय संसार के समस्त स्थावर एवं जङ्गम पदार्थ ॥१३३॥ उनके तेज से मोहित होकर नृत्य करने लगे । इस बात को इन्द्र इत्यादि देवताओं और तपस्वी ऋषियों ने ॥१३४॥ ब्रह्माजी से कहा कि आप ऐसा कीजिये कि ये ब्राह्मण नृत्य न करें । हे राजन् ! ब्रह्माजी ने रुद्र को आदेश दिया कि वे ऋषि के पास जायं ॥१३५॥ उन्होंने कहा कि आप ऋषि से कहें कि वे नृत्य न करें । वहाँ जाकर रुद्र ने अत्यन्त प्रसन्न हुए ऋषि को देखा ॥१३६॥ ~

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