Srishti Khanda Extracted Page 248
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-248
Sanskrit Original
विस्तीर्णजघना देवी सुश्रोणी च वरानने। सुजातवृतोरुयुगा सुजानुचरणा तथा ॥३१२॥ त्रैलोक्यधारिणी सा त्वं भुवि सत्योपयाचना । भविष्यसि महाभागे वरदा वरवर्णिनी ॥३१३॥ पुष्करे च कृता यात्रा दृष्ट्वा त्वं संभविष्यति । ज्येष्ठे मासे पौर्णमास्यामग्र्यां पूजां च लप्स्यसे॥३ ९४॥ ये च वा त्वत्प्रभावज्ञाः पूजयिष्यति मानवाः। न तेषां दुर्लभं किंचित्पुत्रतो धनतोपि वा॥३१५॥ कांतारेषु निमस्रानामटव्यां वा महार्णवे । दस्युभिर्वा निरुद्धानां त्वं गतिः परमा नृणाम् ॥३१६॥ त्वं सिद्धि: श्री तिः कीर्ति ह्वी विद्या सन्नति मतिः । संध्या रात्रि: प्रभा निद्रा कालरात्रिस्त्वमेव च ॥॥३१७॥। अम्बा च कमलामात ब्रह्माणी ब्रह्मचारिणी । जननी सर्वदेवानां गायत्री परमाङ्गना॥३९८॥ जया च विजया चैव पुष्टिस्त्वं च क्षमा दया। सावित्र्यवरजा चासि सदा चेष्टा पितामहे॥३१९९॥ बहुरूपाविश्वरूपा सुनेत्रा ब्रह्मचारिणी । सुरूपा त्वं विशालाक्षी भक्तानां परिरक्षिणी॥३२०॥ नगरेषु च पुण्येषु आश्रमेषु वरानने । वासस्तव महादेवि वनेषूपवनेषु च॥३२९॥ ब्रह्मस्थानेषु सर्वेषु ब्रह्मणो वामतः स्थिता । दक्षिणेन तु सावित्री मध्ये ब्रह्मा पितामहः ॥३२२॥ अंतर्वेदी च यज्ञानामृत्विजां चापि दक्षिणा । सिद्धिस्त्वं हे नृपाणां च वेला सागरजा मता॥३२३॥ ब्रह्मचारिणि या दीक्षा शोभा च परमा मता । ज्योतिषां च प्रभा देवी लक्ष्मीर्नारायणे स्थिता ॥३२४॥ क्षमा सिद्धि मुनीनां च नक्षत्राणां च रोहिणी । राजद्वारेषु तीर्थेषु नदीनां संगमेषु च॥३२५॥ पूर्णिमा पूर्णचंद्रे च बुद्धिर्नीत्यां क्षमा धृतिः । उमादेवी च नारीणां श्रूयसे वरवणिनी ॥३२६॥ दृप्त हैं । सुन्दर मध्य भाग वाली आपकी सुन्दर गहरी नाभि है ॥३११॥ हे विस्तुत जङ्घाओं वाली देवि आपका श्रोणी प्रदेश अत्यन्त सुन्दर है । आपके दोनो ऊरू सुन्दर तथा गोल है, आपके घुटने तथा पैर सुन्दर हैं ॥३१२॥ हे महाभागे ! हे सुन्दरि ! आप भूलोक में याचकों की याचना को सत्य बनाने वाली तथा वरदान देने वाली होंगी॥ ३ १३॥ आपका दर्शन करने पर ही पुष्कर क्षेत्र की यात्रा पुरी होगी । ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा के दिन आपकी उत्तम पूजा होगी ।॥।३१४।। आपके प्रभाव को जानने वाले जो ब्राह्मण आपकी पूजा करेंगे उन लोगों को पुत्रों तथा धनों की दुर्लमता नहीं हो सकती है ॥३१५॥ वन में अथवा अटवी में भूले हुए तथा महासागर में डूबने वालों के या लुटेरों से घिरे हुए जीवों के लिए एकमात्र सहारा आप ही हें ॥३१६॥ आप ही सिद्धि, श्री, धृति, कीर्ति, ही, विद्या, सन्नति, मति, संध्या, रात्रि, प्रभा, निद्रा तथा कालरात्रि स्वरूपिणी हैं ॥३१७॥ लक्ष्मीजी की माता, (ख्याति देवी) ब्रह्माणी, ब्रह्मचारिणी सभी देवताओं की माता, तथा परम श्रेष्ठ रमणी गायत्री भी आप ही हैं ॥३१८॥ जया, विजया, पुष्टि, दया, क्षमा, सावित्री, अवरजा, एवं सदा पितामह (ब्रह्मा) विषयिणी चेष्टा से युक्त आप हैं ॥३१९। अनेक रूपों वाली, विश्व स्वरूपिणी, सुन्दर नेत्रों वाली, ब्रह्मचारिणी सुन्दर रूप वाली, बड़े-बड़े नेत्रो वाली तथा भक्तों की हर प्राकार से रक्ष करने वाली भी आप ही हैं ॥३२०॥ हे महादेवि ! हे वरानने ! आपका नगरों, पवित्र आश्रमों, वनों तथा उपवनों में निवास है । ॥३२१॥ ब्रह्माजी के समस्त स्थानों में आप ब्रह्माजी के बायें भाग में स्थित हैं, दायें भाग में सावित्री देवी हैं तथा ब्रह्माजी आप दोनों के बीच में विद्यमान हें ॥३२२॥ आप यज्ञों की अन्तर्वेदी (भीतर की वेदी) हैं तथा ऋत्विजों की दक्षिणा स्वरूपिणी हैं, आप राजाओं की सिद्धि स्वरूपिणी है तथा आप समुद्र के तट स्वरूपिणी समस्त ज्योतियों की प्रभा स्वरूपिणी हैं आप भगवान् नारायण में लक्ष्मी रूप में स्थित हें ॥३२३-३२४॥ आप मुनियों में क्षमा तथा सिद्धि स्वरूपिणी हैं, नक्षत्रों में आप रोहिणी नक्षत्र स्वरूपिणी हैं । राजद्वारो में तीर्थों में,
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