Srishti Khanda Extracted Page 251

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-251

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Sanskrit Original

चक्कुरस्मिन्सुरेशाश्च नमस्कारं पितामहे। मृगव्याधश्च शर्वश्च नित्रईतिश्च महायशाः ॥१९॥ अजैकपादहिरबुध्त्यः पिनाकी चापराजितः । भवो विश्ेश्वरश्चैव कपर्दीच विशांपते ॥२०॥ स्थाणुर्भगश्च भगवान् रुद्रास्तत्रावतस्थिरे। अश्विनौ वसवश्चाष्टौ मरुतश्च महाबलाः ॥२९॥ विश्वेदेवाश्च साध्याश्च तस्मै प्रांजलयः स्थिताः। शेषाद्यास्तु महानागा वासुकि प्रमुखाहयः ॥२२॥ काश्यपः कंबलश्चापि तक्षकश्च महाबलः । एते नामा महात्मानस्तस्मै प्रांजलयः स्थिताः ॥२३॥ ताक्ष्यश्चारिष्टनेमिश्च गरुडश्च महाबलः । वारुणिश्चैवारुणिश्च वैनतेयाव्यवस्थिताः ॥२४॥ नारायणश्च भगवान् स्वयमागत्यलोकवान् । प्राहलोकगुरु श्रीमान्सहसवैर्महर्षिभिः ॥२५॥ त्वया ततमिदं सर्व त्वया सृष्टं जगत्पते । तस्माल्लोकेश्वरश्चासि पद्मयोने नमोस्तुते॥२६॥ सदत्र ते मया कार्य कर्तव्यं च तदादिश । एवं प्रोवाच भगवान्सार्धं देवर्षिभिः प्रभुः ॥२७॥ नमस्कृत्यसुरेशाय ब्रह्मणेऽव्यक्तजन्मने । स च तत्र स्थितो ब्रह्मा तेजसा भासयन्दिशः॥२८॥ श्रीवत्सलोमसंच्छन्नो हेमसूत्रेण राजता । सुरर्षिप्रतिमः श्रीमान्स्वयंभूर्भूतभावनः ॥२९॥ शुचिरोमा महावक्षाः सर्वतेजोमयः प्रभुः । योगतिः पुण्यशीलानामगतिः पापकर्मणाम् ॥३०॥ योगसिद्धा महात्मानो यंविदुर्लोकमुत्तमम् । यस्याष्टगुणमैश्वर्य यमाहुर्देवसत्तमम् ॥३१॥ यं प्राप्य शाश्वत विप्रा नियता मोक्षकांक्षिणः । जन्मनो मरणाच्चैव मुच्यंते योगभाविताः ॥३२॥ यदेतत्तपइत्याहुः सर्वाश्रमनिवासिनः । सेवं सेवं यताहारा दुश्चरं व्रतमास्थिताः ॥३३॥ देव पितामह को आकर नमस्कार किए । हे राजन् ! मृग, व्याध, शर्व, महायशा निऋति ॥१९॥ अजैकपाद अहिर्बुध्न्य, अपराजित पिनाकी, भव, विश्वेश्वर तथा कपर्दी ॥२०॥ स्थाणु तथा भगवान् रुद्र वहाँ आये तथा ब्रह्माजी को नमस्कार किए । दोनों अश्विनीकुमार, आठो वसु तथा महाबलवान् मरुद्गण ॥२१॥ विश्वेदेव तथा साध्यगण आकर ब्रह्माजी के समक्ष हाथ जोड़कर खड़े थे । शेष आदि तथा महानाग वासुकि इत्यादि भी आये ॥२२॥ काश्यप, कम्बल, महाबलवान् तक्षक, ये सभी महात्मा नाग हाथ जोड़कर ब्रह्माजी के समक्ष खड़े थे । ताक्ष्य, अरिष्टनेमि, महाबलवान गरुड, वारुणि तथा आरुणि ये सभी विनितानंदन वहाँ उपस्थित थे ॥२४॥ लोकों के स्वामी भगवान् नारायण स्वयम् सभी महर्षियों के साथ आकर लोक गुरु ब्रह्माजी से कहे ॥२५॥ यह सम्पूर्ण जगत् आपसे व्याप्त है, आपने इस जगत् की सृष्टि की है हे जगत्पते ! आप संसार के स्वामी हैं, हे पद्मयोने आपको नमस्कार है ॥२६॥ आप मुझे इस बात का आदेश दीजिये कि यहाँ पर मैं कौन सा आपका कार्य करूँ । इस तरह से भगवान् नारायण ने देवर्षियों के साथ कहा ॥२७॥ उन्होंने अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजी को नमस्कार किया । उस समय वहाँ पर अपने तेज से प्रकाशित होते हुए ब्रह्माजी बैठे हुए थे ॥२८॥ वहाँ पर श्रीभगवान् भी वत्सचिह्न तथा सुवर्णमय सूत्रं वाले यज्ञोपवीत से सुशोभित थे । देवर्षि के सदृश वे ऐश्वर्य सम्पन्न तथा भूतभावन थे ॥२९॥ उनका एक-एक रोम पवित्र था, उनका वक्षस्थल विशाल था, सबों के स्वामी सभी प्रकार के तेज से सम्पन्न उन श्रीभगवान् की स्तुति देवताओं तथा ऋषियों ने इस प्रकार से की जो पुण्यवानों के एकमात्र आश्रय तथा पापियाँ के अनाश्रय हैं ॥२९-३०॥ जिनको योग सिद्ध महात्मागण उत्तम लोक मानते हैं । जिन देवश्रेष्ठ को अणिमा आदि आठ गुणों से सम्पन्न ऐश्वर्य वाला कहा गया है ॥३१॥ नियमों का पालन करने वाले तथा मोक्ष को चाहने वाले योगवेत्ता ब्राह्मण जिन शाश्वत श्रीभगवान् को प्राप्त करके जन्म एवं मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं ॥३२॥ सभी आश्रमों में निवास करने वाले जीव जिन श्रीभगवान् की नित्य सेवा करना ही परंतप बतलाते है, तथा उनकी सेवा प्राप्त करने के लिए अत्यन्त कठिन व्रत का

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