Srishti Khanda Extracted Page 255
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-255
Sanskrit Original
पुलस्त्य उवाच सगर्व तु वचस्तेषां श्रुत्वा देवो जनार्दनः । शक्रेण सहितः शंभुमिदमाह महायशाः ॥८२॥ विघ्नं प्रकर्तत वै रुद्र आयाता दनुपुंगवाः । ब्रह्मणामंत्रिता श्वेह विघ्नार्थं प्रयतंति ते॥८३॥ अस्माभिस्तु क्षमा कार्या यावद्यज्ञः समाप्यते। समाप्ते तु क्रतावस्मिन् युद्धं कार्य दिवौकसाम् ॥८ ४॥ यथा निर्दानवा भूमिस्तथा कार्य त्वया विभो। जयार्थं चेह शक्रस्य भवता च मया सह ॥८५॥ द्विजानां परिवेष्टारो मरुतः परिकल्पिताः । दानवानां धनं यच्च गृहीत्वा तद्यजामहे॥८६॥ अत्रागतेषु विप्रेषु दुःखितेषु जनेष्विह व्ययं तस्य करिष्यामो दासभावे निवेशिताः ॥८७॥ बदंतमेवं तं विष्णुं ब्रह्मावचनमब्रवीत्। एते दनुसुताः क्रुद्धा युष्माकमपिनेष्सिताः॥८८॥ भवता च क्षमा कार्या रुद्रेण सह दैवतैः। कृते युगावसाने तु समाप्तिं च क्रतौ गते ॥८९॥ मया च प्रेषिता यूयमेते च दनुपुंगवाः । संधिर्वा विग्रहो वापि सर्वैः कार्यस्तदैव हि॥९०॥ | पुलस्त्य उवाच पुनस्तान्दानवान्ब्रह्मा वाक्यमाह स्वयं प्रभुः । दानवैर्न विरोधोत्र यज्ञे मम कथंचन ॥९१॥ मैत्रभावस्थितायूयमस्मत्कार्ये च नित्यशः । दानवा ऊचुः सर्वमेतत्करिष्यामः शासनं ते पितामह ॥९२॥ अस्माकमनुजादेवाभयं तेषां नविद्यते । पुलस्त्य उवाच एतच्छुत्वा तदा तेषां परितुष्टः पितामहः ॥९३॥ भगवान् जनार्दन ने इन्द्र के साथ शङ्करजी से इस बात को बतलाया ॥८१-८२॥ हे रुद्र ! श्रेष्ठ दानव सभी विघ्न करने के लिए आये हैं । ब्रह्माजी ने उन सबों को यहाँ आमन्त्रित किया है, वे सब विघ्न करने का प्रयास कर रहे हैं। ८ ३॥ जब तक यज्ञ समाप्त नहीं हो जाता है, तब तक हमलोगों को क्षमा करना चाहिए । इस यज्ञ के समाप्त हो जाने पर ही हम देवता युद्ध करेंगे ॥८४॥ हे विभो ! आपको तो ऐसा प्रयास करना चाहिए कि पृथिवी दानवों से रहित हो जाय । इन्द्र को विजय दिलाने के लिए आपको भी मेरे साथ मिलकर युद्ध करना चाहिए ॥८५॥ द्विजों का परिवेष्टन करने वाले रूप से मरुतों की सृष्टि की गयी हैं । दानवों का जो धन है, उसी को लेकर मैं यज्ञ कर रहा हूँ ॥८६॥ यहाँ पर ब्राह्मणों के आ जाने पर तथा लोगों के दुःखी हो जाने पर सेवक रूप से व्यवस्थित हमलोग उन दानवों के धन का ही व्यय करेंगे ॥८७॥ इस तरह से कहने वाले विष्णु को ब्रह्माजी ने कहा-- ये क्रुद्ध दनु के पुत्र आपलोगों के साथ युद्ध नहीं करना चाहते हैं । अतएव रुद्र तथा सभी देवताओं के साथ आपको भी इन्हें क्षमा करना चाहिए । सत्ययुग की समाप्ति हो जाने पर जब यह यज्ञ समाप्त हो जायेगा ॥८९॥ मैं आपलोगों को तथा इन श्रेष्ठ दानवों को भेज दूँगा । उसी समय आप सभी लोगों को इन सबों के साथ सन्धि अथवा विग्रह करना चाहिए ॥९०॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- उसके बाद स्वयं ब्रह्माजी ने उन दानवों से कहा-- मेरे इस यज्ञ में दानवों को किसी भी प्रकार का विरोध नहीं करना चाहिए ।।९ १॥ मेरे इस कार्य में तुम सभी लोगों को मित्रता की भावना से युक्त होना चाहिए । दानवों ने कहा-- हे पितामह ! हमलोग आपकी सभी आज्ञाओं का पालन करेंगे ॥९२॥ देवता हमारे अनुज हैं, उनलोगों को किसी भी प्रकार का भय नहीं करना चाहिए । पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- दानवों की इस
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