Srishti Khanda Extracted Page 252
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-252
Sanskrit Original
योऽनंत इति नागेषु प्रोच्यते सर्वयोगिभिः । सहस्त्रमूर्दा रक्ताक्षः शेषादिभिरनुत्तमैः ॥३४॥ यो यज्ञ इति विप्रेद्रैरिज्यते स्वर्गालिप्सुभिः । नानास्थानगतिः श्रीमानेकः कविरनुत्तमः ॥३५॥ यंदेवं वेत्ति वेत्तारं यज्ञभागप्रदायिनम्। वृषाग्नि सूर्यचंद्राक्षं देवमाकाशविग्रहम् ॥३६॥ तं प्रपद्यामहे देवं भगवन् शरणर्थिनः । शरण्यं शरणं देवं सर्वदेवभवोद्भवम् ॥३७॥ ऋषीणां चैव स्रष्टारं लोकानां च सुरेश्वरम् । प्रियार्थं चैव देवानां सर्वस्य जगतः स्थितौ ॥३८॥ कव्यं पितृणामुचितं सुराणां हव्यमुत्तमम् । येन॒ प्रवर्तितं सर्व तं नतास्मस्सुरोत्तमम् ॥३९॥ तरेताप्रिना तु यजता देवेन परमेष्ठिना । यथासृष्टिः कृतापूर्वं यज्ञ सृष्टिस्तथा पुनः ॥४०॥ तथा ब्रह्माप्यनंतेन लोकानां स्थितिकारिणा । अन्वास्यमानो भगवान्वृद्धोप्यथ च बुद्धिमान् ॥४९॥ यज्ञवाटमचित्यात्मा गतस्तत्र पितामहः । धनाढ्यै तऋरईविजैः पूर्ण सदस्यैः परिपालितम्॥४२॥ गृहीतचापेन तदा विष्णुना प्रभविष्णुना । दैत्यदानवराजानो राक्षसानां गणाः स्थिताः ॥४३॥ आत्मानमात्मना चैव चिंतयामासवै द्रुतम् । चिंतयित्वा यथातत्वं यज्ञं यज्ञः सनातनः ॥४४॥ वरणं तत्र भगवान्कारयामासत्रहत्विजाम् । भृग्वाद्या ऋत्विजश्चापि यज्ञकर्मविचक्षणाः ॥४५॥ चकुर्वाचमुख्यैश्च प्रोक्तं पुण्यं यदक्षरम् । शुश्रुवुस्ते मुनिश्रेष्ठा वितते तत्र कर्मणि ॥४६॥ यज्ञविद्या वेदविद्या पदक्रमविदां तथा। घोषेण परमर्षीणां सा वभूवनिनादिता॥४७॥ यज्ञसंस्तरविद्भिश्च शिक्षाविद्भिस्तथाद्विजैः । शब्दनिर्वचनार्थज्ञैः सर्वविद्याविशारदैः ॥४८॥ पालन करते हैं ॥३३॥ जो नागों में अनन्त रूप से सभी योगियों द्वारा कहे जाते हैं । जिन्हें योगिजन सहस्रमूर्धा, रक्ताक्ष, शेष तथा योगज्ञ इत्यादि उत्तम नामों से पुकारते हैं । स्वर्ग प्राप्त करने की इच्छा वाले ब्राह्मण जिनकीआराधना यज्ञ के द्वारा करते हैं जो अनेक स्थानों में व्याप्त हैं, तथा ऐश्वर्य सम्पन्न हैं जो एक तथा श्रेष्ठ कवि हैं॥३४-३५॥ जिनको दिव्य गुण सम्पन्न सर्वज्ञ तथा यज्ञभाग को प्रदान करने वाले रूप से हम जानते हैं । धर्म, अग्नि, सूर्य एवं चन्द्रमा जिनके नेत्र हैं, आकाश ही जिनका शरीर है ॥३६॥ उन्ही श्रीभगवान् की हम शरणागति करते हैं । जो सबों के शरण्य, शरण, दिव्यगुण सम्पन्न तथा सभी देवों को उत्पन्न करने वाले हैं ॥३७॥ जो ऋषियों तथा लोकों की सृष्टि करने वाले हैं, जो देवताओं के स्वामी हैं । जो सम्पूर्ण जगत् में अन्तर्यामी रूप से देवताओं का कल्याण करने के लिए स्थित हैं ॥३८॥ हम उन सर्वश्रेष्ठ देवता को नमस्कार करते हैं जिन्होंने चिरकाल से पितरों को कव्य तथा देवताओं को हव्य प्रदान करने की परम्परा को प्रवर्तित किया है ॥३९॥ त्रेतग्नि में यजन करने वाले ब्रह्माजी के द्वारा जैसे पहले सृष्टि की गयी और फिर यज्ञ की सृष्टि की गयी ॥४०॥ उसके बाद वृद्ध तथा बुद्धिमान ब्रह्माजी लोकों की रक्षा करने वाले भगवान् अनन्त के साथ बैठे हुए सुशोभित हुए ॥४१॥ अचिन्त्यात्मा ब्रह्माजी जब यज्ञशाला में गये उस समय यज्ञशाला धन सम्पत्ति आदि सामग्रियों से परिपूर्ण थी, उसमें ऋत्विज बैठ गये थे । सदस्यगण उसकी रक्षा कर रहे थे ॥४२॥ भगवान् विष्णु धनुष धारण करके यज्ञशाला की रक्षा करते थे । वहाँ पर दैत्य, दानव तथा राक्षसों का समूह भी विद्यमान था ॥४३॥ उस समय सनातन यज्ञस्वरूप श्रीभगवान् ने अपने से ही अपनी आत्मा का चिन्तन (ध्यान) किया । चिन्तन के पश्चात् ॥४४॥ श्रीभगवान् ने ऋत्विजों का वरण कराया जो उस यज्ञ में भृगु आदि ऋत्विज थे । यज्ञ के कर्म को करने में निपुण थे ॥४५॥ वह्वृच आदि ऋत्विजों ने पुण्यप्रद अक्षर का उच्चारण किया । यज्ञकर्म का विस्तार हो जाने पर श्रेष्ठ मुनियों ने उसका श्रवण किया ॥४६॥ यज्ञविद्या, वेदविद्या तथा उनके पद तथा क्रम आदि के अभिज्ञ परमर्षियों की ध्वनि से यज्ञशाला ध्वनित हो गयी ।४७॥। यज्ञ के संस्तर
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