Srishti Khanda Extracted Page 257
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-257
Sanskrit Original
शोभामाना नरश्रेष्ठ स्थिताः सर्वे वनौकसः । यज्ञोपवीतमात्रेण व्यभजंस्तीर्थमंजसा ॥ ९ ० ७॥ जुह्ृतश्राग्रिहोत्राणि चक्रुश्चविविधाः क्रिया: । चिंतयंतो हि राजेंद्र तपसा दग्धकिल्विषाः ॥१०८॥ न यास्यामो परं तीर्थ ज्येष्ठभावेत्विदं सरः। ज्येष्ठपुष्करमित्येव नाम चक्कुर््िजातयः ॥१०९॥ तत्र कुब्जान् बहून्दृष्टवा स्थितांस्तीर्थसमीपतः । बभूवुर्विस्मितास्तत्र जना ये च समागत: ॥११०॥ दत्वा दानं द्विजातिभ्यो भांडानि विविधानि च । श्रुत्वा सरस्वतीं प्राचीं स्नातुकामा द्विजा गताः ॥१९९॥ सरस्वती तीर्थवरा नानाद्विजगणैर्युता । बदरेंगुदकाशमर्यप्लक्षाश्वत्यविभीतकैः ॥११२॥ पौलोमैश्च पलाशैश्च करीरैः पीलुभिस्तथा । सरस्वती तीर्थरुहै र्धन्वनैः स्यंदनैस्तथा ॥११३॥ कपित्थैः करवीरैश्च बिल्वैरालातकैस्तथा । अतिमुक्तकपंडैश्च पारिजातैश्च शोभिता ॥११४॥ कदंबवनभूयिष्ठा सर्वसत्वमनोरमा । वाय्वंबुफलपूर्णादैर्दतोलूखलिकैरपि ॥१९५॥ तथाश्मकुट्टमुख्यैश्च वरिष्ठैर्मुनिभिर्वृता । स्वाध्यायघोषसंघुष्टा मृगयूथशताकुला ॥११६॥ अहिंसैर्धर्मपरमैस्तथा चातीव शोभिता । सुप्रभा कांचनाख्या च प्राची नंदा विशालका॥१ १७॥ स्रोतोभिः पंचभिस्तत्र वर्तते पुष्करे नदी । पितामहस्य सदसि वर्त्तमाने महीतले ॥११८॥ वितते यज्ञवाटे तु स्वागतेषु द्विजादिषु। पुण्याहघौषैर्विततैर्देवानां नियमैस्तथा ॥११९॥ देवेषु चैव व्यग्रेषु तस्मिन् यज्ञविधौ तथा। तत्र चैव महाराज दीक्षिते च पितामहे ॥१२०॥ यजतस्तस्य सत्रेण सर्वकामसमृद्धरिना। मनसा चितिताह्यार्था धर्मार्थकुशलास्तथा ॥९२९॥ वनवासी सुशोभित होकर वहाँ रहने लगे । केवल यज्ञोपवीत से नाप कर वे उस तीर्थ को विभाजित किए ॥१०७॥ वे अग्निहोत्र करने वाले थे और अपनी अनेक क्रियाओं को सम्पन्न किए । हे राजेन्द्र ! चिन्तन करने वाले उन तपस्वियों के सारे पाप दग्ध हो गये ॥१०८॥ वे सोचने लगे अब हमलोग किसी दूसरे तीर्थ में नहीं जायेंगे, यह सरोबर ही सबसे बड़ा तीर्थ है । उन ब्राह्मणों ने उस तीर्थ का नाम ज्येष्ठ पुष्कर रख दिया ।।१०९॥ वहाँ तीर्थ के सन्निकट बहुत से कुन्जों को देखकर उन ऋषियों को भाण्ड प्रदान करने के लिए आये हुए देखकर लोगों को आश्चर्य हुआ ॥११०॥ उन लोगों ने ब्राह्मणों को अनेक प्रकार के भाण्डों (पात्रों) का दान दिया उन ब्राह्मणों ने प्राची सरस्वती का नाम सुना तो वे प्राची सरस्वती में स्नान करने के लिए गये ॥१११॥ तीर्थो में श्रेष्ठ सरस्वती नदी के तट पर अनेक ब्राह्मणों का गण था । वैर इंगुदी, काश्मर्य, प्लक्ष (पाकड़) अश्वत्थ (पिप्पल) विभीतक ॥११२॥ पौलोम, पलाश, करीर तथा पीलु के वृक्ष जो सरस्वती तीर्थ में उगे थे उनसे तथा धन्वनों तथा रथों से ।।११३॥ कपित्थ (कैंथ) करवीर, विल्व, अम्लातक (अमड़ा) अतिमुक्तक, पण्ड तथा पारिजात वृक्षों से सरस्वती नदी सुशोभित थी ॥११३-११४॥। वहाँ पर बहुत अधिक कदम्ब के वन थे सभी जीवों से वह नदी मनोहर लगती थी । वायु, जल तथा फल का आहार करने वाले तथा दांत से कूंचकर खाने वाले महात्माओ से भी ॥११५॥ वह नदी वरिष्ठ अश्मकुट्ट मुनियों से सुशोभित थी । वहाँ वेदाध्ययन की ध्वनि सुनायी पड़ती थी तथा मृगों के सैकड़ों समूह विचरण करते थे ॥११६॥ अहिंसा को ही परम धर्म मानने वाले मुनियों से वह नदी अत्यन्त सुशोभित थी । पुष्कर तीर्थ में सरस्वती नदी, सुप्रभा, काञ्चना, प्राची सरस्वती, नन्दा तथा विशाला इन पाँच नामों से जानी जाती है ॥११७॥ इन पाँच स्रोतों से सरस्वती नदी पुष्कर में प्रवाहित होती है । पृथिवी पर आयोजित ब्रह्माजी की सभा में ॥११८॥ उस विस्तृत यज्ञशाला में ब्राह्मणों आदि के स्वागत के कार्य, विस्तृत पुण्याहवाचन के ध्वनियों से तथा देवताआं के नियम से॥११९॥ उस यज्ञ के कार्यो में देवताओं के व्यस्त रहने पर तथा हे महाराज ! ब्रह्माजी के दीक्षित होने पर॥१२०॥
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