Srishti Khanda Extracted Page 247
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-247
Sanskrit Original
प्राप्स्यसे वरदानेन मदीयेन सुलोचने । पुलस्त्य उवाचदेवपत््यस्तदा सर्वास्तुष्टया परिभाषिताः ॥२९९॥ अपत्यैरपि हीनानां नैव दुःखं भविष्यति । गौरी चैव तु गायत्र्या तदा सापि विबोधिता ॥३००॥ बृंहिता परितोषेण वरान्दत्त्वा मनस्विनी । समाप्तिं तस्य यज्ञस्य कांक्षंती ब्रह्मणः प्रिया ॥३०१॥ वरदा ता तथा दृष्ट्वा गायत्रीं वेदमातरम् । प्रणिपत्य तदा रुद्रः स्तुतिमेतां चकार ह॥३०२॥ रुद्र उवाच नमोस्तु ते वेदमातरष्टाक्षरविशोधिते । गायत्री दुर्गतरणी वाणी सप्तविधा तथा ॥३०३॥ सर्वाणि स्तुतिशास्त्राणि गाथाश्च निखिलास्तथा । अक्षराणि च सर्वाणि लक्षणानि तथैव च ॥३०४॥ भाष्यादिसर्वशास्त्राणि ये चान्ये नियमास्तथा। अक्षराणि च सर्वाणि त्वं तु देवि नमोस्तुते ॥३०५॥ शवेतात्वं श्वेतरूपासि शशांकेन समानना । बिभ्रती विपुलौ बाहू कदली गर्भकोमलौ ॥३०६॥ एणशृंगं करे गृह्य पंकजं च सुनिर्मलम्। वसाना वसने क्षौमे रक्तेनोत्तरवाससा ॥३०७॥ शशिरश्मिप्रकाशेन हारेणोरसि राजिता । दिव्यकुंडलपूर्णाभ्यां कर्णाभ्यां सुविभूषिता ॥३०८॥ चंद्रसापत्यभूतेन मुखेन त्वं विराजसे। मकुटेनातिशुद्धेन केशबंधेन शोभिता ॥३०९॥ भुजगाभोगसदृशौ भुजौते भूषणन्दिवः । स्तनौ ते रुचिरौ देवि वर्तुलौ समचूचुकौ ॥३१०॥ जघनेनातिशुश्रेण त्रिवलीभंगदर्पिता । सुमध्यवर्तिनी नाभिर्गभीरा शुभदर्शिनी ॥३११॥ अवतार लेगे सर्परूप धारण किए हुए तुमको देखकर तुम्हारे पापों को विनष्ट करेंगे ॥२९७॥ उस समय तुम अपनी सर्पयोनि का त्याग करके फिर स्वर्ग में जाओगे । हे सुन्दरि ! अपने पति के साथ अश्वमेघ याग करने के कारण तुम मेरे वरदान से पुन: स्वर्ग के राज्य को प्राप्त करोगी ॥२९७-२९८॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- प्रसन्न हुयी गायत्री देवी से देवताओं की सभी पत्नियों ने भी वरदान प्राप्त किया ॥२९९॥ कि निस्संतान होने पर भी उन सबों को कष्ट नहीं होगा । इसके बाद गौरी देवी को भी गायत्री देवी ने सान्त्वना प्रदान किया ॥३००॥ वरादन देने के कारण परितोषण के कारण समृद्ध ब्रह्माजी की पत्नी गायत्री देवी ने यज्ञ की समाप्ति करना चाहा ॥३०१॥ वेदमाता गायत्री को वर देने वाली देखकर रुद्र ने उनको प्रणाम करके उनकी स्तुति की ॥३०२॥ रुद्र ने कहा-- हे अष्टाक्षर से सुशोभित वेदमातः ! आपको नमस्कार है । गायत्री, दुर्गतरणी, सप्तविधा वाणी ॥३०३॥ सम्पूर्ण स्तुति शास्र, सम्पूर्ण गाथायें, समस्त अक्षर और समस्त लक्षण ॥३०४॥ भाष्य आदि सम्पूर्ण शास्त्र तथा जो दूसरे नियम हैं, वे सब तथा सभी अक्षर आप ही हैं, हे देवि आपको नमस्कार है ॥३०५॥ आप श्वेत रूप वाली श्चेतादेवी हैं; आपका मुख चन्द्रमा के समान आह्वादक है । कदली स्तम्भ के भीतरी भाग के समान अत्यन्त कोमल आपकी भुजाएँ हैं॥३०६।। अपने हाथ में मृग का शृङ्ग तथा सुन्दर कमल लेकर; दो रेशमी वस्रों को धारण की हुयी तथा लाल रङ्ग के उत्तरीय वस्र को धारण करने वाली आप हैं ॥३०७॥। हृदय प्रदेश में चन्द्रमा की कान्ति के समान कान्ति वाले हार से आप सुशोभित हैं । आपके दोनों कानों में दो दिव्य कुण्डल सुशोभित हो रहे हैं ॥३०८।॥ आपका मुख चन्द्रमा के समान आह्लादक है । अत्यन्त शुद्ध मुकुट तथा केश बन्ध से आप सुशोभित हैं ॥३०९॥ दिव्य सर्प के आभोग के समान आपकी दोनों भुजाएँ द्युलोक को सुशोभित करने वाली हैं । हे देवि ! आपके दोनों स्तन गोल मनोहर, तथा एक समान चुचुक वाले हैं ॥३१०॥ अत्यन्त गौर वर्ण की जङ्घाओं तथा त्रिबली की शोभा से आप Es)
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