Srishti Khanda Extracted Page 249
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-249
Sanskrit Original
इंद्रस्य चारुदृष्टिस्त्वं सहस्त्रनयनोपमा। ऋषीणां धर्मबुद्धिस्त्वं देवानां च परायणा॥३२७॥ कर्षकाणां च सौता त्वं भूतानां धरणी तथा । स्त्रीणामवैधव्यकरी धनधान्यप्रदा सदा ॥३२८॥ व्याधिं मृत्युं भयं चैव पूजिता शमयिष्यसि । तथा तु कार्तिके मासि पौर्णमास्यां सुपूजिता ॥३२९॥ सर्वकामप्रदा देवी भविष्यसि शुभप्रदे। यश्चेदं पठते स्तोत्रं शृणुयाद्वाप्यभीक्ष्णशः ॥३३०॥ सर्वार्थसिद्धि लभते नरो नास्त्यत्र संशयः । गायत्र्युवाच भविष्यत्येवमेवं तु यत्त्वया पुत्र भाषितम् ॥३३९॥ विष्णुना सहितः सर्वस्थानेष्वेव भविष्यसि । इति श्रीपदामहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे सावित्रीविवादगायत्रीवरप्रदानं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७॥ = अठारहवाँ अध्याय भीष्म उवाच अत्यद्भुतमिदं ब्रह्मन् श्रुतवानस्मि तत्वतः । अभिषेकं तु गायत्र्याः सदस्यत्र तथा कृतम् ॥१॥ विरोधं चैव सावित्र्या शापदानं तथा कृतम् । विष्णुना च यथादेवी सर्वस्थानेषु कीर्तिता ॥२॥ नदियों में सङ्गम स्थलों में आपका निवास हैं ॥३२५॥ पूर्ण चन्द्रमा की आप पूर्णिमा है । आप नीतियों में विद्यमान बुद्धि, क्षमा तथा धृति स्वरूपिणी हैं हे सुन्दरि ! आप नारियों में उमा देवी के रूप में सुनी जाती हैं ॥३२६। आप इन्द्र के हजार नेत्रों के समान दृष्टि स्वरूपिणी हें । आप ऋषियों की धर्मबुद्धि स्वरूपिणी हैं तथा देवताओं के सर्वश्रेष्ठ आश्रय हैं ॥३२७॥ आप कृषकों के लिए हल के फाल स्वरूपणि हैं, सभी भूतों में आप पृथिवी स्वरूप हैं, आप स्त्रियों को सदा सौभाग्य तथा धन-धान्य प्रदान करने वाली हैं ॥३२८। आपकी पूजा करने से रोग मृत्यु तथा भय का नाश हो जाता है । कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि को अच्छी तरह से पूजित होकर ॥३२९॥ हे मङ्गल प्रदान करने वाली देवि ! आप सभी कामनाओं को पूर्ण कर देती हैं । जो मनुष्य इस स्तोत्र को सदा पढता अथवा सुनता है।॥३३०॥ वह निश्चित रूप से अपने समस्त अभिप्रेत अर्थो को प्राप्त करता है । गायत्री देवी ने कहा-- हे पुत्र ! तुमने जैसा कहा है, वैसा ही होगा तुम सभी स्थानों में भगवान् विष्णु के साथ निवास करोगे ॥३३१॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के सावित्री विवाद तथा गायत्री वरदान नामक सत्रहवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ॥९७॥ —— ke ब्रह्माजी के यज्ञ का विस्तृत वर्णन, विष्णु तथा दानवों का वैर, पुष्कर स्नान के द्वारा ऋषियों को सुमुखत्व की प्राप्ति, प्राची सरस्वती का चरित्र, मंकण ब्राह्मण का चरित्र, प्राची सरस्वती का माहात्म्य, सरस्वती नदी द्वारा बाडवाग्नि को लेकर समुद्र में आकर अन्तर्धान होना तथा पुष्कर में जाना ।पुष्कर क्षेत्र के खर्जूरी वन में सरस्वती की उत्पत्ति, प्रभञ्जनराज की कथा, सरस्वती नदी में स्नान तथा दान करने का माहात्म्य भीष्मजी ने कहा-- हे ब्रह्मन् ! यह अत्यन्त अद्भुत कथानक मैने आप से सुना है । सभा में गायत्री का अभिषेक वहाँ पर किया गया ॥१॥ सावित्री का विरोध तथा शाप प्रदान भी मैंने सुना । जिस प्रकार से भगवान् विष्णु
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