Srishti Khanda Extracted Page 253
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-253
Sanskrit Original
मीमांसाहेतुवाक्यज्ञैः कृता नानाविधा मखे। तत्र तत्र च राजेंद्र नियतान् संशितव्रतान् ॥४९॥ जपहोमपरान् मुख्यान् ददृशुस्तत्र वैद्विजान्। यज्ञभूमौ स्थितस्तस्यां ब्रह्मा लोकपितामहः ॥५०॥ सुरासुरगुरुः श्रीमान् सेव्यमानः सुरासुरैः । उपासते च तत्रैनं प्रजानां पतयः प्रभुम् ॥५१॥ दक्षो वसिष्ठः पुलहो मरीचिश्च द्विजोत्तमः । अङ्गिरा भृगुरत्रिश्च गौतमो नारदस्तथा॥५२॥ विद्यमानमंतरिक्षं वायुस्तेजो जलं मही । शब्दः स्पर्शश्च रूपंच रसोगंधस्तथैव च ॥५३॥ विकृतश्च विकारश्च यच्चान्यत्कारणं महत्। ऋग्यजुः समाथर्वाख्या वेदाश्चत्वार एव च ॥५४॥ शब्दः शिक्षानिरुक्तं च कल्पशछंद: समन्विताः । आयुर्वेदधनुर्वेदौ मीमांसा गणितं तथा ॥५५॥ हस्त्यश्चज्ञानसहिता इतिहाससमन्विताः । एतैरंगैरुपांगैश्च वेदाः सर्वे विभूषिताः ॥५६॥ उपासते महात्मानं सहोंकारं पितामहम् । तपश्च क्रतवश्चैव संकल्पः प्राण एव च ॥५७॥ एते चान्ये च बहवः पितामहमुपस्थिताः । अर्थो धर्मश्च कामश्च द्वेषो हर्षश्च सर्वदा ॥५८॥ शुक्रो बृहस्पतिश्चैव संवर्तो बुध एव च। शनैश्चरश्च राहुश्च ग्रहाः सर्वे तथैव च॥५९॥ मरुतो विश्वकर्मा च पितरश्चापि भारत। दिवाकरश्च सोमश्च ब्रह्माणं पर्युपासते॥६०॥ गायत्री दुर्गतरणी वाणी सप्तविधा तथा। अक्षराणि च सर्वाणि नक्षत्राणि तथैव च ॥६१॥ भाष्याणि सर्वशास्त्राणि देहवन्ति विशांपते। क्षणा लवा मुहूर्ताश्च दिनं रात्रिस्तथैव च॥६२॥ अर्द्धमासाश्च मासाश्च ऋतवः सर्व एव च। उपसते महात्मानं ब्रह्माणं दैवतैः सह॥६३॥ अन्याश्च देव्यः प्रवरा ह्वीः कीर्ति युति रेव च। प्रभा धृतिः क्षमा भूति नीति र्विद्या मतिस्तथा॥६४॥ lira टा क स NSIS को जानने वाले, शिक्षा शास्त्र के ज्ञाता ब्राह्मणों द्वार सभी विद्याओं में विशारद शब्दों के निर्वचन तथा अर्था को जानने वाले ॥४८॥ हे राजेन्द्र ! मीमांसा के सहेतुक वाक्यों को जानने वाले लोगों ने उस यज्ञ में विभिन्न स्थानों पर नियमों तथा व्रतों का पालन करने वाले, जप तथा होम करने वाले मुख्य-मुख्य ब्राह्मणों को देखा ॥४८-४९॥ उस यज्ञशाला में लोक पितामह ब्रह्माजी बैठे हुए थे ॥५०॥ वे देवताओं तथा असुरों के स्वामी थे । देवता और असुर उनकी सेवा में विद्यमान् थे । सभी प्रजापतिगण भी ब्रह्माजी की सेवा में उपस्थित थे ॥५१॥ दक्ष, वसिष्ठ, पुलह, द्विजश्रेष्ठ मरीचि, अङ्गिरा, भृगु, अत्रि, गौतम तथा नारद (ये सभी प्रजापति वहाँ विद्यमान थे) ॥५२॥ वहाँ पर आकाश, वायु, तेज, जल तथा पृथिवी, शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध, सभी विकृत और उनके विकार तथा दूसरे कारण तत्त्व, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, ये चारो वेद ॥५३-५४॥ शब्द (व्याकरण) शिक्षा, निरुक्त, कल्प, छन्द के साथ आयुर्वेद, धनुवेंद, मीमांसा, गणित ॥५५॥ हस्तिविज्ञान, अश्वविज्ञान के साथ एवं इतिहास से समन्वित वेद इन सभी अङ्गों तथा उपाङ्गों के साथ वहाँ पर मूर्तिमान रूप से उपस्थित थे ॥५६॥ ये सब ओङ्कार के साथ महात्मा ब्रह्माजी की उपासना में लगे थे । सभी तपस्या, सभी क्रतु, सङ्कल्प तथा प्राण ॥५७॥ ये सभी तथा इनके अतिरिक्त दूसरे जीव पितामह ब्रह्माजी के पास उपस्थित थे । अर्थ, धर्म तथा काम, द्वेष एवं हर्ष ॥५८॥ शुक्र, बृहस्पति, संवतं तथा बुध, शनैश्वर एवं राहु ये सभी ग्रह भी वहाँ उपस्थित थे ॥५९।। मरुद्गण, विश्वकर्मा, सभी पितृगण, सूर्य, चन्द्रमा भी ब्रह्माजी की उपासना में सलंग्न थे ॥६०॥ हे राजन् ! गायत्री, दुर्गा, तरणी तथा सातो प्रकार की बाणियाँ समस्त अक्षर तथा सभी नक्षत्र, सभी भाष्य, सभी शास्र वहाँ पर शरीर धारण करके उपस्थित थे । क्षण, लव, मुहूर्त दिन तथा रात्रि ॥६१-६२॥ अर्द्धमास तथा मास, सभी ऋतुएँ भी देवताओं के साथ शरीर धारण करके ब्रह्माजी की सेवा में संलग्न थीं ॥६३॥ बाराही, कीर्ति, द्युति, धृति, प्रभा, क्षमा, भूति, नीति, विद्या, मति, श्रुति, स्मृति, क्षान्ति,
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