Srishti Khanda Extracted Page 254

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-254

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Sanskrit Original

श्रुति: स्मृतिस्तथा क्षांतिः शांतिः पुष्टिस्तथा क्रिया। सर्वाश्राप्सरसो दिव्या तृत्यगीतविशारदाः॥६५॥ उपतिष्ठंति ब्रह्माणं सर्वास्ता देवमातरः । विप्रचित्तिः शिबिः शंकुरयः शंकुस्तथैव च ॥६६॥ वेगवान्केतुमानुग्रः सोग्रो व्यग्रो महासुरः। परिः पुष्करश्चैव सांबो श्वपतिरेव च ॥६७॥ प्रहादोथ बलिः कुंभः संहादो गगनप्रियः । अनुह्णादो हरिहरौ वराहश्च कुशोरजः ॥६८॥ योनिभक्षो वृषपर्वा लिंगभक्षोथवै कुरुः। निःप्रभः सप्रभः श्रीमांस्तथैव च निरूदरः ॥६९॥ एकचक्रो महाचक्रो द्विचक्र:ः कुलसंभवः । शरभः शलभश्चैव क्रपथः कापथः क्रथः ॥७०॥ बृहद्वांति महाजिह: शंकुकर्णो महाध्वनिः। दीर्घजिह्वोऽर्कनयनो मृडकायो मृडप्रियः ॥७९॥ वायुर्गरिष्ठो नमुचिः शम्बरो विज्वरो विभुः । विष्वक्सेनश्चंद्रहर्ता क्रोधवर्द्ध एव च॥७२॥ कालकः कलकांतश्च कुंडदः समरप्रियः । गरिष्ठश्च वरिष्ठश्च प्रलंबो नरकः पृथुः ॥७३॥ इंद्रतापनवातापी केतुमान्बलदर्पितः। असिलोमा सुलोमा च वाष्कलिः प्रमदो मदः॥७४॥ सृगालवदनश्चैव कशीच शरदस्तथा। एकाक्षश्चैव राहुश्च वृत्रः कोधविमोक्षणः ॥७५॥ ऐते चान्ये च बहवो दानवा वलवर्द्धना: । ब्रह्माणंपर्युपासंत वाक्यंचेदमथोचिरे ॥७६॥ त्वया सृष्टाः स्म भगवंस्रैलोक्यं भवताहि नः। दत्तं सुरवरश्रेष्ट देवेभ्यश्चाधिकाः कृताः॥७७॥ भगवन्निह किं कुर्मो यज्ञे तव पितामह । यद्धितं तद्वदास्माकं समर्थाः कार्यनिर्णये ॥७८॥ किमेभिस्ते वराकैश्च आदितेर्गर्भसंभवैः । दैवतैर्निहतैः सर्वैः पराभूतैश्च सर्वदा॥७९॥ पितामहोसि सर्वेषामस्माकं दैवतैः सह । तव॒ यज्ञसमाप्तौ च पुनरस्मासु दैवतैः ॥८०॥ श्रियं प्रतिविरोधश्च भविष्यति न संशयः । इदानी प्रेक्षणं कुर्मः सहिताः सर्वदानवैः ॥८९॥ शान्ति, पुष्टि तथा क्रिया आदि देवियाँ तथा नृत एवं गीत में निपुण सभी दिव्य अप्सरायें ।।६४-६५।। तथा सभी देव माताएँ श्रीब्रह्माजी की सेवा में उपस्थित थीं । विप्रचिति, शिवि, रङ्कु, रय, शङ्क ॥६६॥ वेगवान्, केतुमान, उग्र, महासुर, उग्र व्यग्र, परिध, पुष्कर, साम्ब तथा अश्वपति ॥६७॥ प्रह्माद, बलि, कुम्भ, संह्वाद, गगनप्रिय, अनुहाद, हरिहर, वराह, कुशोरज ॥६७॥ योनिभक्ष, वृषपर्वा, लिङ्गभक्ष, कुरु, निष्प्रभ, सप्रभ, श्रीमान्, निरूदर ॥६९॥ एकचक्र, महाचक्र, द्विचक्र, कुलसंभव, शरभ, शलभ, क्रपथ, क्रापथ तथा क्रथ ॥७०॥ बृहद्वंति, महाजिह्न, शङ्कुकर्ण, महाध्वनि, दीर्घजिह्न, अर्कनयन, मृडकाय, मृडप्रिय ॥७१॥ वायु, गरिष्ठ, नमुचि, शम्बर, विज्वर, विभु, विष्वक्सेन, चन्द्रहर्ता, क्रोधवर्द्धन ॥७२॥ कालक, कालकान्त, कुण्डद, समरप्रिय, गरिष्ठ, वरिष्ठ, प्रलम्ब, नरकासुर, पृथु ॥७३॥ इन्द्रतापन, वातपी, केतुमान्, बलदर्पित, असिलोमा, सुलोमा, वाष्कलि, प्रमद, मद ॥७४॥ सृगालवदन, केशी, शरद, एकाक्ष, राहु, वृत्र, क्रोधविमोक्षण ॥७५॥ ये सभी तथा बहुत से दूसरे बलवान् दानव ब्रह्माजी की सेवा करते हुए कहे ॥७६॥ हे भगवन् ! हमलोग आपके ही द्वारा सृष्ट हैं और आपने हमलोगों को त्रैलोक्य का राज्यप्रदान किया है । हे देवताओं में श्रेष्ठ ! आपने हमलोगों को देवताओं की अपेक्षा अधिक बलवान बनाया है ॥७७॥ हे भगवन् ! ब्रह्माजी इस यज्ञ में हमलोग आपकी कौन सी सेवा करें ? जो कल्याणकारी हो उसे आप बतलाएँ: हमलोग कार्य करने में समर्थ हैं ।॥७८॥ इन बेचारों अदिति के पुत्रों से आपका कौन कार्य होगा । ये भाग्य के मारे हुए सदा पराजित होते हें ॥७९॥ आप हमलोगों के तथा देवताओं के दोनों के पितामह हैं । आपका यज्ञ समाप्त होजाने पर फिर हमलोगों का देवताओं के साथ ।॥८०॥ ऐश्वर्य के विषय में निश्चित रूप से विरोध होगा । इस समय तो हम सभी दानव एक साथ केवल देख रहे हैं । पुलस्त्य महर्षि ने कहा--- उन दानवों के गर्वयुक्त वाणी को सुनकर

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